अहिल्याबाई की त्रि जन्म शती प्रसंग: महेश्वर से स्वर्ण झूले की हुई थी रहस्यमयी चोरी, पुलिस ने खोजा पर कम था वजन


देवी
अहिल्याबाई
होलकर
ने
अपनी
राजधानी
महेश्वर
को
बनाया
था,
लेकिन
1818
की
मंदसौर
संधि
के
पश्चात
राजधानी
इंदौर
हो
गई
थी।
महेश्वर
में
आज
भी
भव्य
किला
महेश्वर
के
सुंदर
घाट,
राज
परिवार
से
जुड़ी
कई
सामग्री,
महेश्वर
का
साड़ी
उद्योग
देखने
को
मिलता
है।
देवी
अहिल्या
संस्थान
महेश्वर
में
भगवान
का
स्वर्ण
झूला
आकर्षण
का
मुख्य
केंद्र
था।
उसे
भी
चोरों
ने
नहीं
बख्शा
था
यह
झूला
चोरी
हुआ
और
दो
माह
बाद
में
मिल
भी
गया
था।
इस
रहस्यमयी
चोरी
को
लेकर
कहा
जाता
है
कि
चोरी
गए
सोने
के
झूले
का
वजन
बहुत
अधिक
था,
लेकिन
जब
नदी
में
मिला
तो
उसका
वजन
घट
गया
था। 


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महेश्वर
में
विराजित
हैं
कुल
देवता

होलकर
राजवंश
के
कुल
देवता
महेश्वर
के
संस्थान
में
अब
भी
विराजित
हैं,
जहां
प्रतिदिन
पूजा
पाठ
का
कार्य
होता
है।
देवी
अहिल्याबाई
संस्थान
महेश्वर
में
स्वर्ण
झूला
रानी
कृष्णाबाई
 (यशवंत
राव
होल्कर
प्रथम
कार्यकाल-1798-1811)
की
पत्नी)
ने
बनवाया
था,
उस
समय
झूले
की
कीमत
लाखों
रुपये
में
थी।
बताया
जाता
है
कि
यह
झूला
काफी
वजनी
था।
 


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मोदी
जारी
करेंगे
देवी
अहिल्या
की
याद
में
300
रुपये
का
सिक्का
और
विशेष
डाक
टिकट


कब
हुआ
झूला
चोरी? 

16
दिसंबर
1955
की
रात्रि
में
कुछ
चोरों
द्वारा
यह
स्वर्ण
झूला
चोरी
कर
लिया
गया
था।
उसकी
खबर
लगते
ही
पूरे
क्षेत्र
में
आक्रोश
छा
गया।
दो
माह
के
बाद
पुलिस
ने
यह
झूला
खोज
लिया।
यह
झूला
दूधी
नदी
के
नाले
में
मिला
था।
हालांकि,
इस
बरामदगी
को
लेकर
भी
कहा
जाता
है
कि
बरामद
हुआ
झूला
कम
वजन
का
था,
जबकि
असली
झूले
में
काफी
सोना
लगा
था।
हालांकि,
इस
दावे
के
कोई
प्रमाण
मौजूद
नहीं
हैं।
यह
भी
कहा
जाता
है
कि
आमतौर
पर
सोने
की
कोई
भी
वस्तु
चोरी
होने
के
बाद
उसी
रूप
में
कदाचित
ही
वापस
मिलती
है।
इसलिए
इसे
झूल
की
रहस्यमयी
चोरी
कहा
जाता
है।
 

पुनः
महेश्वर
लाया
गया

स्वर्ण
झूला
प्राप्त
होने
पर
मई
1962
को
विधि
पूर्वक
अपने
पूर्व
स्थान
पर
प्रतिष्ठित
किया
गया,
यह
स्वर्ण
झूला
महारानी
उषा
देवी
एक
विशेष
वाहन
से
लेकर
महेश्वर
आई
थी।
स्वर्ण
झूला
आगमन
के
समय
नगर
पालिका
के
तत्कालीन
अध्यक्ष
तुकाराम
जी
आमगा
और
देवी
अहिल्या
संस्थान
के
प्रमुख
एम.एम.
जगदाले
ने
अगवानी
की।
अहिल्या
जन्मोत्सव
के
अवसर
पर
महारानी
उषा
देवी
ने
अपने
कर
कमलों
से
स्वर्ण
झूले
को
संस्थान
में
पुनः
प्रतिष्ठित
करवाया
था।

ये
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और
ऐतिहासिक
महत्व
के
कारण
देवी
अहिल्या
ने
महेश्वर
को
चुना
राजधानी


सुरक्षा
के
कदम
भी
उठाए

स्वर्ण
झूले
के
एक
बार
चोरी
हो
जाने
के
पश्चात
संस्थान
ने
इस
झूले
का
ढाई
लाख
रुपये
का
बीमा
करवाया,
स्वर्ण
झूले
की
बीमा
अधिकारियों
ने
जांच
की,
और
यह
निर्णय
भी
लिया
गया
की
झूले
को
काफी
सुरक्षित
एवं
सुरक्षा
के
बीच
रखा
जाएगा। 

ये
भी
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के
सामने
अहिल्या
बाई
की
प्रतिमा
लगाने
में
लगे
थे
36
साल,
इतने
साल
रहा
शासन


शहनाई
वादन
भी
हुआ
था 

झूले
के
प्रतिष्ठा
पूर्ण
समारोह
के
दौरान
मई
1965
में
की
रात्रि
को
महेश्वर
में
अहिल्या
घाट
के
प्रमुख
द्वार
पर
बनारस
के
संगीतकारों
में
प्रस्तुति
दी
थी।
शहनाई
वादक
जहूर
खां,
मुहम्मद
हुसैन,
हामिद
खां,
महेश
नानकू
ने
अपनी
प्रस्तुति
दी
थी।