
देश
में
पहली
बार
कैसे
हुए
थे
लोकसभा
चुनाव
(Photo:
Getty)
फर्ज़
कीजिए
कि
आपको
वोट
डालने
जाना
है
अपनी
गाड़ी
पर
नहीं
बैलगाड़ी
पर,
आपका
पोलिंग
बूथ
सड़क
पार
नहीं
बल्कि
नदी
के
पार
है
और
वोट
डालने
में
आपका
पूरा
दिन
ही
निकल
जा
रहा
है.
सोचिए
कि
अगर
ये
आज
का
माहौल
होता
तो
वोट
डालना
कितना
मुश्किल
काम
होता,
लेकिन
जब
इस
देश
में
पहली
बार
चुनाव
हुए
थे
तो
कुछ
ऐसे
ही
हुए
थे.
तब
लोग
इतने
पढ़े
लिखे
नहीं
थे,
चुनाव
वगैरह
क्या
होता
है
किसी
को
मालूम
नहीं
था,
सरकार
क्या
होती
है
और
क्या
करती
है
ये
भी
मालूम
नहीं
था.
लेकिन
इन
सबके
बावजूद
करीब
आधी
आबादी
ने
वोट
डाला
था,
सरकार
भी
चुनी
थी
और
दुनिया
को
बता
दिया
था
कि
हिन्दुस्तान
सबसे
बड़ा
लोकतंत्र
बन
सकता
है.
1947
में
हिन्दुस्तान
आज़ाद
हुआ,
अंग्रेज़ों
ने
जाने
से
पहले
एक
अस्थाई
सरकार
की
व्यवस्था
कर
दी
थी.
तब
भी
कांग्रेस
ही
सरकार
चला
रही
थी
और
जवाहर
लाल
नेहरू
हमारे
देश
के
प्रधानमंत्री
हुआ
करते
थे.
आज़ादी
के
बाद
के
दो-तीन
साल
तो
व्यवस्थाएं
बनाने,
संविधान
बनाने
और
बाकी
चीज़ों
में
लग
गए.
लेकिन
जब
1950
में
गणतंत्र
लागू
हुआ,
तब
ये
साफ
हो
गया
कि
अब
चुना
कराने
की
बारी
आ
गई
है
और
इसी
के
साथ
दुनिया
के
सबसे
बड़े
चुनाव
की
तैयारी
शुरू
हुई.
जैसे
ही
देश
में
गणतंत्र
लागू
हुआ,
चुनाव
आयोग
का
भी
गठन
कर
दिया
गया.
देश
के
पहले
मुख्य
चुनाव
आयुक्त
की
ज़िम्मेदारी
सुकुमार
सेन
को
दी
गई.
लोकसभा
चुनाव
1952
(Getty)
उस
वक्त
अलग-अलग
मसले
थे,
क्योंकि
इतने
ज्यादा
राज्य
नहीं
थे
और
अभी-अभी
रियासतों
को
साथ
में
जोड़ा
गया
था
ऐसे
में
सवाल
था
कि
सीटें
किस
तरह
बांटी
जाएंगी
या
फिर
किसे
चुनाव
लड़ने
का
मौका
दिया
जाएगा.
बड़े
कांग्रेस
नेता
या
फिर
रसूखदार
लोग
तो
चुनाव
लड़
ही
रहे
थे,
लेकिन
कमज़ोर
वर्ग
को
भी
तो
मौका
देना
था
ऐसे
में
कुछ
सीटों
पर
उनके
लिए
भी
व्यवस्था
की
गई.
देश
के
पहले
चुनाव
के
लिए
कुल
499
सीटों
पर
लोकसभा
का
मतदान
हुआ
और
इसी
के
साथ
राज्य
की
विधानसभाओं
के
लिए
भी
वोट
डाले
गए
थे,
दोनों
को
मिला
दें
तो
ये
संख्या
4500
तक
पहुंचती
है.
सीटें
वगैरह
तो
तय
हो
गई,
लेकिन
मसला
ये
था
कि
चुनाव
होगा
कैसे.
क्योंकि
एक
तो
देश
ने
कभी
इतने
बड़े
चुनाव
देखे
नहीं
थे,
ऐसे
में
पहले
तो
ऐसी
व्यवस्था
तैयार
करनी
थी
कि
चुनाव
पड़
सकें,
साथ
ही
लोग
वोट
कैसे
डालेंगे,
ये
भी
उन्हें
सिखाना
था.
पहले
चुनाव
के
वक्त
देश
में
17
करोड़
वोटर
थे,
इसमें
से
80
फीसदी
ऐसे
थे
जो
पढ़
लिख
नहीं
सकते
थे.
