मुस्लिम परस्त है कांग्रेस का मेनिफेस्टो? PM मोदी के हमले से कितना होगा नुकसान?

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मुस्लिम परस्त है कांग्रेस का मेनिफेस्टो? PM मोदी के हमले से कितना होगा नुकसान?


कांग्रेस
घोषणा
पत्र
पर
चौतरफा
हमला

2024
के
लोकसभा
चुनाव
के
लिए
कांग्रेस
का
घोषणापत्र
आते
ही
भाजपा
ने
उस
पर
हमला
शुरू
कर
दिया.
तत्काल
भाजपा
प्रवक्ता
सुधांशु
त्रिवेदी
ने
इसे
झूठ
का
पुलिंदा
बता
दिया
था.
मगर
प्रधानमंत्री
मोदी
ने
बिहार,
यूपी
और
राजस्थान
की
जन
सभाओं
में
इस
घोषणापत्र
को
मुस्लिम
लीग
की
तर्ज
पर
बनाया
हुआ
बता
दिया.
कांग्रेस
के
लिए
सुधांशु
त्रिवेदी
की
आलोचना
उतनी
पीड़ा
देने
वाली
नहीं
थी,
जितनी
कि
प्रधानमंत्री
द्वारा
इसे
मुस्लिम
लीग
का
घोषणापत्र
बता
देना.
इस
बहाने
प्रधानमंत्री
ने
कांग्रेस
पर
एक
तरह
से
मुस्लिम
परस्ती
का
आरोप
लगा
दिया.
प्रकारांतर
में
यह
आरोप
हिंदुओं
को
एकजुट
हो
जाने
का
आह्वान
करता
है.
चुनाव
में
सफलता
की
उम्मीद
लेकर
उतरी
कोई
भी
पोलेटिकल
पार्टी
यह
कैसे
मंज़ूर
कर
ले
कि
वह
अल्पसंख्यकों
को
संरक्षण
दे
रही
है.
कांग्रेस
ने
इसकी
शिकायत
चुनाव
आयोग
से
भी
की
है.

कांग्रेस
की
दिक्कत
यह
है
कि
यह
एक
अकेली
ऐसी
राजनीतिक
पार्टी
है,
जिसमें
वामपंथी
और
दक्षिणपंथी
विचारों
दोनों
का
दखल
रहता
है.
ब्रिटेन
और
अमेरिका
की
तर्ज
पर
बने
जिन-जिन
अन्य
देशों
में
लोकतंत्र
है,
वहां
लिबरल
और
कंजरवेटिव
विचारों
के
लोग
अपने-अपने
पालों
में
रहते
हैं.
वे
अपने
निजी
फायदों
के
लिए
पार्टी
नहीं
बदलते.
परंतु
भारत
में
मध्यम
मार्ग
पर
जोर
रहा
है,
इसलिए
शुरू
से
दोनों
तरह
की
विचारों
वाले
नेता
इस
संगठन
में
रहे
हैं.
आजादी
के
पहले
कांग्रेस
एक
राजनैतिक
दल
कम
अंग्रेजों
से
आजादी
चाहने
वाला
नरम
दलीय
संगठन
रहा
है.
कांग्रेस
धरने-प्रदर्शन
से
आजादी
चाहती
थी.
इसलिए
कांग्रेस
ने
सशस्त्र
क्रांति
की
बजाय
सदैव
शांति
का
रास्ता
चुना.
शायद
इसके
पीछे
1857
की
वह
क्रांति
रही
होगी,
जिसे
अंग्रेजों
ने
बर्बरता
पूर्वक
दबा
दिया
था.

