
शरीर
को
निर्मल
वायु
की
आवश्यकता
होती
है।
यह
तो
विज्ञान
का
सत्यापित
सिद्धान्त
है।
परन्तु
अब
समय
आ
गया
है
यह
स्वीकारने
का,
कि
केवल
देह
ही
नहीं,
आत्मा
भी
श्वास
लेती
है।
आज
वह
अदृश्य,
घनघोर
प्रदूषण
में
जीवित
रहने
को
विवश
हो
चुकी
है।
यह
प्रदूषण
वायुमण्डल
का
नहीं,
चेतना
का
है।
यह
मन
का,
भावनाओं
का,
और
सूचना-भार
का
विषाक्त
धुआं
है,
जो
हमारी
सूक्ष्म
सत्ता
को
धीरे-धीरे
ग्रसता
जा
रहा
है।
वह
मन,
जो
कभी
शांत
सरोवर
की
भांति
गंभीर
और
स्वच्छ
था,
अब
निरंतर
कोलाहल
से
भर
गया
है,
और
यह
कोलाहल
बाहरी
नहीं,
भीतरी
है।
हम
प्रतिदिन
असंख्य
अपूर्ण
जानकारियों,
असंतुलित
मतों,
विवादों,
आकांक्षाओं
और
उत्तेजक
विचारों
से
घिरे
रहते
हैं।
नित्य
हम
किसी
यंत्रवत्
गति
में
फिर
चाहे
वह
मोबाइल
उपकरणों
पर
अंगुलियों
से
फिसलते
हुए,
संदेशों
में
उलझते,
और
कृत्रिम
प्रकाश
में
डूबते
हुए
हो
उस
निर्मल
चेतना
से
दूर
होते
जा
रहे
हैं,
जो
आत्मा
का
स्वाभाविक
आकाश
हुआ
करती
थी।
आज
की
आत्मा
ऐसी
वायु
में
सांस
ले
रही
है,
जो
बोझिल
है।
सूचनाओं
के
भार
से,
विकल्पों
की
अधिकता
से,
और
सतत
चित्तवृत्तियों
से।
उसे
चाहिये
वह
प्राणवायु,
जो
हिमालय
की
ऊंचाईयों
में
स्वतः
उपलब्ध
होती
है।
यहां
न
कोई
लक्ष्य
का
शोर
है,
न
किसी
उपलब्धि
की
आकुलता;
वहां
केवल
एक
मौन
है,
और
उसी
मौन
में
जीवन
की
गहनता।
आज
का
मानव
“इन्द्रिय-भारातिरेक”
का
शिकार
हो
चुका
है।
हमारी
ज्ञानेन्द्रियां
और
मन
निरन्तर
दृश्य,
ध्वनि,
रंग,
गति
और
तत्क्षणिक
प्रतिक्रियाओं
से
आक्रांत
हैं।
इसका
परिणाम
एक
प्रकार
का
मानसिक
कुहासा
है,
जिसे
आधुनिक
मनोविज्ञान
चिन्तन-धूम्रपटल
कहता
है।
यह
वह
अवस्था
है
जहां
न
विचारों
में
स्पष्टता
शेष
रहती
है,
न
ही
भावों
में
स्थिरता।
विज्ञापन
हमारे
भीतर
कोई
‘प्राकृतिक
विश्राम’
अब
शेष
न
रहा
हो
यह
मानसिक
प्रदूषण
केवल
विचारों
तक
सीमित
नहीं
बल्कि
यह
हमारी
स्नायु
प्रणाली
(नर्वस
सिस्टम)
तक
उतर
चुका
है।
हमारी
देह
अब
सामान्य
स्थिति
में
भी
ऐसी
सजगता
में
रहती
है,
जैसे
वह
किसी
संकट
से
जूझ
रही
हो।
“लड़ो,
भागो
या
स्थिर
हो
जाओ”
यानि
फाइट,
फ्लाइट
और
स्टे
की
त्रिविध
जैविक
प्रतिक्रियाएं
अब
केवल
विषम
परिस्थितियों
में
नहीं,
बल्कि
दैनिक
जीवन
में
भी
स्वाभाविक
रूप
से
क्रियाशील
हैं।
हम
