Eid 2024: महिलाओं के लिए सम्मान! बोहरा समुदाय में दादी, नानी से लेकर छोटी बच्चियों तक को ईदी देने का रिवाज

Eid 2024: महिलाओं के लिए सम्मान! बोहरा समुदाय में दादी, नानी से लेकर छोटी बच्चियों तक को ईदी देने का रिवाज
Eid 2024: Respect for women, custom of giving Eid to grandmothers and even little girls in Bohra community

बोहरा
समुदाय
में
ईदी
देने
की
है
अलग
परंपरा


फोटो
:
अमर
उजाला

विस्तार

आमतौर
पर
मुस्लिम
समुदाय
में
रिश्ते
के
बड़े
या
परिवार
के
बुजुर्ग
अपने
से
छोटे
व्यक्ति
को
ईद
के
त्यौहार
पर
नजराने
के
तौर
पर
ईदी
देते
हैं।
लेकिन
दाऊदी
बोहरा
समुदाय
में
परंपरा
थोड़ी
विपरीत
है।
इस
समुदाय
की
सदियों
पुरानी
परंपरा
में
महिला
सम्मान
को
आगे
रखा
गया
है।
इसके
तहत
अपने
प्रियजनों
से
ईद
मिलने-पहुंचने
वाला
हर
पुरुष
उस
घर
में
मौजूद
महिला
को
ईदी
देता
है।
यह
महिला
रिश्ते
में
उससे
छोटी
हो
या
बड़ी,
यह
बात
भी
मायने
नहीं
रखती।
इस
लिहाज
से
ईद
मिलने
पहुंचे
पुरुष
अपनी
दादी,
नानी
या
बुआ,
मौसी
सभी
को
ईद
मुबारक
कहने
के
साथ
अदब
से
उन्हें
ईदी
का
लिफाफा
सौंप
देते
हैं
और
इनसे
दुआएं
हासिल
करते
हैं।

दाऊदी
बोहरा
समुदाय
के
कमरुद्दीन
दाऊदी
कहते
हैं
कि
हमारे
रीति
रिवाज
के
मुताबिक
महिलाओं
का
सम्मान
सर्वोपरि
है।
ईद
की
नमाज
के
बाद
मुलाकात
और
ईद
मिलन
का
सिलसिला
कई
दिनों
तक
चलता
है।
इस
दौरान
ईद
की
मुलाकात
के
साथ
हर
महिला
को
ईदी
देने
का
रिवाज
है।
वह
महिला
रिश्ते
में
छोटी
हो
या
बड़ी,
यह
बात
मायने
नहीं
रखती।
इस
दौरान
इस
बात
का
भी
कोई
फर्क
नहीं
होता
कि
जिसको
ईदी
दी
जा
रही
है,
वह
आर्थिक
रूप
से
सक्षम
है
या
कमजोर।
इस
बात
से
भी
ईदी
देने
की
परंपरा
पर
असर
नहीं
पड़ता
कि
ईद
देने
वाला
अमीर
है
या
गरीब।

कमरुद्दीन
दाऊदी
ने
बताया
कि
ईद
मिलने
जाने
से
पहले
ही
लिस्टिंग
करके
उन
सभी
महिलाओं
की
सूची
बना
ली
जाती
है।
साथ
ही
उनको
दी
जाने
वाली
ईदी
की
राशि
का
अलग-अलग
लिफाफा
भी
तैयार
कर
लिया
जाता
है।
वे
कहते
हैं
कि
आपसी
भाईचारा
बढ़ाने
और
रिश्तों
को
मजबूत
करने
वाली
इस
परंपरा
का
मकसद
महज
महिला
सम्मान
ही
है।
 

महिलाएं
करती
हैं
ये
खास
तैयारी

आमतौर
पर
ईद
जैसे
बड़े
त्यौहार
पर
महिलाओं
की
खास
नजर
कपड़ों
पर
होती
है।
वे
त्यौहार
की
खुशियां
बढ़ाने
के
लिए
ज्यादा
से
ज्यादा
और
आकर्षक
कपड़ों
की
खरीदी
में
बड़ी
मशक्कत
करती
हैं।
इसके
मैचिंग
आइटम्स
के
लिए
भी
उनकी
खास
मेहनत
होती
है।
लेकिन
बोहरा
समुदाय
की
महिलाओं
का
ज्यादातर
ध्यान
महंगे
कपड़ों
की
बजाए
उनके
द्वारा
हमेशा
पहने
जाने
वाले
रिदा
(बुर्के)
पर
होता
है।
तरह-तरह
के
आकर्षक
और
डिजाइनर
रिदा
वे
शादी
ब्याह
से
लेकर
बड़े
त्यौहार
और
अन्य
मांगलिक
कार्यक्रमों
में
पहनना
पसंद
करती
हैं।
इसी
लिहाज
से
वे
ईद
की
शॉपिंग
में
भी
रिदा
के
लिए
कपड़ा
खरीदी
पर
जोर
देती
हैं।
उनकी
बाकी
की
मैचिंग
भी
इस
रिदा
के
लिहाज
से
ही
होती
है।
यानी
चूड़ी,
चप्पल
सौंदर्य
प्रसाधन
से
लेकर
पर्स,
घड़ी,
गॉगल,
ज्वैलरी
आदि
तक
की
मैचिंग
रिदा
से
ही
होती
है।

 

अब
हो
रहे
ये
बदलाव

आधुनिक
तौर
तरीके
और
शिक्षा
से
लेकर
रोजगार
तक
के
लिए
घर
से
निकली
लड़कियों
में
बोहरा
समुदाय
की
लड़कियां
भी
शामिल
हैं।
अपने
सफर
को
आसान
करने
के
लिए
इन
लड़कियों
ने
दो
पहिया
और
चार
पहिया
वाहनों
का
इस्तेमान
भी
बढ़ाया
है।
रिदा
को
धारण
कर
वाहन
संचालन
में
आने
वाली
समस्याओं
से
निजात
के
लिए
अब
रिदा
के
डिजाइन
में
बदलाव
किए
गए
हैं।
पुरातन
और
परंपरागत
बुर्कों
का
डिजाइन
टू
पीस
या
पैंट
स्टाइल
में
करने
की
शुरुआत
इंदौर
जैसे
शहर
से
हुई
है।
पहनावे
में
आए
इस
बदलाव
से
महिलाओं
का
वाहन
चालन
आसान
हुआ
है
और
सफर
सुविधाजनक।
 

सुबह
ईद
,

दोपहर
दुकान

बोहरा
समुदाय
पूरी
तरह
से
कारोबारी
है।
इनकी
बिक्री
सेवाओं
में
अधिकांश
वस्तुएं
ऐसी
हैं,
जो
मुस्लिम
समुदाय
को
ईद
के
लिए
खरीदनी
होती
हैं।
बोहरा
समुदाय
ईद
का
त्योहार
एकम
के
लिहाज
से
30
रोजे
पूरे
कर
मना
लेता
है।
जबकि
मुस्लिम
समुदाय
इस
त्योहार
के
लिए
चांद
के
दीदार
पर
निर्भर
होता
है।
इसके
चलते
मुस्लिम
समुदाय
की
ईद,
बोहरा
समुदाय
से
एक
या
दो
दिन
बाद
मनाई
जाती
है।
ईद
की
खरीद
बिक्री
की
स्थिति
देखते
हुए
बोहरा
समुदाय
ईद
की
नमाज
अदा
करने
के
बाद
कुछ
ही
घंटों
में
अपनी
दुकान
सजाए
दिखाई
देने
लगते
हैं।


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भोपाल
से

आशु
खान

की
रिपोर्ट।