विश्व साइकिल दिवस: पहले शादी में मिलती थी तो होता था गर्व, अब सुधार रही सबकी सेहत; आज भी जारी है साइकिल का सफर

पूरा
विश्व
तीन
जून
को
साइकिल
दिवस
मनाएगा।
अप्रैल
2018
में
संयुक्त
राष्ट्र
महासभा
ने
यह
दिन
विश्व
साइकिल
दिवस
के
रूप
में
घोषित
किया
था।
विश्व
स्वास्थ्य
संगठन
ने
भी
साइकिल
दिवस
पर
स्वास्थ्य
और
पर्यावरण
का
हितैषी
बताकर
इसकी
कई
उपयोगिता
का
वर्णन
किया
है। 


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साइकिल
का
आविष्कार
तो
18वीं
शताब्दी
में
हो
चुका
था,
पर
समय
और
वक्त
के
साथ
इसमें
सुधार
होता
गया
और
वर्तमान
में
हमें
इसका
आधुनिक,
सुधरा
और
नई
तकनीकों
से
सुसज्जित
रूप
देखने
को
मिल
रहा
है।
जब
साइकिल
में
नई
तकनीक
का
उपयोग
हुआ
तो
इसकी
कीमतों
में
भी
काफी
वृद्धि
हुई।
साइकिल
ऐसा
वाहन
है
जो
पर्यावरण
के
लिए
उपयोगी
होने
साथ
ध्वनि
प्रदूषण
रहित,
स्वास्थ्य
के
लिए
लाभकारी
और
रोजगार
प्रदान
करने
वाला
वाहन
है।
बात
करें
इतिहास
की
तो
इंदौर
में
एक
वक्त
था,
जब
साइकिल
का
भी
लाइसेंस
जारी
होता
था
और
नगर
निगम
इसे
चलाने
का
शुल्क
वसूलता
था। 


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दहेज
में
दी
जाती
थी
साइकिल

इंदौर
के
क्लर्क
कॉलोनी
निवासी
देवप्रकाश
शर्मा,
जिनकी
उम्र
100
वर्ष
है,
बताते
हैं
कि
एक
समय
किसी
के
पास
साइकिल
होना
बहुत
बड़ी
बात
थी।
विवाह
में
दहेज
में
साइकिल
देने
का
चलन
था।
मेरे
पिताजी
मुझे
बताते
थे
कि
हमारे
गांव
में
एक
साहूकार
ने
अपने
बेटे
को
साइकिल
दिलवाई,
आसपास
के
गांव
के
लोग
साइकिल
को
देखने
आते
थे
और
अचरज
करते
थे।
किसी
समय
साइकिल
होना
एक
गर्व
की
बात
मानी
जाती
थी।