
विकास,
अर्थव्यवस्था,
सिनेमा,
खेल
और
अध्यात्म
जैसे
जरूरी
मुद्दों
पर
चर्चा
के
लिए
मशहूर
‘अमर
उजाला
संवाद’
कार्यक्रम
चल
रहा
है।
इस
कार्यक्रम
में
वॉटर
वुमन
शिप्रा
पाठक
ने
‘जल
है
तो
कल
है’
विषय
पर
अपने
विचार
साझा
किए।
कार्यक्रम
में
वॉटर
वुमन
शिप्रा
पाठक
ने
अपने
जीवन
के
अनुभव
साझा
करते
हुए
कहा,
“बच्चे
के
जन्म
के
3
से
5
दिन
बाद
उसका
नाम
रखा
जाता
है।
मेरा
नाम
‘शिप्रा’
रखा
गया,
जिसका
मतलब
है
कि
प्रकृति
ने
मुझे
एक
उद्देश्य
के
साथ
भेजा
था।”
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उन्होंने
बताया,
“मैंने
13
से
15
देशों
में
काम
किया
और
कई
स्कूलों
की
स्थापना
की।
इसके
बाद
जल
के
प्रति
मेरी
संवेदना
लगातार
बढ़ती
गई।
मां
नर्मदा
की
3600
किलोमीटर
की
यात्रा
और
मानसरोवर
की
यात्रा
ने
मेरी
सोच
को
बदल
दिया।
मुझे
लगा
कि
जिंदगी
बहुत
छोटी
है,
सिर्फ
अपना
बिज़नेस
बढ़ाने
से
ज्यादा
जरूरी
है
आने
वाली
पीढ़ी
के
लिए
कुछ
करना।
इसलिए
मैंने
जल
संरक्षण
के
लिए
काम
करना
शुरू
किया।”
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कौन
हैं
शिप्रा
पाठक?
शिप्रा
उत्तर
प्रदेश
के
बदायूं
जिले
में
स्थित
दातागंज
की
रहने
वाली
हैं।
उनके
पिता
डॉ.
शैलेश
पाठक
स्थानीय
नेता
हैं।
दादी
संतोष
कुमारी
पाठक
विधायक
रह
चुकी
हैं।
शिप्रा
खुद
एक
सामाजिक
कार्यकर्ता
के
रूप
में
अपनी
पहचान
बना
चुकी
हैं।
उन्होंने
इंग्लिश
लिट्रेचर
से
पोस्ट
ग्रैजुएट
किया
और
इसके
बाद
सामाजिक
सारोकार
से
जुड़े
कार्यक्रमों
में
हिस्सा
लेने
लगीं।
शिप्रा
ने
नदियों
और
पर्यावरण
की
रक्षा
के
लिए
कई
अभियानों
का
नेतृत्व
किया
है।
इनमें
सबसे
प्रमुख
अयोध्या
से
रामेश्वरम
के
लिए
3952
किलोमीटर
की
पैदल
यात्रा-
रामजानकी
वनगमन
यात्रा
रही
है।
उनकी
यह
यात्रा
108
दिन
चली
थी
और
वे
उत्तर
प्रदेश,
मध्य
प्रदेश,
छत्तीसगढ़,
महाराष्ट्र,
कर्नाटक
होकर
तमिलनाडु
के
रामेश्वरम
तक
पहुंचीं।
रास्ते
में
उन्होंने
सरयू,
गंगा,
यमुना,
सरस्वती,
मंदाकिनी,
तुंगभद्रा,
कृष्णा,
गोदावरी
और
वैगई
नदियों
जल
एकत्रित
किया
और
इसी
जल
से
भगवान
रामेश्वरम
का
जलाभिषेक
कर
पूरे
देश
को
नदियों
के
संरक्षण
का
संदेश
दिया।
शिप्रा
इससे
पहले
जल
संरक्षण
की
यात्रा
कर
चुकी
हैं,
तब
उन्हें
वाटर
वुमेन
कहा
गया
था।
शिप्रा
मां
नर्मदा
की
3600
किमी
लंबी
परिक्रमा
कर
चुकी
हैं।
इसके
अलावा
मानसरोवर
परिक्रमा,
मां
शिप्रा
परिक्रमा,
सरयू
पद
यात्रा
और
ब्रज
चौरासी
कोसी
पद
यात्रा
कर
शिप्रा
नदियों
के
संरक्षण
पर
जोर
देती
रही
हैं।
कुल
मिलाकर
वे
अब
तक
जल
और
पर्यावरण
संरक्षण
के
लिए
13
हजार
किलोमीटर
से
ज्यादा
की
पदयात्राएं
कर
चुकी
हैं।
उनकी
संस्था
पंचतत्व
से
15
लाख
लोग
जुड़े
हैं,
जिनके
सहयोग
से
नदियों
के
किनारे
25
लाख
पौधे
लगाए
गए
हैं।
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मोहन
यादव
के
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आतिथ्य
में
होगा
‘संवाद’;
मध्य
प्रदेश
के
विकास
के
रोडमैप
पर
करेंगे
चर्चा
अपना
कारोबार
और
नौकरी
छोड़कर
नदियों
और
जंगलों
को
बचाने
का
संकल्प
लेने
वाली
शिप्रा
खुद
ही
वॉटर
वुमेन
बनने
की
अपनी
कहानी
अमर
उजाला
से
साझा
कर
चुकी
हैं।
उन्होंने
बताया
है
कि
बचपन
से
ही
जल
के
प्रति
उनका
बहुत
प्रेम
था।
माता-पिता
ने
नाम
भी
शिप्रा
रखा
जो
एक
नदी
का
नाम
है।
वे
कंपनी
के
काम
से
जब
विदेश
जाती
थीं
तो
देखती
थी
कि
वहां
की
नदियां
कितनी
स्वच्छ
हैं।
वहां
तो
नदियों
को
देवी
नहीं
माना
जाता।
हमारी
नदियां
ऐसी
क्यों
नहीं
है।
शिप्रा
के
मुताबिक,
भारत
में
नर्मदा
की
परिक्रमा
ने
मेरा
मन
बदला।
मैंने
देखा
मां
नर्मदा
जहां-जहां
दूषित
हैं,
वहां
लोगों
का
अर्थ
भी
बिगड़ा
हुआ
है,
स्वास्थ्य
भी
बिगड़ा
हुआ
है
और
जहां
वह
अविरल
बह
रही
हैं
वहां
विकास
दिखाई
देता
है।
यहीं
से
वैराग्य
हुआ।
शिप्रा
की
यात्रा
की,
गोमती
की
यात्रा
की,
फिर
अयोध्या
से
रामेश्वरम
तक
की
यात्रा
की।
हमारा
उद्देश्य
नए
भारत
की
परिकल्पना
नहीं,
बल्कि
प्राचीन
भारत
को
ही
जीवित
रखना
है।
हमें
आने
वाली
पीढ़ी
को
अपनी
संस्कृति
से
अवगत
कराना
होगा। शिप्रा
को
उत्तर
प्रदेश
से
लेकर
गुजरात
और
महाराष्ट्र
तक
कई
पुरस्कारों
और
सम्मानों
से
नवाजा
जा
चुका
है।
इसके
अलावा
वो
एक
मशहूर
मोटिवेशनल
स्पीकर
भी
हैं।
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2025: ‘संवाद’
में
शिरकत
करेंगे
नौसेना
के
पूर्व
अधिकारी
एबी
सिंह;
‘ऑपरेशन
सिंदूर’
पर
कर
सकते
हैं
बात