
Devi
Ahilya
Birth
Anniversary: देवी
अहिल्या
की
आज
300
वीं
जयंती
है।
देश
का
मौजूदा
शासन
तंत्र
इसे
इसे
पूर्ण
श्रद्धाभाव
और
उत्साह
के
साथ
मना
रहा
है।
अमर
उजाला
ने
इस
मौके
पर
अहिल्या
बाई
के
व्यक्तित्व
और
कृतित्व
को
लेकर
व्यापक
रिपोर्ट
तैयार
की
है।
इससे
पता
चलता
है
कि
कैसे
महाराष्ट्र
के
एक
छोटे
से
गांव
की
बेटी
जीवन
के
तमाम
झटके
झेलते
हुए
इंदौर
के
होलकर
राजवंश
की
महारानी
बनी,
फिर
भी
उसने
अपनी
सादगी,
सेवा
और
समर्पण
की
छवि
को
नहीं
छोड़ा
तथा
अपनी
रियासत
में
इंसानों
के
बीच
भेदभाव
को
कोई
जगह
नहीं
दी।
300
साल
बाद
भी
आज
देवी
अहिल्या
को
इन्हीं
बातों
के
लिए
स्मरण
किया
जा
रहा
है
और
सदियों
तक
याद
किया
जाता
रहेगा।
1725
में
चौंडी
में
हुआ
जन्म
देवी
अहिल्या
बाई
होल्कर
का
जन्म
एक
साधारण
परिवार
में
महाराष्ट्र
के
अहमदनगर
अब
अहिल्या
नगर
जिले
के
जामखेड़
तालुका
के
ग्राम
चौंडी
में
1725
में
हुआ
था।
होल्कर
वंश
के
प्रमुख
मल्हार
राव
होल्कर
ने
उन्हें
देखा
और
परिवार
की
बहू
बनाने
का
प्रस्ताव
अहिल्या
बाई
के
पिता
मनको
जी
शिंदे
के
समक्ष
रखा।
मल्हार
राव
के
पुत्र
खंडेराव
से
उनका
विवाह
हुआ
था।
अहिल्या
बाई
की
दो
संतान
थीं।
बेटा
मालेराव
और
बेटी
मुक्ताबाई।
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अहिल्या
बाई
की
राजकाज
के
पत्र
मोड़ी
लिपि
में
लिखे
जाते
थे,
अब
लुप्त
हो
रही
लिपि
बहुत
जल्द
पति
का
युद्ध
में
निधन
हो
गया,
उस
दौर
में
सती
प्रथा
का
चलन
था।
देवी
अहिल्या
बाई
ने
भी
सती
होने
का
निश्चय
किया
पर
ससुर
मल्हार
राव
ने
उन्हें
समझाया
और
उन्हें
होल्कर
वंश
परंपरा
का
दायित्व
निभाने
के
लिए
तैयार
किया
था।
देवी
अहिल्या
बाई
के
जीवन
में
बहुत
संकट
रहे
पर
उन्होंने
हर
संकट
का
दृढ़ता
पूर्वक
मुकाबला
किया।
हिम्मत
और
धैर्य
से
हर
मोर्चे
पर
लड़ाई
लड़ी
और
वे
उसमें
सफल
रहीं।
देवी
अहिल्या
बाई
न्याय
प्रिय,
धार्मिक,
दानशील
मनोवृत्ति
की
थीं।
उनके
द्वारा
खासगी
जागीर
से
देश
भर
में
करवाए
निर्माण
कार्य
आज
भी
विद्यमान
हैं।
उनके
द्वारा
करवाए
परोपकारी
कार्यों
से
जाहिर
होता
है
कि
उनके
मन
में
प्रजा
का
हित
प्रथम
था।
मल्हार
राव
की
सोच
दूरगामी
थी
अहिल्या
बाई
के
पति
खंडेराव
का
युद्ध
के
मैदान
में
मार्च
1754
को
निधन
हो
गया।
उस
दौर
में
सती
होना
सामान्य
बात
थी।
पर
ससुर
ने
अहिल्या
को
सती
होने
से
रोका।
देश
में
सती
होने
की
कुप्रथा
पर
1829
में
