
सियाचिन
(फाइल
फोटो)
भारतीय
सेना
ने
चालीस
साल
पहले
ऑपरेशन
मेघदूत
लॉन्च
किया
था.
यह
लद्दाख
में
सियाचिन
ग्लेशियर
की
सुरक्षा
के
लिहाज
से
काफी
अहम
मिशन
था.
ऑपरेशन
मेघदूत
इस
मिशन
का
कोडनेम
दिया
गया
था.
13
अप्रैल,
1984
को
भारतीय
सेना
के
जवानों
ने
इस
ऑपरेशन
के
तहत
सियाचिन
ग्लेशियर
के
पास
साल्टोरो
रिज
को
अपने
अधीन
कर
लिया
था.
ऑपरेशन
मेघदूत
अपनी
तरह
का
पहला
सैन्य
अभियान
था,
जो
सियाचिन
ग्लेशियर
पर
लड़ा
गया
था.
यह
क्षेत्र
भारत-पाक
नियंत्रण
रेखा
(एलओसी)
के
पास
है.
इस
क्षेत्र
में
1984
के
बाद
से
दोनों
देशों
के
बीच
अक्सर
तनाव
देखा
गया
है
और
झड़पें
भी
हुई
हैं.
दुश्मन
देश
की
गोलीबारी,
हिमस्खलन
और
खराब
मौसम
जैसी
दुश्वारियों
के
चलते
हमारे
कई
सैनिक
शहीद
हो
गए
हैं.
भारत
के
लिए
इस
क्षेत्र
को
संरक्षित
करना
और
खासतौर
पर
सियाचिन
ग्लेशियर
की
रक्षा
करना
बड़ी
चुनौतियों
मे
शामिल
रहा
है.
क्या
है
‘ऑपरेशन
मेघदूत’?
पूर्व
कैप्टन
संजय
कुलकर्णी
(कुमाऊं
रेजिमेंट
के)
को
जम्मू-कश्मीर
में
एक
ऐसे
फ्रंट
लोकेशन
पर
एक
टास्क
फोर्स
का
नेतृत्व
करने
के
लिए
तैनात
किया
गया
था
जो
बहुत
ही
ऊंचाई
पर
था
और
जहां
बहुत
ज्यादा
ठंड
थी.
भारी
बर्फबारी,
तेज
हवाएं
और
बर्फीले
तूफान
के
बावजूद
उन्होंने
अपने
मिशन
में
कामयाबी
हासिल
की.
ऑपरेशन
मेघदूत
के
पूर्व
कैप्टन
संजय
कुलकर्णी
जो
कि
लेफ्टिनेंट
जनरल
(रिटा.)
पद
से
रिटायर्ड
हो
चुके
हैं,
उन्होंने
करीब
40
साल
पहले
के
सबसे
कठिन
युद्धक्षेत्र
सियाचिन
के
बारे
में
बताया
कि
“ईमानदारी
से
कहूं
तो,
हमें
नहीं
पता
था
कि
यह
सबसे
ऊंचा
और
सबसे
कठिन
युद्धक्षेत्र
रहा
होगा.
हमने
इसे
एक
मिशन
के
रूप
में
लिया
और
सोचा
जिसे
हमें
करना
ही
चाहिए.”
कुलकर्णी
ने
न्यूज9
प्लस
के
शो
में
न्यूज9
प्लस
के
संपादक
संदीप
उन्नीथन
से
बात
करते
हुए
कहा
है-
“मैंने
1982
में,
1983
में
और
फिर
1984
में
ग्लेशियर
देखा
था.”
लेफ्टिनेंट
जनरल
(रिटा.)
संजय
कुलकर्णी
1983
में
ग्लेशियर
पर
भेजे
गए
टोही
मिशन
पोलर
बियर
1
का
हिस्सा
थे.
यह
लंबी
दूरी
का
गश्ती
मिशन
था.
उन्होंने
मिशन
के
बारे
में
बात
करते
हुए
विस्तार
से
बताया-
तब
चीजें
थोड़ी
और
गंभीर
हो
गईं
क्योंकि
एक
बार
जब
पाकिस्तानी
सैनिक
ग्लेशियर
पर
चढ़
गए
तो
उन्हें
वहां
टिके
रहना
बेहद
मुश्किल
हो
गया.”
सियाचिन
इतना
महत्वपूर्ण
क्यों
है?
अहम
सवाल
है
क्या
40
साल
बाद
भी
हमें
सियाचिन
पर
रहना
चाहिए?
आज
इसकी
क्या
अहमियत
है?
लेखक
और
रणनीतिक
विश्लेषक
नितिन
गोखले
कहते
हैं,
यह
तब
भी
जितना
मायने
रखता
था,जितना
कि
आज
मायने
रखता
है.
सियाचिन
ग्लेशियर
के
पूर्व
में
चीनियों
और
पश्चिम
में
पाकिस्तानियों
के
बीच
फंसा
हुआ
है.
सियाचिन
ग्लेशियर
में
भारतीय
सेना
की
मौजूदगी
लद्दाख
में
पाकिस्तान
और
चीन
को
भारत
के
खिलाफ
हाथ
मिलाने
से
रोकती
है.”
गोखले
आगे
कहते
हैं
–
मुझे
लगता
है
कि
1984
में
ऑपरेशन
मेघदूत
के
बाद
से
सियाचिन
का
महत्व
कई
गुना
बढ़
गया
है
और
इसलिए
उस
ऊंचाई
पर
यहां
तक
कि
कठिन
मौसम
की
स्थिति
में
भी
भारत
की
उपस्थिति
आज
बेहद
जरूरी
है.”
इस
राय
पर
कुलकर्णी
भी
अपनी
सहमति
जताते
हैं.
वो
कहते
हैं-
1963
में,
पाकिस्तानियों
ने
सियाचिन
ग्लेशियर
से
सटी
शक्सगाम
घाटी
चीन
को
उपहार
में
दे
दी.
इसलिए
इस
पर
अपना
अधिकार
बनाये
रखना
बहुत
जरूरी
है.
क्योंकि
आप
पाकिस्तान
पर
हम
भरोसा
नहीं
कर
सकते.”
चीन
का
जल
युद्ध
इस
मसले
में
चीन
की
रणनीति
को
भी
समझने
की
जरूरत
है.
वास्तव
में
चीन
तिब्बती
पठार
से
निकलने
वाले
बहुत
सारे
पानी
को
रोकना
चाहता
है.
इसमें
सियाचिन
कैसे
फिट
बैठता
है?
कुलकर्णी
बताते
हैं-
चीनी
पानी
को
हथियार
बना
सकते
हैं.
यदि
आपके
पास
पानी
है,
तो
आप
बिजली
पैदा
कर
सकते
हैं
और
यहीं
पर
बांधों
का
निर्माण
किया
जा
रहा
है.
आप
जब
चाहें
तब
पानी
छोड़
सकते
हैं
और
निचले
इलाकों
को
भारी
मुसीबत
में
डाल
सकते
हैं.
इसलिए
चीनियों
पर
भरोसा
नहीं
किया
जा
सकता.
देखिए
गलवान
में
क्या
हुआ.”
वो
आगे
कहते
हैं-
यह
बहुत
जरूरी
है
और
किसी
को
भी
यह
सिफारिश
करने
का
कोई
सवाल
ही
नहीं
है
कि
हमें
सियाचिन
ग्लेशियर
को
खाली
कर
देना
चाहिए.
हमें
वहीं
रहना
चाहिए
जहां
हम
हैं.”