एक
मई
1886
से
विश्व
भर
में
इस
दिन
मजदूर
दिवस
मनाया
जाता
है।
मजदूरों
के
हक
और
उनकी
मांगों
के
लड़ाई
लड़ने
वाले
श्रमिक
संघों
की
मजदूर
आंदोलनों
में
महती
भूमिका
रही
है।
देश
में
सूती
कपड़ा
मिलों
के
रूप
में
इंदौर
की
अलग
पहचान
थी।
द्वितीय
विश्व
युद्ध
में
इंदौर
की
कपड़ा
मिल
से
निर्मित
कपड़ा
टेंट
और
अन्य
कार्यों
में
उपयोग
होता
था।
जहां
मजदूर
होते
हैं
वहां
उनकी
मांगों
के
लिए
यूनियन
बन
ही
जाती
है।
इंदौर
मिल
मजदूर
संघ
का
एक
समय
देश
में
काफी
नाम
था।
तेज
तर्रार
मजदूर
नेता
कॉमरेड
होमी
दाजी
इसके
अगुआ
थे।
उनकी
सभा
सुनने
के
लिए
मिलों
के
गेट
पर
भीड़
लग
जाया
करती
थी।
आज
इंदौर
में
न
कपड़ा
मिलें
रही
हैं,
न
मजदूर
संघ,
यदि
हैं
भी
तो
वे
नाममात्र
के।
इंदौर
में
पहली
कपड़ा
मिल
1867
में
लगी
इंदौर
में
पहली
कपड़ा
मिल
1867
में
आरंभ
हुई
थी,
जो
स्टेट
कपड़ा
मिल
के
नाम
से
जानी
जाती
थी।
इस
मिल
का
संचालन
एक
अंग्रेज
अधिकारी
ब्रूम
को
सौंपा
गया
था।
यह
मिल
आग
लग
जाने
से
बंद
हो
गई
थी।
1909
में
पहली
निजी
कपड़ा
मिल
मालवा
मिल
आरंभ
हुई।
1924
तक
नगर
में
कपड़ा
मिलों
की
संख्या
बढ़कर
छह
हो
गई
थी।
1924
से
नगर
में
कपड़ा
मिलों
का
स्वर्ण
काल
आरंभ
हुआ
था।
यह
करीब
64
साल
तक
चला।
विज्ञापन
1986
से
बंद
होना
शुरू
हुईं
मिलें
1986
में
पहली
होप
टेक्सटाइल
मिल
(भंडारी)
मिल
बंद
हुई,
यह
सिलसिला
31
मार्च
2003
तक
अंतिम
मालवा
मिल
बंद
होने
तक
जारी
रहा।
नगर
में
सभी
मिलों
के
आरंभ
होने
और
बंद
होने
के
क्रम
को
देखें
तो
नगर
में
कपड़ा
मिलों
की
औसत
आयु
78
वर्ष
रही।
इन
मिलो
में
करीब
10
से
15
हजार
कर्मचारी
कार्य
करते
थे।
ये
मजदूर
यूनियन
की
मुख्य
शक्ति
थे।
प्रसिद्ध
मजदूर
नेता
होमिदजी
कब
बना
मिल
मजदूर
संघ
नगर
में
मजदूर
संघ
की
स्थापना
1939
में
हुई
थी।
इस
संस्था
में
उस
वक्त
कामरेड
लक्ष्मण
खंडकर,
नारायण
नेवासकर,
दिवाकर,
दत्तात्रय
सरमंडल,
मुंशी
मुख्तार
अहमद,
पीर
खां
पठान
और
श्रीमती
अन्नपूर्णा
बाई
भंडारकर
प्रमुख
थे।
इंदौर
के
मजदूर
संघ
ने
द्वितीय
विश्व
युद्ध
में
बढ़ती
महंगाई
के
विरुद्ध
आंदोलन
किया
था।
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में
नर्मदा
के
तीन
चरणों
के
बावजूद
जलसंकट,
टैंकरों
के
भरोसे
शहर
1941
में
