
वैदिक
परंपरा
में
कितना
पुराना
है
समिष
आहार
साल
2004
में
मैं
कानपुर
से
झांसी
जा
रहा
था.
उरई
पार
करने
के
बाद
चिरगांव
से
15
किमी
पहले
सड़क
किनारे
एक
मंदिर
में
मेला
लगा
दिखा.
जिज्ञासावश
मैंने
गाड़ी
रुकवाई
और
उतरने
को
था
कि
एक
आदमी
भाग
कर
आया
और
बोला,
देवी
मां
का
प्रसाद
ग्रहण
करिए.
उसने
ड्राइवर
की
लेफ्ट
साइड
का
दरवाजा
खोला
और
एक
ताजा
कटे
हुए
बकरे
का
सिर
रख
दिया.
ड्राइवर
तिवारी
भड़भड़ा
गया,
बोला,
सर
गाड़ी
मैं
नहीं
चलाऊंगा.
मैंने
कहा,
मुंह
मत
बनाना
और
पीछे
की
सीट
पर
आ
जाओ,
गाड़ी
मैं
चलाता
हूं.
मैंने
प्रसाद
देने
वाले
के
हाथ
जोड़े
और
गाड़ी
ड्राइव
करते
हुए
चला
गया.
बाद
में
पता
चला,
कि
ये
लोग
‘कबूतर’
हैं.
कभी
रानी
झांसी
की
सेना
में
सिपाही
थे,
किंतु
रानी
की
मृत्यु
के
बाद
ये
छुप
गए
और
अंग्रेजों
ने
इन्हें
‘कबूतर’
कहा
और
एक
जंगली
जाति
(ट्राइब)
बताया.
प्रसिद्ध
साहित्यकार
मैत्रेयी
पुष्पा
ने
इस
जाति
पर
‘अल्मा
कबूतरी’
नाम
से
एक
उपन्यास
भी
लिखा
है.
झांसी
से
गुवाहाटी
तक
पशुओं
की
बलि
चिरगांव
के
ही
राष्ट्रकवि
मैथिली
शरण
गुप्त
थे.
जो
परम
वैष्णव
थे
और
यह
क्षेत्र
भी
वैष्णव
लोगों
का
है,
जिन्होंने
हिंदुओं
में
शाकाहार
को
बल
दिया.
लेकिन
इसके
बावजूद
मांसाहार
और
पशुबलि
भी
यहां
यथावत
रहा.
कुछ
लोग
देवी-देवताओं
पर
भी
बलि
के
नाम
पर
पशुओं
को
अर्पित
करते
रहे
और
आज
भी
करते
हैं.
देश
के
पूर्वी
क्षेत्र
में
पशु
बलि
तो
एक
अनिवार्य
प्रथा
है.
कोलकाता
की
कालीबाड़ी,
भूतनाथ
मंदिर,
गुवाहाटी
के
कामाख्या
मंदिर
और
रांची
के
रजरप्पा
मंदिर
में
जानवरों
की
बलि
आज
भी
खूब
होती
है.
बलि
के
बाद
मांस
ही
श्रद्धालुओं
में
वितरित
होता
है.
बनारस
में
यदि
बाबा
विश्वनाथ
हैं
तो
यहीं
पर
विश्वनाथ
मंदिर
से
ढाई
किमी
दूर
बाबा
कीनाराम
की
स्मृति
में
बना
आश्रम
है.
इस
आश्रम
में
चिता
की
लकड़ी
से
भभूता
बनाया
जाता
है
और
इसकी
आग
से
भुनी
मछली
प्रसाद
के
रूप
में
मिलती
है.
बाबा
कीनाराम
का
एक
आश्रम
चंदौली
जिले
के
रामगढ़
में
है.
यहां
पर
वर्ष
में
एक
बार
मेला
लगता
है
और
यहां
के
महंत
के
आश्रम
में
मांस
हर
आगंतुक
को
परोसा
जाता
है.
मनु
स्मृति
में
भी
मांस
का
निषेध
नहीं
मनु
स्मृति
में
के
अध्याय
5
में
श्लोक
संख्या
30
में
कहा
गया
है
कि
”खाने
लायक
पशुओं
का
मांस
खाना
पाप
नहीं
है
क्योंकि
ब्रह्मा
ने
मांस
खाने
वाले
और
मांस
खाने
योग्य
पशुओं
दोनों
को
बनाया
है.”