घोषणापत्र
में
अल्पसंख्यकों
को
पर्सनल
लॉ
जैसे
वादे

आजादी
के
बाद
भी
पटेल
और
नेहरू
के
बीच
तल्खी
के
कारण
कांग्रेस
कोई
स्पष्ट
लाइन
खींच
नहीं
पाई.
नतीजन
धुर
वामपंथियों
ने
अपनी
पार्टी
बनाई
और
दूसरी
ओर
धुर
दक्षिणपंथियों
ने
अपनी.
परंतु
कांग्रेस
कभी
दाएं
तो
कभी
बाएं
झुकती
ही
रही.
इसीलिए
कांग्रेस
दोनों
के
निशाने
पर
रही.
कांग्रेस
की
यह
सोच
आज
भी
दिखाई
पड़ती
है.
उसके
घोषणापत्र
में
जो
वायदे
किए
गए
हैं
वे
सभी
को
खुश
करने
वाले
अधिक
प्रतीत
होते
हैं.
यही
वजह
है
कि
घोषणापत्र
में
अल्पसंख्यकों
को
उनके
पर्सनल
लॉ
की
गारंटी
वाले
वायदे
पर
कांग्रेस
को
भाजपा
ने
घेर
लिया.
कांग्रेस
के
हर
कदम
पर
भाजपा
नजर
रखती
है
और
प्रधानमंत्री
नरेंद्र
मोदी
कोई
ऐसा
मौका
नहीं
चूकते,
जिससे
उन्हें
कांग्रेस
को
घेरने
का
मौका
मिले.
यही
कारण
है
कि
पांच
अप्रैल
को
कांग्रेस
का
घोषणापत्र
और
अगले
ही
रोज
प्रधानमंत्री
ने
कांग्रेस
पर
मुस्लिम
परस्ती
का
आरोप
लगा
दिया.

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दरअसल
कांग्रेस
ने
अपने
घोषणापत्र,
जिसे
उसने
न्याय
पत्र
कहा
है.
इसमें
स्पष्ट
उल्लेख
किया
है
कि
प्रत्येक
नागरिक
की
तरह
अल्पसंख्यकों
को
भी
पोशाक,
खान-पान,
भाषा
और
व्यक्तिगत
कानूनों
की
स्वतंत्रता
को
कांग्रेस
सुनिश्चित
करेगी.
भाजपा
ने
फौरन
इसे
मुसलमानों
के
पर्सनल
कानूनों
की
गारंटी
बताया
तथा
कहा
कि
यह
1936
के
मुस्लिम
लीग
के
घोषणापत्र
की
नकल
है.
हालांकि
मुस्लिम
लीग
ने
तब
लिखा
था,
मुसलमानों
के
कानून
उनकी
शरीयत
के
मुताबिक
हों.
कांग्रेस
ने
अपने
घोषणापत्र
में
कहा
है,
कि
2024
के
भारत
में
बहुसंख्यकवाद
के
लिए
कोई
जगह
नहीं
है.
तत्काल
इसे
भी
भाजपा
ने
88
वर्ष
पुराने
मुस्लिम
लीग
के
उस
घोषणापत्र
की
याद
दिला
दी,
जब
मुस्लिम
लीग
ने
बहुसंख्यक
वाद
से
लड़ते
रहने
का
वायदा
किया
था.

मेनिफेस्टो
पर
हिंदू-मुस्लिम
ध्रुवीकरण
का
भी
आरोप

इसी
तरह
कांग्रेस
ने
अपने
घोषणापत्र
में
मौलाना
आजाद
छात्रवृत्ति
का
भरोसा
दिया
है,
जो
अल्पसंख्यक
छात्रों
को
उच्च
शिक्षा
हेतु
मिलती
है.
बस
इसी
को
आधार
बना
कर
भाजपा
ने
कांग्रेस
पर
मुस्लिम
परस्ती
का
आरोप
लगा
दिया
और
चुनाव
के
मौके
पर
हिंदू-मुस्लिम
ध्रुवीकरण
कर
दिया.
जबकि
सच
यह
है
कि
कांग्रेस
ने
कोई
वायदा
ऐसा
नहीं
किया,
जो
मुसलमानों
को
विशेष
अधिकार
देती
हो.
मसलन
जम्मू-कश्मीर
से
धारा
370
को
हटाने
वाले
मामले
में
वह
चुप
रही
और
सिर्फ
इतना
ही
कहा
है
कि
पार्टी
इस
क्षेत्र
को
पूर्ण
राज्य
का
दर्जा
दिलाने
का
वायदा
करती
है.
कई
घोषणाएं
तो
भाजपा
सरकार
द्वारा
किए
गए
कामों
का
विस्तार
ही
हैं.
जैसे
2025
से
केंद्र
सरकार
की
आधी
नौकरियां
महिलाओं
के
लिए
आरक्षित
की
जाएंगी,
आदि.

