
सुप्रीम
कोर्ट
सुप्रीम
कोर्ट
ने
एक
फैसले
में
कहा
कि
जलवायु
परिवर्तन
जीवन
के
अधिकार
की
संवैधानिक
गारंटी
को
प्रभावित
करता
है।
ऐसे
में
सरकार
की
जिम्मेदारी
है
कि
जयवायु
संरक्षण
के
उपायों
पर
ठोस
कदम
उठाए
और
नागरिकों
को
मिले
अधिकारों
को
जीवंत
रखे.
रविवार
को
सुप्रीम
कोर्ट
का
एक
बड़ा
फैसला
सामने
आया
जिसमें
भारत
के
मुख्य
न्यायाधीश
डीवाई
चंद्रचूड़
की
अगुवाई
वाली
तीन-न्यायाधीशों
की
पीठ
ने
कहा
कि
संविधान
प्राकृतिक
दुनिया
के
महत्व
को
पहचानता
है.
कोर्ट
ने
आगे
कहा
कि
प्रकृति
को
बचाना
संविधान
के
अनुच्छेद
51
ए
के
खंड
(जी)
को
रेखांकित
करता
है.
जिसके
अंदर
भारत
के
हर
नागरिक
का
कर्तव्य
है
कि
वो
जंगलों,
झीलों,
नदियों
और
वाइल्ड
लाइफ
सहित
प्राकृतिक
पर्यावरण
की
रक्षा
और
सुधार
करे.
पीठ
ने
कहा
कि
हालांकि
ये
संविधान
का
ऐसा
प्रावधान
नहीं
है
जिस
पर
न्याय
दिया
जाए
लेकिन
ये
संकेत
हैं
कि
संविधान
प्राकृतिक
दुनिया
के
महत्व
को
पहचानता
है.
जीवन
के
अधिकार
का
हिस्सा
कोर्ट
ने
कहा
कि
अनुच्छेद
21
जीवन
और
व्यक्तिगत
स्वतंत्रता
के
अधिकार
को
मान्यता
देता
है
जबकि
अनुच्छेद
14
बताता
है
कि
सभी
व्यक्तियों
को
कानून
के
आधार
पर
समानता
(Equality
before
law)
और
कानूनों
का
समान
संरक्षण
मिलेगा
(Equal
protection
of
law).
हालांकि
कोर्ट
ने
कहा
कि
ये
अनुच्छेद
स्वच्छ
पर्यावरण
के
अधिकार
और
क्लाइमेट
चेंज
के
प्रभावों
के
खिलाफ
अधिकार
का
हिस्सा
हैं.
तीन
न्यायाधीशों
की
पीठ,
जिसमें
न्यायमूर्ति
जेबी
पारदीवाला
और
न्यायमूर्ति
मनोज
मिश्रा
भी
शामिल
थे
ने
आदेश
21
मार्च
को
पारित
किया
था.
लेकिन
इसका
विस्तार
से
आदेश
शनिवार
शाम
को
ही
अपलोड
किया
गया
था.
क्लाइमेट
चेंज
पर
नहीं
कोई
कानून
अदालत
ने
अपने
आदेश
में
कहा
कि
सरकारी
नीति
और
नियम-कायदों
के
बावजूद
क्लाइमेट
चेंज
के
प्रभावों
को
पहचानने
और
इससे
निपटने
की
कोशिश
करने
के
बावजूद,
भारत
में
कोई
एकल
या
व्यापक
कानून
नहीं
है
जो
क्लाइमेट
चेंज
और
संबंधित
चिंताओं
से
संबंधित
हो.
हालांकि,
इसका
मतलब
यह
नहीं
है
कि
भारत
के
लोगों
का
क्लाइमेट
चेंज
के
खतरनाक
असर
के
खिलाफ
अधिकार
नहीं
है.
अदालत
ने
आगे
कहा
कि
स्वच्छ
पर्यावरण
के
बिना
जीवन
का
अधिकार
पूरी
तरह
से
साकार
नहीं
हो
सकता
है.
स्वास्थ्य
का
अधिकार
(जो
अनुच्छेद
21
के
तहत
जीवन
के
अधिकार
का
एक
हिस्सा
है)
वायु
प्रदूषण,
वेक्टर
जनित
बीमारियों
में
बदलाव,
बढ़ते
तापमान,
सूखा,
खराब
फसल
की
वजह
से
खाद्य
आपूर्ति
में
कमी,
तूफान
और
बाढ़
जैसी
बातों
को
क्लाइमेट
चेंज
प्रभावित
करता
है.
विलुप्त
हो
रहे
पक्षी
यह
फैसला
21
मार्च
को
वाइल्ड
लाइफ
कार्यकर्ता
एमके
रंजीतसिंह
और
अन्य
की
ओर
से
ग्रेट
इंडियन
बस्टर्ड
पक्षी
(जीआईबी)
पक्षी
के
संरक्षण
के
लिए
दायर
याचिका
पर
आया
है,
जो
गंभीर
रूप
से
विलुप्त
होते
जा
रहे
हैं.
जबकि
ये
पक्षी
सिर्फ
राजस्थान
और
गुजरात
में
ही
पाया
जाता
है.
19
अप्रैल,
2021
को,
सुप्रीम
कोर्ट
की
एक
पीठ
ने
लगभग
99,000
वर्ग
किलोमीटर
के
क्षेत्र
में
ओवरहेड
ट्रांसमिशन
लाइनों
की
स्थापना
पर
प्रतिबंध
लगाने
का
आदेश
दिया
था
और
ओवरहेड
लो
और
हाई-वोल्टेज
लाइनों
को
भूमिगत
बिजली
लाइनों
में
बदलने
पर
विचार
किया
था.
टीम
का
गठन
पर्यावरण,
वन
और
जलवायु
परिवर्तन
मंत्रालय,
बिजली
मंत्रालय
और
नवीन
और
नवीकरणीय
ऊर्जा
मंत्रालय
ने
बाद
में
सुप्रीम
कोर्ट
से
संपर्क
किया
और
अपने
निर्देशों
में
संशोधन
की
मांग
की
थी.
अनुरोध
को
स्वीकार
करते
हुए,
पीठ
ने
तकनीकी
और
भूमि
अधिग्रहण
चुनौतियों
और
लागतों
सहित
आदेश
को
लागू
करने
में
व्यावहारिक
कठिनाइयों
की
ओर
इशारा
किया.अदालत
ने
इलाके,
जनसंख्या
घनत्व
और
बुनियादी
ढांचे
की
आवश्यकताओं
जैसे
कारकों
पर
विचार
करते
हुए
विशिष्ट
क्षेत्रों
में
बिजली
लाइनों
को
भूमिगत
करने
का
आकलन
करने
के
लिए
विशेषज्ञों
की
एक
नौ
सदस्यीय
समिति
भी
गठित
की.
इसने
समिति
को
अपना
काम
पूरा
करने
और
31
जुलाई,
2024
को
या
उससे
पहले
केंद्र
सरकार
के
माध्यम
से
अदालत
को
एक
रिपोर्ट
सौंपने
के
लिए
भी
कहा.