यही
नहीं
श्लोक
संख्या
3.267
से
3.272
में
बलि
के
भोजन
के
हिस्से
के
रूप
में
मछली
और
हिरण,
मुर्गी,
बकरी,
भेड़,
खरगोश
और
अन्य
के
मांस
को
खाने
की
अनुमति
मनु
स्मृति
में
है.
श्लोक
11/95
में
कहा
गया
है,
”यक्षरक्षः
पिशाचान्नं
मद्यं
मांस
सुरा
ऽऽ
सवम्.
सद्
ब्राह्मणेन
नात्तव्यं
देवानामश्नता
हविः.”
सुश्रुत
ने
तो
सभी
तरह
के
पालतू
पशुओं
के
मांस
के
उपयोग
बताए
हैं.
अब
चूंकि
उत्तर
भारत
की
जमीन
कृषि
के
लिए
सर्वथा
उपयुक्त
है
और
हर
तरह
की
फसलें
भी
यहां
उगती
हैं,
इसलिए
उत्तर
भारत
में
मांस
खाने
की
परंपरा
बहुत
अधिक
नहीं
रही
है.
दुर्गा
पूजा
में
भी
बलि
बलि
देने
वालों
के
यहां
नवरात्रि
में
भी
पशु
बलि
दी
जाती
है.
और
ऐसा
हिंदुओं
की
सभी
जातियों
में
होता
है.
बंगाल
में
ब्राह्मण
दुर्गा
पूजा
के
अवसर
पर
पशु
बलि
को
शुभ
मानते
हैं,
वहां
भैंसे
की
बलि
दी
जाती
है.
अपने
कोलकाता
प्रवास
के
दौरान
मैंने
कालीबाड़ी
मंदिर
में
हर
बुधवार
को
भैंसा
कटते
हुए
देखा
था.
पुजारी
ही
यह
बलि
देते
थे.
कामाख्या
मंदिर
में
तो
आज
भी
बकरों
के
अतिरिक्त
भैंसे
की
बलि
भी
दी
जाती
है.
भारत
में
रहने
वाले
सभी
लोग
शाकाहारी
नहीं
हैं
और
न
ही
संपूर्ण
हिंदू
समाज
नवरात्रि
पर
मांसाहार
से
दूरी
बरतता
है.
बिहार
में
तो
हिंदुओं
की
हर
जाति
मांस
खाती
है.
मैथिल
ब्राह्मणों
में
तो
होली
के
दिन
मांस
खाना
शुभ
है.
यहां
तक
कि
वहां
जनेऊ
संस्कार
में
भी
मांस
पकता
है.
देश
के
70
प्रतिशत
इलाकों
में
मांसाहार
का
चलन
है.
उत्तर
में
नवरात्रि
पर
मांसाहार
की
वर्जना
उत्तर
भारत
के
अधिकांश
इलाकों
में
नवरात्रि
में
मांस
खाना
अवश्य
वर्जित
है,
लेकिन
शेष
भारत
में
नहीं.
हिंदू
धर्म
की
यही
विशेषता
उसे
अन्य
धर्मों
से
अलग
भी
करती
है.
यहां
आप
ईश्वर
के
अस्तित्त्व
को
स्वीकार
करो
न
करो.
मांसाहार
करो
या
शाकाहार
अथवा
सिर्फ
फल-मेवे
पर
गुजारा
करो,
आपके
हिंदू
होने
पर
कोई
सवाल
नहीं
उठा
सकता.
यही
बात
उसे
दुनिया
के
अन्य
धर्मों
से
अलग
भी
करती
है.
यहां
कोई
किताब
या
कोई
नियम
अथवा
खान-पान
में
भेद
इसे
बांधता
नहीं
है.
जो
भी
हिंदू
रहना
चाहे,
रहे.
इसलिए
यह
कहना
तर्कसंगत
नहीं
है
कि
नवरात्रि
में
मछली
खाना
हिंदू
धर्म
का
अपमान
है.
यह
कुछ
वैसा
ही
हो
गया
जैसा
कि
लालू
यादव
ने
प्रधानमंत्री
पर
टिप्पणी
करते
हुए
कहा
था
कि
वे
कैसे
बेटे
हैं,
जिन्होंने
अपनी
मां
की
मृत्यु
पर
बाल
नहीं
मुंडवाए
थे.
