Shahdol News: सात माह में जन्मी बेहद कमजोर बच्ची को डॉक्टरों ने दी नई जिंदगी, इस तरह बचाई मासूम की जान; जानें


शहडोल
जिला
चिकित्सालय
के
एसएनसीयू
(स्पेशल
न्यूनेट
केयर
यूनिट)
की
चिकित्सा
टीम
ने
एक
अत्यंत
चुनौतीपूर्ण
स्थिति
का
सामना
करते
हुए
केवल
1.80
किलो
वजनी,
सात
माह
में
जन्मी
मरणासन्न
बच्ची
को
नया
जीवन
देने
में
सफलता
प्राप्त
की
है।
यह
घटना
16
अप्रैल
को
हुई,
जब
सोनाबाई
पाव,
ग्राम
सिंधली
की
निवासी,
को
प्राथमिक
स्वास्थ्य
केंद्र
केशवाही
से
जिला
अस्पताल
में
रेफर
किया
गया
था।

बच्ची
का
जन्म
16
अप्रैल
को
दोपहर
1.50
बजे
हुआ,
और
जन्म
के
समय
उसकी
स्थिति
बेहद
गंभीर
थी।
केवल
7
माह
के
गर्भ
में
जन्मी
इस
बच्ची
का
वजन
1
किलो
80
ग्राम
था,
जो
सामान्य
वजन
से
काफी
कम
था।
इस
प्रकार
के
नवजात
बच्चों
को
सांस
लेने
में
दिक्कत
होती
है,
और
बच्ची
को
तुरंत
एसएनसीयू
में
भर्ती
करवाया
गया,
जहां
चिकित्सा
टीम
ने
उसे
ऑक्सीजन
पर
रखकर
सपोर्टिव
ट्रेटमेंट
शुरू
किया।

डॉक्टरों
के
अनुसार,
इस
तरह
के
नवजात
बच्चों
को
समय
के
साथ
कई
जटिलताओं
का
सामना
करना
पड़ता
है।
डॉ.
सुनील
कुमार
हथगेल,
एसएनसीयू
के
इंचार्ज
ने
कहा।
हमारी
प्राथमिकता
उन्हें
स्थिर
करना
और
उनके
स्वास्थ्य
में
सुधार
करना
है।
एसएनसीयू
की
टीम
ने
बच्ची
का
उपचार
करने
में
अथक
परिश्रम
किया।
कई
दिनों
तक
बच्ची
को
इन्वसिव
वेंटीलेटर
सपोर्ट
पर
रखा
गया,
लेकिन
7-8
दिन
बाद
जब
उसकी
स्थिति
में
सुधार
हुआ,
तो
उसे
नॉन
इन्वसिव
वेंटीलेटर
सपोर्ट
पर
ले
जाया
गया।
दसवें
दिन
से
बच्ची
को
केवल
ऑक्सीजन
सपोर्ट
पर
रखा
गया।


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में
जुटी
पुलिस

बच्ची
के
स्वास्थ्य
में
सुधार
होते
ही
डॉक्टरों
ने
मां
का
दूध
देने
की
प्रक्रिया
भी
शुरू
की।
पंद्रहवें
दिन
से
मां
ने
कंगारू
मदर
केयर
का
पालन
करते
हुए
बच्चे
को
चम्मच
से
दूध
पिलाना
शुरू
किया।
दो
सप्ताह
बाद,
जब
रिपोर्ट
नार्मल
आई,
तो
एंटीबायोटिक
का
उपचार
बंद
कर
दिया
गया
और
बच्ची
अब
मां
का
दूध
पीने
में
सक्षम
हो
गई।

डॉ.
दीप
शिखा
नामदेव
ने
कहा
यह
एक
बहुत
ही
कठिन
यात्रा
थी,
लेकिन
हमारी
टीम
ने
धैर्य
और
दृढ़
संकल्प
के
साथ
कार्य
किया,
हमारे
लिए
हर
एक
नवजात
का
जीवन
बहुत
मूल्यवान
है
और
हम
अपनी
योग्यता
और
अनुभव
का
उपयोग
कर
उन्हें
बचाने
का
प्रयास
करते
हैं।
45
दिनों
के
अथक
प्रयासों
के
बाद,
बच्ची
का
वजन
अब
1
किलो
440
ग्राम
हो
गया
है,
और
उसे
टीकाकरण
के
बाद
एसएनसीयू
से
डिस्चार्ज
कर
दिया
गया
है।

जिला
चिकित्सालय
की
इस
सफलता
ने
यह
साबित
कर
दिया
है
कि
सरकारी
स्वास्थ्य
सेवाओं
में
भी
उच्च
स्तर
की
चिकित्सा
उपलब्ध
है।
यदि
यही
उपचार
प्राइवेट
संस्थानों
में
कराया
जाए,
तो
लाखों
रुपये
खर्च
करने
के
बावजूद
मरीज
को
बचाने
में
कठिनाई
हो
सकती
है।
इस
तरह
की
चुनौतियों
का
सामना
करने
के
लिए
एसएनसीयू
की
सभी
नर्सिंग
ऑफिसर,
सपोर्ट
स्टाफ
और
डॉक्टरों
की
महत्वपूर्ण
भूमिका
रही
है,
जिसने
इस
कठिन
दुरूह
स्थिति
को
पार
करने
में
मदद
की।
बच्ची
के
स्वस्थ
जीवन
की
शुरुआत
एक
नई
उम्मीद
लेकर
आई
है,
और
यह
जिले
के
स्वास्थ्य
सेवाओं
में
एक
महत्वपूर्ण
उपलब्धि
के
रूप
में
उभर
कर
सामने
आई
है।