
सीबीआई
और
ईडी.
आजकल
सारी
केंद्रीय
जांच
एजेंसियां
संदेह
के
घेरे
में
हैं.
जैसे
ये
किसी
विरोधी
नेता
या
गैर
भाजपा
सरकार
के
किसी
नेता,
मंत्री
अथवा
मुख्यमंत्री
के
विरुद्ध
जांच
शुरू
होती
है,
तत्काल
एजेंसियों
पर
भेदभाव
का
आरोप
लग
जाता
है.
कई
जगह
तो
पब्लिक
इन
जांच
एजेंसियों
के
विरोध
में
मोर्चा
खोल
देती
है
तो
कहीं
राज्य
की
पुलिस
इनसे
लोहा
लेने
लगती
है.
ऐसे
में
यह
सवाल
उठना
लाजिमी
है
कि
आखिर
क्यों
केंद्रीय
जांच
एजेंसियों
की
साख
खतरे
में
पड़
गई
है.
ऐसा
नहीं
है
कि
पहले
इन
एजेंसियों
को
पवित्र
गाय
समझा
जाता
था.
लेकिन
इसके
बावजूद
आम
लोगों
में
केंद्रीय
जांच
ब्यूरो
(CBI)
को
लेकर
यह
भरोसा
था
कि
अब
दूध
का
दूध
और
पानी
का
पानी
होगा.
इसीलिए
हर
वारदात
पर
पीड़ित
पक्ष
CBI
जांच
की
मांग
करता
था.
पर
अब
यही
जांच
एजेंसियां
केंद्र
सरकार
के
हाथ
की
कठपुतली
बताई
जाती
हैं.
निशाने
पर
राजनेता
यह
हो
सकता
है
कि
राजनीति
में
मोदी
युग
की
शुरुआत
से
ही
चीजें
एकदम
से
बदल
गई
हैं.
एक
तो
राजनीति
में
भ्रष्टाचार
के
खिलाफ
मुहिम
के
चलते
वे
राजनेता
निशाने
पर
आ
जाते
हैं,
जो
गैर
भाजपा
दलों
से
हैं.
मोदी
युग
के
10
वर्ष
के
शासन
में
भाजपा
शासित
राज्यों
में
सत्ता
पक्ष
के
किसी
भी
नेता
पर
उंगली
नहीं
उठी
लेकिन
जहां
भाजपा
का
राज
नहीं
था,
वहां
पर
तो
सीधे-सीधे
मुख्यमंत्री
टारगेट
होते
रहे.
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इनमें
से
कांग्रेस,
ममता
बनर्जी
और
अरविंद
केजरीवाल
ने
मोर्चा
साध
लिया.
इन
नेताओं
का
आरोप
रहा,
कि
क्यों
उन
राजनेताओं
को
क्लीन
चिट
मिल
जाती
है,
जो
भयवश
भाजपा
में
आ
जाते
हैं.
क्यों
नहीं
भाजपा
अपने
गिरेबान
में
झांकती
है.
इन
सब
आरोपों
के
चलते
केंद्रीय
जांच
एजेंसियों
की
साख
संदेह
के
दायरे
में
हैं.
प्रधानमंत्री
के
खिलाफ
पुलिस
रिपोर्ट
आम
आदमी
पार्टी
के
राज्यसभा
सदस्य
संजय
सिंह
ने
तो
धमकी
दी
है,
कि
अगर
यही
हाल
रहा
तो
पंजाब,
झारखंड,
पश्चिम
बंगाल
और
तमिलनाडु
के
किसी
दूरस्थ
गांव
से
प्रधानमंत्री
के
खिलाफ
भी
पुलिस
रिपोर्ट
दर्ज
कराई
जा
सकती
है.
फिर
यहां
की
पुलिस
सीधे
प्रधानमंत्री
आवास
पर
उन्हें
तलाशती
हुई
पहुंच
जाएगी.
इस
तरह
के
बयान
किसी
भी
संवैधानिक
पद
की
गरिमा
के
खिलाफ
हैं.
लेकिन
यह
स्थिति
क्यों
पैदा
हुई,
इस
पर
भी
सोच-विचार
ज़रूरी
है.
आखिर
क्यों
CBI,
ED
और
NIA
के
अधिकारियों
के
खिलाफ
मोर्चा
साधा
जाता
है.
पश्चिम
बंगाल
में
ममता
बनर्जी
सरकार
में
ED
और
CBI
के
अफसरों
से
बदसलूकी
हुई.
अभी
रविवार
को
NIA
ने
बताया
है,
कि
पूर्वी
मेदिनीपुर
के
भूपति
नगर
ब्लास्ट
केस
की
जांच
करने
गए
उनके
एक
अधिकारियों
से
मारपीट
हुई.