दिनचर्या
के
सामान्य
क्षणों
में
भी
जैसे
किसी
अदृश्य
संकट
में
साँस
ले
रहे
हों
ऐसा
प्रतीत
होता
है।
जैसे
हमारे
भीतर
कोई
‘प्राकृतिक
विश्राम’
अब
शेष
न
रहा
हो।
और
इस
समस्त
आन्तरिक
विषमता
के
मध्य
हमारी
आत्मा
मौन
हो
गई
है।
पढ़ें: जिजीविषा:
विवेक
में
समाहित
शांति,
मौन
में
आत्मा
ब्रह्म
से
मिलती
है
और
हम
स्वयं
से
वह
मौन
पुकारती
है
और
वायु
की
मांग
करती
है
यह
कोई
स्थूल
परिस्थिति
नहीं
है
अपितु
वह
अतीव
सूक्ष्म
थकावट
है,
जिसे
न
कोई
परिभाषा
मिलती
है,
न
ही
कोई
स्पष्ट
अभिव्यक्ति।
उसका
भार
सम्पूर्ण
अस्तित्व
पर
ऐसी
चुप्पी
की
तरह
छा
जाता
है,
जो
भीतर
ही
भीतर
सांस
रोक
लेती
है।
कभी
आपने
अनुभव
किया
होगा
जब
आप
गहराई
से
श्वास
लेना
चाहते
हैं,
पर
भीतर
जैसे
कोई
अदृश्य
परत,
कोई
अनाम
बाधा,
उस
श्वास
को
रोक
देती
है।
वही
क्षण
आत्मा
की
घुटन
का
होता
है।
वह
मौन
पुकारती
है
और
वायु
की
मांग
करती
है।
ऐसी
वायु
जिसमें
मौन
हो,
करुणा
हो,
सहजता
हो।
ऐसी
प्राणवायु
जो
आकाश
के
समान
व्यापक
हो
और
पृथ्वी
की
भांति
स्थिर।
यह
वह
थकान
है
जो
शरीर
नहीं,
चेतना
को
जकड़ती
है।
यह
वह
बोझ
है
जो
किसी
वस्तु
के
उठाने
से
नहीं,
सतत्
भावनात्मक
विषाक्तता
से
उत्पन्न
होता
है।
आधुनिक
मनोविज्ञान
ने
अब
एक
नया
शब्द
स्वीकार
किया
है,
‘भावनात्मक
प्रदूषण’।
यह
वह
स्थिति
है
जहां
मनुष्य
प्रतिदिन
ईर्ष्या,
प्रतिस्पर्धा,
आत्म-ग्लानि,
भय,
और
अतृप्त
आकांक्षाओं
से
भरे
भावों
के
कुहासे
में
जी
रहा
है।
ये
भावनाएं
किसी
धुएं
के
समान
हमारी
सूक्ष्म
ऊर्जा
में
भरती
जाती
हैं।
जैसे
अत्यधिक
कार्बन
डाइऑक्साइड
से
फेफड़े
काम
करना
बंद
कर
देते
हैं,
वैसे
ही
यह
भावनात्मक
विष
हमारे
अन्तःकरण
को
प्रतिक्रिया-रहित,
अनुभवशून्य
बना
देता
है।
कब
रोना
‘उचित’
है,
कब
हंसना
‘उत्पादक’
है
अब
हंसी
स्वाभाविक
नहीं
रही;
वह
भी
किसी
‘रील’
या
‘स्टेटस’
की
प्रतीक्षा
करती
है।
आंसू
अब
स्वतः
नहीं
बहते;
वे
भी
किसी
निर्धारित
समय
पर
‘स्वीकार्य’
होते
हैं।
हमारी
संवेदनाएं
अब
समय-सारिणी
पर
निर्भर
हो
गई
हैं।
यह
संकेत
है
कि
आत्मा
की
श्वास
अब
मंद
पड़
गई
है।
मनुष्य
के
भीतर
जो
सहजता
थी,
जो
बिना
प्रयास
के
भावनाओं
का
प्रवाह
बनाये
रखती
थी,
वह
अब
अवरुद्ध
हो
चुकी
है।
अब
हमें
सिखाया
जाता
है
कि
कब
रोना
‘उचित’
है,
कब
हँसना
‘उत्पादक’