कांग्रेस
ने
राजस्थान
की
अशोक
गहलोत
सरकार
के
समय
लागू
की
गई
चिरंजीवी
योजना
को
पूरे
देश
में
विस्तार
देने
की
घोषणा
की
है
तथा
25
लाख
रुपए
का
हेल्थ
इंश्योरेंस
देने
का
वायदा
भी.
अलबत्ता
कांग्रेस
ने
फिर
से
जातीय
जनगणना
कराने
की
बात
अपने
घोषणापत्र
में
की
है.
जबकि
जातीय
जनगणना
पर
रोक
1951
में
तब
की
पंडित
नेहरू
सरकार
ने
लगाई
थी.
देश
में
जाति
आधारित
आखिरी
जनगणना
1931
में
हुई
थी.
1941
में
सेकंड
वर्ल्ड
वार
के
चलते
जनगणना
नहीं
हुई
थी
और
1951
से
इस
पर
रोक
लग
गई.
तब
स्वयं
प्रधानमंत्री
नेहरू
जाति
आधारित
बंटवारे
के
खिलाफ
थे.
एक
तरह
से
इस
पर
जोर
दे
कर
कांग्रेस
अपने
ही
नेताओं
की
सोच
को
गलत
बता
रही
है.
मगर
भाजपा
ने
सिर्फ
इस
लाइन
पर
हमला
किया,
जिसमें
कहा
गया,
कांग्रेस
भोजन,
पहनावे,
प्यार,
शादी
और
भारत
के
किसी
हिस्से
में
यात्रा
या
निवास
की
व्यक्तिगत
पसंद
में
हस्तक्षेप
नहीं
करेगी.
हस्तक्षेप
करने
वाले
कानूनों
को
रद्द
किया
जाएगा.

घोषणा
पत्र
पर
भाजपा
के
आरोप
पड़े
भारी

भाजपा
को
इसी
पर
हमला
करने
से
फायदा
होता
दिख
रहा
है.
इस
घोषणापत्र
को
मुस्लिम
लीग
के
घोषणापत्र
से
जोड़
कर
भाजपा
ने
अपनी
बहुत
सारी
नाकामियों
को
छुपा
भी
लिया
है.
कांग्रेस
ने
अग्निपथ
योजना
को
समाप्त
कर
पुरानी
सेना
भर्ती
प्रणाली
बहाल
करने
की
घोषणा
की
है.
निश्चित
तौर
पर
कांग्रेस
का
यह
वायदा
भाजपा
को
भारी
पड़ता.
मगर
अब
कांग्रेस
अपने
मुस्लिम
परस्त

होने
की
सफाई
दे
रही
है.
इसी
तरह
वन
रैंक
वन
पेंशन
के
मामले
में
उसने
यूपीए
सरकार
के
आदेश
पर
अमल
की
घोषणा
की
है.
इसकी
भी
देश
के
पूर्व
सैनिकों
पर
सकारात्मक
असर
पड़ता.
कांग्रेस
ने
दिल्ली
सरकार
के
कामकाज
पर
कांग्रेस
ने
दिल्ली
सरकार
अधिनियम
1991
में
संशोधन
की
भी
बात
की
है.

यूं
कांग्रेस
ने
अपने
घोषणापत्र
के
किसी
भी
बिंदु
से
किसी
की
अवमानना
अथवा
किसी
भी
समुदाय
का
मनोबल
अनधिकृत
रूप
से
बढ़ाने
की
बात
नहीं
किया
है.
पर
उसके
समक्ष
जो
राजनीतिक
पार्टी
है,
उसके
चातुर्य
और
उसकी
रणनीति
में
कांग्रेस
उलझ
गई
है.
चुनाव
आयोग
से
शिकायत
उसने
भले
की
हो
और
आयोग
का
फैसला
कुछ
भी
आए
किंतु
कांग्रेस
उलझ
तो
गई
ही
है.
किसी
भी
स्पष्ट
लाइन
के

होने
का
अनावश्यक
रूप
से
नुकसान
कांग्रेस
को
उठाना
पड़
सकता
है.
भाजपा
तो
चाहती
ही
है
कि
चुनाव
में
उसे
बहुसंख्यकों
के
अंदर
भय
पैदा
करने
का
अवसर
मिल
जाए.
और
सत्य
यह
है
कि
फिलहाल
इस
मुद्दे
को
लेकर
भाजपा
और
हमलावर
होगी.
वह
कांग्रेस
को
मुस्लिम
लीग
की
तर्ज
पर
चलने
का
आरोप
और
तेजी
से
लगाएगी.