प्रतिबंध
लगाया
गया
था,
पर
ससुर
मल्हारराव
ने
सती
प्रथा
के
प्रतिबंध
के
75
वर्ष
पूर्व
ही
बहू
अहिल्या
को
सती
होने
से
रोक
लिया
था।
जाहिर
है
यह
उनकी
दूरगामी
सोच
का
परिणम
था।
बेटी
की
शादी
के
लिए
की
अनोखी
घोषणा
जिस
समय
अहिल्याबाई
ने
राज्य
की
बागड़ोर
संभाली
थी,
उस
समय
होल्कर
राज्य
की
सीमा
मालवा
से
राजस्थान
और
बुंदेलखंड
तक
फैली
हुई
थी।
राज्य
की
वार्षिक
आय
75
लाख
रुपये
थी।
राज्य
में
अशांति
फैली
हुई
थी।
शांति
स्थापित
करने
के
लिए
देवी
अहिल्याबाई
ने
एक
राजकीय
घोषणा
की
कि
जो
राज्य
को
डाकुओं,
चोरों,
लुटेरों
के
भय
से
मुक्त
कर
शांति
स्थापित
करने
में
सहयोग
देगा,
उससे
अपनी
बेटी
मुक्ताबाई
की
शादी
करूंगी।
यशवंत
राव
फणसे
ने
यह
चुनौती
स्वीकार
की
और
राज्य
में
शांति
स्थापित
की।
अहिल्याबाई
ने
बेटी
मुक्ताबाई
का
विवाह
फणसे
से
कर
दिया।
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बाई
ने
खुद
कभी
युद्ध
नहीं
लड़ा,
पर
उनके
राज
में
होल्कर
सेना
कोई
जंग
नहीं
हारी
तत्काल
न्याय
की
पक्षधर
थीं
ससुर
मल्हारराव
होलकर
द्वारा
बनाई
व्यवस्था
को
देवी
अहिल्या
बाई
ने
और
मजबूत
बनाया।
खासगी
जागीर
ट्रस्ट
की
देखरेख
वे
स्वयं
करती
थीं।
वे
तत्काल
न्याय
के
पक्ष
में
थीं।
उनके
लिए
गरीबी
और
अमीरी
में
कोई
पक्षपात
नहीं
था,
किसानों
का
लगान
माफ
माफ
करना,
सूखा
और
अतिवृष्टि
के
समय
राजकोष
से
उन्हें
मदद
देना
उनके
शासन
की
विशेषता
थी।
सेना
हमेशा
सुसज्जित
रखी
सैन्य
तैयारी
के
लिहाज
से
देवी
अहिल्याबाई
अपनी
सेना
को
हमेशा
पूर्णतः
सुसज्जित
रखती
थीं।
गोला
बारुद,
तोप,
घोड़े,
बैलगाड़ी
हर
प्रकार
की
सुविधा
उपलब्ध
करवाती
थीं।
सेना
के
प्रति
उनकी
प्रगाढ़
श्रद्धा
थी।
न्याय
में
गंगाजलि
का
प्रयोग
देवी
अहिल्या
पुलिस
प्रशासन
के
साथ
कानून
की
उचित
व्यवस्था
रखती
थी,
ग्रामीण
क्षेत्रों
तक
उनकी
पहुंच
रहती
थी।
न्याय
व्यवस्था
में
कुशल
योग्य
और
पक्षपात
रहित
विद्वानों
को
नियुक्ति
दी
जाती
थी,
न्याय
प्रक्रिया
में
गंगाजलि
का
प्रयोग
होता
था।
बामनिया
डाक
व्यवस्था
थी,
स्कूलों
में
पंडित
थे
अहिल्या
बाई
ने
अपने
शासनकाल
में
डाक
व्यवस्था
का
कार्य
ब्राह्मण
लोगों
को
सौंप
रखा
था,
जिसे
बामनिया
डाक
व्यवस्था
कहा
जाता
था।
स्कूलों
में
पढ़ाने
के
लिए
पंडितों
को
नियुक्त
किया
जाता
था,
जो
फारसी,
मराठी,
संस्कृत
की
शिक्षा
देते
थे,
राज्य
में
कई
विद्यालय
थे।
बीमार
व्यक्तियों
के