है,
कब
मौन
रहना
‘प्रासंगिक’
है।
इसी
कृत्रिमता
में
हमारी
आत्मा
साँस
लेना
भूल
गई
है।
आत्मा
की
संवेदना
कुंद
हो
चुकी
है
आधुनिक
न्यूरोसाइंस
कहता
है
कि
मस्तिष्क
की
अपनी
संरचना
को
बदलने
की
क्षमता
आज
के
डिजिटल
वातावरण
में
नकारात्मक
दिशा
में
तेजी
से
सक्रिय
है।
किन्तु
सत्य
तो
यह
है
कि
हमारी
आध्यात्मिक
संरचना
भी
अब
लचीली
नहीं
रही।
हमने
इतना
“देखा-सुना”
है
कि
अब
कुछ
भी
छूता
नहीं
है।
आत्मा
की
संवेदना
कुंद
हो
चुकी
है।
वह
मांगती
है
स्थिरता,
पर
हमें
तो
गति
चाहिए।
वह
मांगती
है
मौन,
पर
हम
तो
शोर
में
खुद
को
सुरक्षित
महसूस
करते
हैं।
वह
मांगती
है
सम्बन्ध,
पर
हम
तो
“कनेक्टिविटी”
के
भ्रम
में
खो
चुके
हैं।
क्या
आपने
कभी
गौर
किया
है
कि
जब
हम
प्रकृति
में
जाते
हैं
एक
नदी
के
पास,
किसी
जंगल
के
किनारे,
या
खुले
मैदान
में
तो
अचानक
शान्ति
प्राप्त
होती
है?
ऐसा
महसूस
होता
है
जो
पहले
नहीं
हुआ
था?
वह
आत्मा
की
प्रसन्नता
है।
हमें
अब
इस
अदृश्य
पर्यावरण
को
समझना
होगा।
विचारों
का
पर्यावरण,
भावनाओं
का
पर्यावरण,
आत्मिक
ऊर्जा
का
पर्यावरण।
हमारे
भीतर
और
बाहर
का
पर्यावरण
परस्पर
जुड़ा
हुआ
है।
जब
हम
अपने
आंतरिक
पर्यावरण
को
शुद्ध
करते
हैं,
तभी
बाहरी
पर्यावरण
भी
शुद्ध
होता
है।
आत्मा
की
शुद्धि
के
लिए
हमें
अपने
विचारों,
भावनाओं
और
अनुभवों
के
पर्यावरण
को
शुद्ध
करना
होगा।
यह
केवल
बाहरी
प्रदूषण
से
लड़ने
की
बात
नहीं
है,
बल्कि
आंतरिक
प्रदूषण
से
भी
मुक्ति
पाने
की
आवश्यकता
है।
जब
हम
अपने
भीतर
के
वृक्ष
को
सींचेंगे,
तभी
वह
बाहरी
वृक्षों
की
छाया
में
विश्राम
कर
सकेगा।
तो
इस
पर्यावरण
दिवस,
जब
हम
वृक्ष
लगाने
जाएं,
तो
एक
वृक्ष
अपने
भीतर
भी
लगाएं।
ऐसा
वृक्ष
जो
विचारों
की
शुद्ध
वायु
दे,
ऐसा
वृक्ष
जिसकी
छाया
में
आत्मा
कभी
दम
न
तोड़े।
और
जब
अगली
बार
सांस
लें,
तो
पूछिए
क्या
यह
सांस
केवल
फेफड़ों
के
लिए
थी,
या
आत्मा
के
लिए
भी?
क्योंकि
आत्मा
जब
ऑक्सीजन
माँगने
लगे,
तो
समझिए
अब
वक्त
आ
गया
है
पुनः
जीवित
होने
का।
डिस्क्लेमर
(अस्वीकरण):
यह
लेखक
के
निजी
विचार
हैं।
आलेख
में
शामिल
सूचना
और
तथ्यों
की
सटीकता,
संपूर्णता
के
लिए
अमर
उजाला
उत्तरदायी
नहीं
है।
अपने
विचार
हमें
blog@auw.co.in
पर
भेज
सकते
हैं।
लेख
के
साथ
संक्षिप्त
परिचय
और
फोटो
भी
संलग्न
करें।