Bhopal: डॉ. अरुणा कुमार की जड़े मजबूत, प्रदेश भर के चिकित्सकों के विरोध के बाद भी नियुक्ति बरकरार, विरोध जारी


मध्य
प्रदेश
चिकित्सा
शिक्षा
विभाग
द्वारा
डॉ.
अरुणा
कुमार
को
डीएमई
बनाए
जाने
का
विरोध
करीब
एक
हफ्ते
से
चल
रहा
है।
इसके
बाद
भी
सरकार
इस
पर
कोई
एक्शन
लेती
नजर
नहीं

रही
है।
इससे
अंदाजा
लगाया
जा
सकता
है
कि
डॉ.
अरुणा
कुमार
की
जड़े
कितनी
मजबूत
है।
हालांकि
भोपाल
के
गांधी
मेडिकल
कॉलेज
समेत
सभी
मेडिकल
कॉलेजों
के
जूनियर
डॉक्टर
और
प्रोफेसर
अभी
भी
काली
पट्टी
बांधकर
विरोध
कर
रहे
हैं।

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अब
केवल
सांकेतिक
प्रदर्शन

चिकित्सकों
का
कहना
है
कि
देश
मे
युद्ध
जैसे
माहौल
होने
की
वजह
से
किसी
प्रकार
का
प्रदर्शन
नहीं
किया
जा
रहा
है,
केवल
सांकेतिक
विरोध
दर्ज
कर
रहे
हैं।
जूनियर
डॉक्टर
एसोसिएशन
के
अध्यक्ष
 डॉ.
कुलदीप
गुप्ता
ने
बताया
कि
हमारा
विरोध
अभी
समाप्त
नहीं
हुआ
है
क्योंकि
देश
में
कुछ
स्थिति
ऐसी
बनी
है
इसलिए
हम
लोगों
ने
प्रदर्शन
पूरी
तरह
से
बंद
कर
दिया
है।
केवल
सांकेतिक
विरोध
काली
पट्टी
बांधकर
कर
रहे
हैं।
उन्होंने
कहा
है
कि
हमारे
लिए
देश
सर्वोपरि
है
ऐसे
डॉ
अरुणा
कुमार
आएंगे
जाएंगे।


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शुरू
से
रहा
विवादों
से
नाता

 दरअसल
डॉ.
अरुणा
कुमार
के
लिए
यह
पहला
मौका
नहीं
है
जब
उनका
विरोध
हो
रहा
है।
उनको
जब
भी
बड़ी
जिम्मेदारी
मिली
उनका
विवादों
से
नाता
बना
रहा।
2018
में
वह
पहली
बार
जीएमसी
की
डीन
बनीं,
लेकिन
साल
2019
में
छात्रों
के
विरोध
के
चलते
उन्हें
पद
से
हटाया
गया।
तत्कालीन
कलेक्टर
ने
अपनी
जांच
रिपोर्ट
में
उन्हें
छात्रों
के
प्रति
असंवेदनशील
बताया
था।
2020
में
दोबारा
डीन
बनीं
लेकिन
मेडिकल
टीचर्स
और
स्टाफ
से
टकराव
के
चलते
उन्हें
फिर
हटाना
पड़ा।
साल
2023
में
बाला
सरस्वती
आत्महत्या
मामले
के
बाद
उन्हें
विभागाध्यक्ष
पद
से
हटाकर
डीएमई
में
स्थानांतरित
किया
गया।
जनवरी
2024
में
जब
उन्हें
स्त्री
रोग
विभाग
में
वापस
भेजने
का
आदेश
जारी
हुआ,
तो
जूडा
ने
काम
बंद
कर
हड़ताल
कर
दी।
मामला
बढ़ता
देख
उपमुख्यमंत्री
को
हस्तक्षेप
करना
पड़ा
और
आदेश
निरस्त
हुआ।
मई
साल
2025
यानी
अब
जब
उन्हें
प्रदेश
की
मेडिकल
शिक्षा
प्रणाली
की
सबसे
ऊंची
जिम्मेदारी
डीएमई
पद
सौंप
दी
गई
है
तो
एक
बार
फिर
जूडा
से
लेकर
एमटीए
विरोध
में

गया
है।

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ने
बचाया


दो
साल
के
अंदर
हुई
वापसी

डॉ.
अरुणा
कुमार
अपनी
पहुंच
के
दम
पर
महज
दो
साल
के
भीतर
विभाग
के
बड़े
पद
पर
काविज
हो
गई
हैं।
दरसल 31
जुलाई
2023
को
गांधी
मेडिकल
कॉलेज
में
स्त्री
एवं
प्रसूति
रोग
विभाग
की
थर्ड
ईयर
पीजी
स्टूडेंट
बाला
सरस्वती
ने
आत्महत्या
कर
ली
थी।
उन्होने
ने
एनेस्थीसिया
इंजेक्शन
का
ओवरडोज
लेकर
जान
दी
थी।
घटनास्थल
से
मिले
सुसाइड
नोट
में
उसने
लिखा
था,
मेरी
थीसिस
कभी
पूरी
नहीं
होगी,
भले
ही
मैं
अपनी
आत्मा,
खून,
सबकुछ
दे
दूं।
इस
घटना
के
बाद।
जूनियर
डॉक्टर
एसोसिएशन
ने
इस
आत्महत्या
के
लिए
डॉ.
अरुणा
कुमार
को
मुख्य
रूप
से
जिम्मेदार
ठहराया
और
उनके
खिलाफ
मोर्चा
खोलते
हुए
हड़ताल
पर
चले
गए
थे।
विरोध
के
बाद
प्रशासन
ने
डॉ.
अरुणा
कुमार
को
जीएमसी
से
हटाकर
डायरेक्टोरेट
ऑफ
मेडिकल
एजुकेशन
(डीएमई)
में
स्थानांतरित
कर
दिया
था,
जहां
से
वे
अब
तक
कार्यरत
थीं।
अब
उसी
डायरेक्टोरेट
में
उन्हें
डायरेक्टर
पद
पर
पदोन्नत
किया
गया
है,
जिससे
एक
बार
फिर
विरोध
हो
रहा
है।