यह
गंभीर
स्थिति
है.
ममता
बनर्जी
ने
पूछताछ
का
किया
विरोध
सबसे
गंभीर
मामला
तो
2019
का
है,
जब
शारदा
चिट
फंड
घोटाले
मामले
में
CBI
कोलकाता
गई,
वहां
उसे
पुलिस
आयुक्त
राजीव
कुमार
से
पूछताछ
करनी
थी.
लेकिन
CBI
जैसे
ही
राजीव
कुमार
के
घर
पहुंची,
तत्काल
मुख्यमंत्री
ममता
बनर्जी
भी
उनके
घर
पहुंच
गईं.
ममता
बनर्जी
ने
इस
पूछताछ
का
विरोध
किया
और
धर्मतल्ला
मेट्रो
स्टेशन
के
समीप
वे
धरने
पर
बैठ
गईं.
किसी
राज्य
सरकार
द्वारा
CBI
का
इस
तरह
विरोध
करने
की
यह
पहली
घटना
थी.
इसके
बाद
तो
केंद्रीय
एजेंसियों
को
केंद्र
की
सत्ता
का
हथियार
बताया
जाने
लगा.
हालांकि
मोदी
युग
के
एक
वर्ष
पहले
जब
यूपीए
के
डॉक्टर
मनमोहन
सिंह
की
सरकार
थी
तब
सुप्रीम
कोर्ट
ने
CBI
की
खूब
खिंचाई
की
थी
और
इसे
केंद्र
का
तोता
बता
दिया
था.
कोयला
ब्लॉक
आवंटन
घोटाले
पर
टिप्पणी
करते
हुए
सुप्रीम
कोर्ट
ने
इसे
पिंजरे
में
बंद
तोता
कहा
था.
ED
अधिकारियों
पर
हमला
ममता
बनर्जी
ने
ED
पर
भी
हमला
किया
था.
अभी
5
जनवरी
को
संदेशख़ाली
मामले
के
आरोपी
शाहजहां
शेख़
को
पकड़ने
गई
ED
अधिकारियों
और
केंद्रीय
सुरक्षा
बल
के
जवानों
पर
हमला
हुआ
था.
लगभग
एक
हजार
लोगों
की
भीड़
इन
अफसरों
पर
टूट
पड़ी
थी.
ताजा
मामला
NIA
पर
हमले
का
है.
2022
में
हुए
भूपति
नगर
ब्लास्ट
केस
की
जांच
के
लिए
शनिवार
को
NIA
की
टीम
पूर्वी
मेदिनीपुर
के
इस
क्षेत्र
में
गई
थी.
इसके
बाद
दोनों
तरफ़
से
रिपोर्ट
दर्ज
कराई
गई.
वहीं
एक
महिला
ने
NIA
अफ़सरों
और
उनके
साथ
गए
CRPF
जवानों
के
विरुद्ध
छेड़छाड़
का
आरोप
लगाते
हुए
रिपोर्ट
दर्ज
कराई
है.
मुख्यमंत्री
ममता
बनर्जी
का
कहना
है,
आख़िर
रात
के
अंधेरे
में
NIA
की
टीम
जांच
करने
गई
ही
क्यों
थी?
शनिवार
को
NIA
की
टीम
पर
हमला
हुआ
था.
केंद्रीय
एजेंसियों
और
राज्य
सरकारों
के
बीच
रार
सवाल
यह
पैदा
होता
है,
इस
तरह
बार-बार
केंद्रीय
एजेंसियों
और
राज्य
सरकारों
के
बीच
रार
क्यों
ठन
रही
है.
ग़ैर
भाजपा
शासित
राज्य
सरकारें
केंद्रीय
जांच
एजेंसियों
से
क़तई
सहयोग
नहीं
करतीं.
पश्चिम
बंगाल,
झारखंड,
तमिलनाडु,
पंजाब
और
दिल्ली
के
मुख्यमंत्रियों
ने
जिस
तरह
से
इन
एजेंसियों,
ख़ासकर
ED
पर
निशाना
साधा
है,
वह
दुखद
है.
अगर
इसी
तरह
केंद्रीय
एजेंसियों
पर
हमला
होता
रहा
तो
किसी
दिन
ये
एजेंसियां
भी
राज्यों
की
पुलिस
की
तरह
बदनाम
हो
जाएंगी.
CBI,
ED,
NIA
इन
तीनों
प्रमुख
केंद्रीय
एजेंसियों
के
पास
सुप्रीम
पावर
होती
है.