प्रोटीन
का
स्रोत
है
मछली
उत्तर
में
जो
कुछ
योद्धा
जातियां
मांसाहार
करती
थीं.
लेकिन
उनके
लिए
कभी
मंगलवार
के
नाम
पर
तो
कभी
किसी
कोई
त्योहार
की
पवित्रता
को
बता
कर
तथा
साल
में
दो
बार
नवरात्रि
के
अवसर
पर
मांसाहार
निषेध
कर
दिया
गया.
लेकिन
भारत
की
जलवायु
जिस
तरह
की
है,
उसमें
मछली
प्रोटीन
की
प्राप्ति
का
एक
बड़ा
स्रोत
है.
उसके
निषेध
से
पूर्वी
भारत
और
दक्षिण
के
समुद्र
तटीय
क्षेत्रों
में
प्रोटीन
की
घोर
कमी
हो
जाएगी
क्योंकि
इस
क्षेत्र
में
वर्षा
अधिक
होने
से
चावल
खूब
उगता
है.
चावल
में
प्रोटीन
बिलकुल
नहीं
होता.
उसमें
सिर्फ
स्टार्च
है
इसलिए
प्रोटीन
को
लेना
बहुत
जरूरी
है.
यही
कारण
है,
कि
पूरे
समुद्र
तटीय
इलाके
में
चावल
और
मछली
भोजन
के
रूप
में
सर्वाधिक
खाया
जाता
है.
इसलिए
बंगाल
में
मछली
को
जल
तोरई
भी
कहा
जाता
है.
वहां
वैष्णव
भी
मछली
खाते
हैं.
उत्तर
के
इलाके
में
दालों
से
इतना
प्रोटीन
मिल
जाता
है
कि
यहां
मछली
की
जरूरत
नहीं
पड़ती.
बंगाल
के
वैष्णवों
में
भी
मछली
खाने
की
परंपरा
बंगाल
और
ओडीसा
में
चैतन्य
महाप्रभु
के
आगमन
से
वैष्णव
प्रभाव
बढ़ा.
यह
प्रभाव
उत्तर
पूर्व
के
त्रिपुरा,
असम
और
मणिपुर
में
भी
पड़ा.
पूरा
मैतेयी
समुदाय
मछली
खाता
है.
बंगाल
में
वेदांत
के
परम
ज्ञाता
स्वामी
विवेकानंद
मछली
खाते
थे.
इसलिए
किसी
एक
क्षेत्र
के
खान-पान
को
दूसरे
क्षेत्र
पर
थोपना
ग़लत
है.
उत्तर
प्रदेश,
हरियाणा,
राजस्थान
और
पंजाब
को
छोड़
कर
नवरात्रि
पर
मांसाहार
की
वर्जना
पूरे
देश
में
नहीं
है.
यहां
तक
कि
गुजरात
के
समुद्र
तटीय
इलाक़ों
में
भी
मछली
चाव
से
खाई
जाती
है.
इसलिए
नवरात्रि
में
मछली
न
खाने
की
बात
करना
फ़ालतू
का
वितंडा
है.
लगता
है,
तेजस्वी
यादव
को
भी
इस
मुद्दे
पर
वितंडा
खड़ा
हो
जाने
का
अंदेशा
था.
उन्होंने
भी
जान-बूझ
कर
मछली
खाने
वाला
वीडियो
जारी
किया
था.
लेकिन
इस
तरह
के
बवाल
से
निरर्थक
बातों
को
ही
बढ़ावा
मिलता
है.
शाकाहार
सदैव
महंगा
सौदा
रहा
भारत
एक
कृषि
प्रधान
देश
भले
हो
लेकिन
शरीर
को
जिस
तरह
के
पोषक
तत्त्व
चाहिए,
वे
हर
जगह
नहीं
पैदा
होते.
इसके
अतिरिक्त
उत्तर
भारत
के
अलावा
देश
के
बाक़ी
हिस्सों
में
कृषि
योग्य
भूमि
की
कमी
रही
है.
उल्लेखनीय
यह
भी
है,
कि
देश
में
कृषि
एक
महँगा
सौदा
रहा
है.
कभी
अति
वृष्टि
तो
कभी
सूखा
के
चलते
कृषि
उपज
से
सबका
पेट
नहीं
भरा
जा
सकता.
