
मध्य
प्रदेश
के
धार
जिले
के
सरकारी
अस्पताल
में
हुई
लापरवाही
ने
इंसानियत
को
झकझोर
कर
रख
दिया।
मध्य
प्रदेश
हाई
कोर्ट
के
आदेश
के
बाद
भी
13
वर्षीय
दुष्कर्म
पीड़िता
का
समय
पर
गर्भपात
नहीं
किया
जा
सका।
कोर्ट
ने
सुबह
11
बजे
तक
गर्भपात
कराए
जाने
का
आदेश
दिया
था,
लेकिन
धार
के
भोज
अस्पताल
में
पीड़िता
और
उसके
परिजन
घंटों
तक
भटकते
रहे।
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पीड़िता
के
वकील
नवनीत
जैन
ने
बताया
कि
बच्ची
और
उसका
परिवार
सुबह
से
भोज
अस्पताल
में
मौजूद
था,
लेकिन
इलाज
में
देरी
होती
रही।
हालात
इतने
खराब
थे
कि
बच्ची
के
पिता
अस्पताल
प्रशासन
से
हाथ
जोड़कर
विनती
करते
रहे,
लेकिन
किसी
ने
उनकी
नहीं
सुनी।
अंततः
मामले
को
केंद्रीय
राज्य
मंत्री
और
धार-महू
लोकसभा
सांसद
सावित्री
ठाकुर
के
संज्ञान
में
लाया
गया,
जिसके
बाद
पीड़िता
को
इंदौर
रेफर
किया
गया।
ऐसे
में
सबसे
बड़ा
सवाल
यह
है
कि
जब
हाई
कोर्ट
का
आदेश
भी
नहीं
माना
जाता
तो
फिर
आम
नागरिक
को
न्याय
की
उम्मीद
किससे
करनी
चाहिए?
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क्यों
और
किसे
दी
धमकी
भोज
अस्पताल
प्रशासन
बोला
लापरवाही
नहीं
हुई
मामले
में
भोज
अस्पताल
के
सिविल
सर्जन
डॉ.
मुकुंद
बर्मन
ने
लापरवाही
के
आरोपों
से
इनकार
किया।
उन्होंने
कहा
कि
पीड़िता
अस्पताल
में
दोपहर
12
बजे
पहुंची
थी,
जिसके
बाद
सभी
जरूरी
जांचें
की
गईं।
जांच
में
सामने
आया
कि
पीड़िता
सिकल
सेल
एनीमिया
से
पीड़ित
है,
जिस
कारण
धार
में
उसका
गर्भपात
कराना
संभव
नहीं
था।
इस
कारण
विशेषज्ञों
की
निगरानी
में
उसे
इंदौर
मेडिकल
कॉलेज
रेफर
किया
गया।
108
एंबुलेंस
समय
पर
नहीं
मिली
सिविल
सर्जन
के
अनुसार,
पीड़िता
को
रेफर
करने
के
लिए
108
एंबुलेंस
सेवा
को
कई
बार
कॉल
किया
गया,
लेकिन
वाहन
समय
पर
उपलब्ध
नहीं
हो
सका,
जिससे
देरी
हुई।
अंततः
शाम
4
बजे
पीड़िता
को
इंदौर
भेजा
गया
ताकि
गाइडलाइन
के
अनुसार
सुरक्षित
गर्भपात
किया
जा
सके।
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गलत
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जांच
रिपोर्ट
मांगी
गई
धार
जिले
के
मुख्य
चिकित्सा
एवं
स्वास्थ्य
अधिकारी
डॉ.
आरके
शिंदे
ने
बताया
कि
मामले
की
राज्य
स्तर
से
जांच
के
लिए
प्रतिवेदन
मांगा
गया
है,
जो
सिविल
सर्जन
द्वारा
तैयार
किया
जा
रहा
है।
उन्होंने
कहा
कि
प्रतिवेदन
तैयार
होने
के
बाद
ही
हम
स्थिति
स्पष्ट
रूप
से
बता
पाएंगे।