चुनाव
आयोग
के
सामने
यही
चुनौती
थी.
मशहूर
इतिहासकार
रामचंद्र
गुहा
ने
अपनी
किताब
‘इंडिया
आफ़्टर
गांधी’
में
पहले
आम
चुनाव
का
जिक्र
किया
है,
उन्होंने
बताया
है
कि
कैसे
देश
में
तब
करीब
सवा
दो
लाख
मतदान
केंद्र
बनाए
गए
थे,
तब
20
लाख
मतपेटियां
बनी
थी
जिसमें
लोग
वोट
डाल
सकें.
उस
वक्त
ईवीएम
तो
थी
नहीं,
ऐसे
में
हर
पार्टी
के
नाम
की
अलग-अलग
पेटी
बनी
थी
यानी
जिसे
जिस
पार्टी
को
वोट
डालना
है,
वो
उसके
नाम
से
बनी
पेटी
में
मत
डाल
दे.
17
हज़ार
लोग
लगाए
गए,
ताकि
वोटर
लिस्ट
बनाई
जा
सके.
रामचंद्र
गुहा
की
किताब-
इंडिया
आफ्टर
गांधी.
पहले
चुनाव
में
एक
गजब
तो
तब
हुआ
जब
करीब
80
लाख
महिलाओं
का
नाम
लिस्ट
में
नहीं
लिखा
गया,
क्योंकि
तब
महिलाएं
अपना
नाम
बताने
में
झिझकती
थीं
क्योंकि
उस
वक्त
महिलाओं
की
पहचान
किसी
की
पत्नी
या
फिर
किसी
की
बेटी
भर
ही
होती
थी,
इसलिए
चुनाव
आयोग
ने
ये
मुश्किल
भी
झेली.
खैर,
ये
मुश्किल
निपटी
तो
दूसरी
मुश्किल
सामने
आई,
वो
ये
कि
वोट
कैसे
डलवाएँ
जाएं,
क्यूंकि
देश
अलग-अलग
जगहों
पर
था.
तब
ये
एक्सप्रेस-वे
वगैरह
भी
नहीं
थे,
तो
कुछ
दूर-सुदूर
गांव
में
तो
नए-नए
पुल
बनाए
गए,
कई
जगह
टेंट
वगैरह
लगाए
गए
और
कहीं
पर
स्पेशल
नांव
चलाई
गई,
ताकि
मतदान
पेटी
गांवों
तक
पहुंच
जाए
या
फिर
वोट
डालने
वाले
ही
इस
तरफ
आ
जाए.
हिमाचल
प्रदेश
की
चिनी
तहसील
में
रहने
वाले
श्याम
सरन
नेगी
ने
आज़ाद
भारत
का
पहला
वोट
डाला
था.
अक्टूबर
साल
1951
में
आम
चुनाव
शुरू
हुए
थे,
जिसके
नतीजे
फरवरी
1952
में
आए
थे.
इन
आम
चुनाव
की
प्रक्रिया
से
पहले
सितंबर
1951
में
एक
तरह
से
रिहर्सल
के
तौर
पर
वोट
डलवाए
गए
थे
ताकि
आम
लोगों
को
वोट
डालने
का
तरीका
बता
दिया
जाए.
पहले
चुनाव
में
कांग्रेस
ही
मुख्य
पार्टी
थी,
जवाहर
लाल
नेहरू
का
ही
चेहरा
था
लेकिन
राष्ट्रीय-क्षेत्रीय
मिलाकर
करीब
50
पार्टियों
ने
चुनाव
लड़ा
था.
तब
लोकसभा
में
499
सीटें
थीं,
इनमें
से
489
के
लिए
चुनाव
हुए
और
बाकी
10
में
सदस्य
नामित
किए
गए.
इन
सीटों
में
से
364
सीटें
कांग्रेस
ने
जीती
थीं,
16
सीटों
के
साथ
सीपीआई
दूसरी
सबस
बड़ी
पार्टी
थी.
इसके
अलावा
कई
पार्टियों
ने
एक-एक,
दो-दो
सीटें
जीती
और
कई
निर्दलीय
भी
चुनाव
जीते
थे.
भारतीय
जनसंघ
जिसने
बाद
में
जाकर
भारतीय
जनता
पार्टी
का
रूप
लिया,
उसने
तब
3
सीटें
जीती
थीं.
कुल
जीतने
वोट
पड़े
थे
उसके
45
फीसदी
वोट
कांग्रेस
को
मिले
थे
और
इस
तरह
जवाहर
लाल
नेहरू
सबसे
बड़े
नेता
बने
और
आज़ाद
भारत
के
पहले
प्रधानमंत्री
भी
बने.