मजदूरों
पर
चली
थी
गोलियां
1941
में
नगर
में
मजदूरों
की
शांति
पूर्ण
मांग
और
आंदोलन
पर
पुलिस
द्वारा
गोली
चालन
से
चार
मजदूरों
की
मौत
हो
गई
थी।
1941
के
दिसंबर
महीने
में
रामसिंह
भाई
वर्मा
और
वीवी
द्रविड़
ने
इंदौर
मिल
मजदूर
संघ
इंटक
की
स्थापना
की
और
1942
में
नगर
में
कम्युनिस्ट
पार्टी
की
स्थापना
हुई
और
कॉमरेड
दिवाकर
पहले
सचिव
चुने
गए।
कपड़ा
मिलों
में
मजदूरों
के
हक
के
लिए
समय-समय
पर
आंदोलन
होते
रहे।
सांस्कृतिक
विरासत
को
सहेजा
मिल
मजदूर
संघों
में
इंदौर
में
सांस्कृतिक
विरासत
को
सहेजा,
गणेश
उत्सव
की
प्रतिवर्ष
निकलने
वाली
झांकियां
विरासत
के
साथ
100
वर्ष
से
अनवरत
नगर
की
सड़कों
पर
अनंत
चौदस
को
निकलती
हैं।
मिल
मजदूर
संघों
द्वारा
कवि
सम्मलेन,
कव्वाली
आदि
कार्यक्रम
गणेश
उत्सव
के
दौरान
आयोजित
किए
जाते
थे,
जो
अब
नगर
में
बहुत
ही
कम
होते
हैं।
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में
हर
दिन
9
गाड़ियां
हो
रही
चोरी,
हर
साल
बढ़ता
जा
रहा
चोरी
का
आंकड़ा
जन
आंदोलनों
में
मजदूरों
की
भूमिका
नगर
में
मजदूर
आंदोलन
ने
मजदूरों
की
मांगों
के
साथ
आम
जनता
के
आंदोलन
में
भी
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाई।
इंदौर
में
पेयजल
के
लिए
शांतिपूर्ण
नर्मदा
आंदोलन
आंदोलन
में
मजदूरों
ने
अभूतपूर्व
सहयोग
दिया
था।
1957
के
विधानसभा
चुनाव
में
मजदूर
नेता
होमी
दाजी
की
विजय,
1958
में
नगर
पालिका
चुनाव
में
कम्युनिस्ट
पार्टी
समर्थित
नागरिक
मोर्च
ने
बहुमत
प्राप्त
किया
था।
साइकिल
पर
टैक्स
हटवाया,
कई
कॉलोनियां
बसाईं
मजदूरों
ने
ही
इंदौर
नगर
में
साइकिल
पर
लगने
वाला
टैक्स
हटवाया,
कम
कीमतों
के
मकानों
पर
संपत्ति
कर
समाप्त
करवाया।
1962
के
लोकसभा
चुनाव
में
इंदौर
से
मजदूर
नेता
होमी
दाजी
विजयी
रहे।
इसके
अतिरिक्त
मिलों
के
मजदूरों
के
हक
की
लड़ाई
में
नगर
के
मजदूर
नेताओं
के
साथ
मजदूर
संघ
ने
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाई।
मिल
क्षेत्रों
में
सर्वहारा
नगर,
विजय
नगर,
नंदा
नगर,
नेहरू
नगर
और
क्लर्क
कॉलोनी
की
स्थापना
में
मजदूरों
की
महती
भूमिका
रही।
नंदा
नगर
पूर्व
प्रधानमंत्री
स्व.
गुलजारी
लाल
नंदा
के
नाम
पर
है,
वे
इंदौर
आए
थे,
तब
इस
कॉलोनी
का
नामकरण
किया
गया।