इसके
विपरीत
मांस
हर
जगह
उपलब्ध
था.
जब
शिकार
पर
प्रतिबंध
नहीं
था,
तब
लोग
चिड़ियों
का
शिकार
कर
सालन
पका
लेते
थे.
बकरे
और
मेल
भेड़
का
मांस
खूब
खाया
जाता
था.
उस
समय
मांस
आज
की
तरह
महंगा
नहीं
था.
इसलिए
पूरे
देश
का
भोजन
एक
जैसा
नहीं
था.
और
जो
भोजन
में
विविधता
दिखाई
देती
है,
उसकी
वजह
यही
है.
यहां
तक
कि
देश
के
कई
हिस्सों
में
गोमांस
भी
खाया
जाता
था.
यूं
भी
खान-पान
की
परंपराएं
जब
की
हैं
तब
से
भारत
में
कई
ऐसे
क्षेत्र
भी
जुड़े
हैं,
जो
पहले
हिंदुस्तान
के
हिस्से
नहीं
रहे.
इस
तरह
के
वितंडा
से
बचना
चाहिए
आज
के
समय
में
जब
देश
में
उत्तर-दक्षिण
विवाद
खड़ा
हो
रहा
हो.
तमिलनाडु
और
कर्नाटक
के
कई
नेता
देश
को
अलग-अलग
राष्ट्रीयताओं
का
समूह
बता
रहे
हों.
यहां
तक
कि
तमिल
और
मलयालम
संस्कृति
को
परस्पर
भिन्न
कह
रहे
हों
तब
अपनी
रुचियां
देश
के
अन्य
समूहों
पर
थोपना
बेमानी
हैं.
भारत
में
कई
जातियां
हैं
और
कई
बोलियां
भी.
अधिकांश
देशवासियों
का
धर्म
भले
हिंदू
हो
लेकिन
हिंदुओं
के
भीतर
भी
अपने-अपने
क्षेत्र
की
भौगोलिक
बनावट
के
अनुरूप
खान-पान
और
रुचियां
हैं.
उनकी
बोली-बानी
भी
अलग
हैं.
इसलिए
बेहतर
यही
रहेगा
कि
देश
को
मजबूत
और
सुदृढ़
बनाये
रखने
के
लिए
छोटी-छोटी
बातों
में
न
उलझा
जाए.
देश
का
कोई
हिस्सा
ही
खुद
को
ही
देश
का
प्रतिनिधि
नहीं
बता
सकता.
राजनेताओं
को
चाहिए
कि
वे
इस
तरह
का
वितंडा
न
खड़ा
करें
जिससे
देश
की
एकता
को
चोट
पहुंचे.
ऐसे
में
मांसाहार
को
हेय
बताना
तथा
शाकाहार
पर
जोर
देना
सही
नहीं
है.
हिंदू
समाज
में
दोनों
को
बराबर
की
मान्यता
रही
है.
विविधताओं
को
स्वीकार
करना
जरूरी
चुनाव
के
समय
राजनीतिक
दल
एक-दूसरे
पर
आरोप
प्रत्यारोप
लगाते
हैं.
लेकिन
यह
सिर्फ
राजनीतिक
दलों
तक
ही
सीमित
रहे
तो
बेहतर
रहे.
लालू
यादव
परिवार
की
सूतक
में
सिर
मुंडवाने
की
बात
करें
और
भाजपा
के
नेता
नवरात्रि
में
मछली
की
फोटो
को
देश
के
बहुसंख्यक
समाज
का
अपमान
बताएं
तो
लगता
है,
देश
सिर्फ
यूपी,
बिहार
या
राजस्थान
नहीं
है.
यह
देश
बहुत
बड़ा
है
और
हिंदू
समाज
भी.
एक
हिंदू
समाज
मांस
खाना
पवित्र
मानता
है
और
दूसरा
अपवित्र.
इसलिए
एक
बात
को
पकड़
कर
बैठ
जाना
कि
हमारी
रुचियां
या
हमारा
खान-पान
और
पहरावा
ही
श्रेष्ठ
हैं,
ऐसा
आग्रह
ग़लत
है.
हिंदू
समाज
का
एक
समावेशी
चरित्र
है,
इसे
समझने
की
कोशिश
करते
रहना
चाहिए.
तब
ही
यह
देश
एक
रहेगा
और
मजबूत
भी.