लिए
औषधालय
थे,
जो
जड़ी
बूटियां
और
टोने-टोटके
से
भी
इलाज
करते
थे।
टकसाल
में
ढाले
जाते
थे
सिक्के
होल्कर
राज्य
में
टकसाल
स्थापित
किए
गए।
इनमें
राज्य
के
सिक्के
ढाले
जाते
थे।
यहां
नजराना
भेंट
करने
के
लिए
सोने
और
चांदी
के
सिक्के
ढाले
जाते
थे।
तांबे
की
मुद्रा
चलन
में
रहती
थी।
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में
मेट्रो
ट्रेन
कल
से
चलेगी
-एक
बार
में
900
से
ज्यादा
यात्री
कर
सकेंगे
सफर
शिव
को
समर्पित
था
राज्य
देवी
अहिल्या
ने
अपना
पूरा
राज्य
भगवान
शिव
को
अर्पित
कर
खुद
को
उसका
मात्र
संरक्षक
बना
रखा
था।
इस
भावना
में
उन्होंने
बहुत
अधिक
दान-पुण्य
किया।
कई
स्थानों
पर
मंदिर,
धर्मशालाएं,
कुएं,
बावड़ी,
तालाब
का
निर्माण
करवाया।
वे
पंडित
और
पुजारी
के
लिए
मुक्त
हस्त
से
दान
देती
थीं।
इसके
लिए
वह
खासगी
जागीर
ट्रस्ट
(व्यक्तिगत
संपत्ति)
से
व्यय
करती
थीं।
देवी
अहिल्या
बाई
ने
इसी
ट्रस्ट
से
देश
के
कई
जीर्णशीर्ण
मंदिरों
का
जीर्णोद्धार
भी
करवाया
था।
ऐसी
थी
अहिल्या
बाई
की
दिनचर्या
देवी
अहिल्या
बाई
सुबह
ब्रह्म
मुहूर्त
में
उठ
जाया
करती
थीं।
स्नान,
ध्यान,
पूजा
पाठ
से
निवृत
होकर
पुराणों
का
पाठ
सुनती
थीं।
दान-पुण्य
करतीं,
ब्राह्मण
बच्चों
के
साथ
गरीबों
और
निर्धनों
को
भोजन
करवातीं।
इसके
पश्चात
स्वयं
भोजन
करतीं।
दोपहर
में
राज
दरबार
में
बैठकर
राज्य
प्रबंध
का
कार्यभार
देखती
थीं।
शाम
को
पूजा
पाठ
कर
भोजन
करतीं,
संध्या
नौ
बजे
से
रात्रि
ग्यारह
बजे
तक
महत्वपूर्ण
कागज
पत्रों
को
देखतीं
और
उनका
निराकरण
करती
थीं।
देवी
अहिल्या
बाई
ने
धार्मिक,
न्याय
प्रिय,
दानशील
और
प्रजा
के
हितार्थ
कई
कार्य
किए।
उनके
द्वारा
धार्मिक
स्थलों
पर
किए
कार्य
की
लंबी
सूची
है।
देवी
अहिल्या
बाई
होल्कर
:
एक
नजर
में
| जन्म |
31 मई 1725, ग्राम चौड़ी, महाराष्ट्र |
| माता-पिता |
पिता मनको जी शिंदे, माता सुशीला बाई |
| विवाह |
1735, खंडेराव होल्कर से (होल्कर रियासत के प्रमुख मल्हारराव के बेटे से) |
| संतान |
पुत्र मालेराव, बेटी मुक्ताबाई |
|
पति का निधन |
खंडेराव का युद्ध में 1754 में |
|
ससुर का निधन |
मल्हारराव होल्कर का 1766 |
|
पुत्र मालेराव राज्य प्रमुख बने |
1766 |
|
पुत्र मालेराव का निधन |
1767 |
|
अहिल्या बाई ने राजपाठ संभाला |
1767 |
| निधन |
13 अगस्त 1795 |
|
शासन अवधि |
देवी अहिल्या बाई होल्कर 28 वर्ष 5 माह 17 दिन |