इसीलिए
इन
तीनों
एजेंसियों
के
अध्यक्ष
अथवा
निदेशक
की
नियुक्ति
संवैधानिक
दायरे
में
रह
कर
की
जाती
है.
CBI
की
नियुक्ति
में
तो
प्रधानमंत्री,
लोकसभा
में
नेता
विरोधी
दल
और
सुप्रीम
कोर्ट
के
चीफ़
जस्टिस
मिल
कर
तय
करते
हैं.
इसी
तरह
मनी
लांड्रिंग
की
जांच
करने
वाली
एजेंसी
ED
के
निदेशक
को
केंद्रीय
सतर्कता
आयोग
(CVC)
क़ानून
2003
की
धारा
25
के
तहत
नियुक्त
किया
जाता
है.
इसकी
नियुक्ति
में
CVC
अध्यक्ष,
गृह
मंत्रालय,
कार्मिक
मंत्रालय
और
केंद्रीय
वित्त
मंत्रालय
के
सचिव
शरीक
रहते
हैं.
प्रवर्तन
निदेश
(ED)
के
पास
मनी
लांड्रिंग
की
जांच
के
लिए
काफ़ी
अधिकार
होते
हैं.
ED
को
बड़ी
राहत
1999
का
विदेशी
मुद्रा
प्रबंधन
अधिनियम
(FEMA),
2002
का
धन
शोधन
निवारण
अधिनियम
(PMLA)
और
2018
का
भगोड़े
आर्थिक
अपराधी
क़ानून
(FEOA)
के
अतिरिक्त
1974
में
बना
विदेशी
मुद्रा
का
संरक्षण
और
तस्करी
रोकथाम
क़ानून
(COFEPOSA)
आदि
क़ानूनों
के
लिए
ED
काम
करता
है.
लेकिन
ED
अभी
तक
कुल
23
मामले
सुलटा
पाई
है.
इससे
स्पष्ट
है
कि
ED
के
अधिकारी
किसी
के
इशारे
पर
काम
करते
हैं.
हालांकि
अप्रैल
2023
में,
मुख्य
न्यायाधीश
डीवाई
चंद्रचूड़
और
जेबी
पारदीवाला
की
पीठ
ने
CBI
जैसी
केंद्रीय
एजेंसियों
के
कथित
दुरुपयोग
पर
14
राजनीतिक
दलों
द्वारा
दायर
याचिका
पर
विचार
करने
से
इनकार
करके
ED
को
बड़ी
राहत
दी
थी.
नियुक्ति
में
पूरी
पारदर्शिता
एनआईए
की
स्थापना
2008
के
मुंबई
आतंकवादी
हमले
के
कारण
2008
के
एनआईए
अधिनियम
में
की
गई
थी.
कैबिनेट
की
नियुक्ति
समिति
(एसीसी)
एनआईए
के
महानिदेशक
हेतु
किसी
की
नियुक्ति
करती
है.
ऊपरी
तौर
पर
इन
एजेंसियों
की
नियुक्ति
में
पूरी
पारदर्शिता
है.
लेकिन
इन
एजेंसियों
द्वारा
की
गई
जांच
के
ब्योरे
की
जब
भी
पड़ताल
की
जाती
है
तो
पता
चला
अधिकतर
मामलों
में
ये
एजेंसियां
फेल
रहीं.
यही
कारण
है
कि
CBI
और
स्टेट
पुलिस
के
टकराव
के
किस्से
खूब
सुनने
को
मिलते
हैं.
एजेंसियों
की
कार्यशैली
पर
सवाल
चूंकि
ED
का
कार्यक्षेत्र
मनी
लांड्रिंग
के
मामले
हैं,
इसलिए
स्टेट
पुलिस
से
इसका
सीधा
टकराव
तो
नहीं
होता
लेकिन
यह
सुनने
को
अक्सर
मिलता
है,
कि
विरोधी
नेताओं
को
मनी
लांड्रिंग
के
ट्रैप
में
लिया
जाता
है.
और
अब
तो
NIA
की
जांच
पर
भी
सवाल
उठाए
जा
रहे
हैं.
अगर
इस
तरह
केंद्रीय
जांच
एजेंसियों
की
कार्यशैली
पर
उंगलियां
उठती
रहीं
तो
धीरे-धीरे
ये
एजेंसियां
भी
सिर्फ़
राज्यों
की
पुलिस
की
तरह
दिखावटी
रह
जाएंगी.
इनको
बचाने
के
लिए
सत्ता
पक्ष,
विरोधी
दल
और
राज्य
सरकारें
तथा
केंद्र
सरकार
सबका
दायित्त्व
बनता
है.
इनकी
साख
को
बचाए
रखना
ज़रूरी
है.