
होलकर
राजवंश
के
संस्थापक,
प्रथम
राजा
और
देवी
अहिल्या
बाई
के
ससुर
मल्हारराव
होलकर
इंदौर
में
निवास
करते
थे।
उनकी
तीन
पत्नियां
थीं।
गौतमा
बाई,
बना
बाई
और
द्वारका
बाई,
गौतमा
बाई
(निधन
अक्तूबर
1761)
से
एक
पुत्र
हुआ
था,
जिसका
नाम
खंडेराव
था।
1725
में
जन्मी
अहिल्या
बाई
का
विवाह
1735
में
मल्हारराव
होलकर
के
पुत्र
खंडेराव
से
हुआ
था।
1745
में
अहिल्या
बाई
को
पुत्र
रत्न
की
प्राप्ति
हुई
थी।
उनके
पुत्र
का
नाम
मालेराव
था।
1748
में
अहिल्या
बाई
के
यहां
बेटी
हुई,
जिसका
नाम
मुक्ता
बाई
था।
अहिल्या
बाई
ने
अपने
जीवन
में
कई
संघर्षों
का
सामना
किया
और
धैर्य
पूर्वक
प्रत्येक
समस्या
का
सामना
किया।
युद्ध,
आंतरिक
विवाद
और
लगातार
परिजनों
को
खोया,
फिर
संयम,
न्याय
और
धर्म
का
परचम
फहराती
रहीं।
यह
भी
उस
दौर
में
जब
महिलाओं
को
इतनी
आजादी
नहीं
थी।
तब
ससुर
मल्हारराव
होलकर
ने
उन्हें
नारी
शक्ति
के
रूप
में
प्रस्तुत
कर
एक
आदर्श
पेश
किया।
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बेटी
मुक्ता
बाई
सती
हो
गई
थीं
बेटी
मुक्ता
बाई
का
विवाह
यशवंत
राव
फणसे
से
हुआ
था।
मुक्ता
बाई
का
एक
बेटा
था,
जिसका
नाम
नत्थू
था।
लंबी
बीमारी
के
बाद
सितंबर
1787
में
नत्थू
का
निधन
हो
गया।
मुक्ता
बाई
के
पति
यशवंत
राव
फणसे
पुत्र
के
निधन
से
काफी
दुखी
रहने
लगे।
इस
दुःख
के
कारण
दिसंबर
1791
में
यशवंत
राव
फणसे
का
निधन
हो
गया
था।
बेटी
मुक्ता
बाई
ने
पति
के
निधन
के
बाद
सती
होने
का
फैसला
किया,
अहिल्या
बाई
ने
बेटी
को
बहुत
समझाया
पर
वह
नहीं
मानी।
वह
सती
हो
गई
थीं।
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कुंभेर
के
युद्ध
में
पति
खंडेराव
का
देहांत
हुआ
मार्च
1754
में
कुंभेर
के
युद्ध
में
अहिल्या
बाई
के
पति
खंडेराव
का
निधन
हो
गया
था।
अहिल्या
बाई
के
ससुर
मल्हारराव
काफी
दूरदृष्टिवान
थे।
उन्होंने
अहिल्या
बाई
को
बहू
नहीं,
बल्कि
बेटी
ही
समझा
और
राजकाज
के
हर
कार्य
में
उन्हें
साथ
रखा।
मल्हारराव
ने
अहिल्या
को
सती
होने
से
रोका
अहिल्या
बाई
युद्ध
कला
में
भी
निपुण
थीं।
पति
खंडेराव
के
निधन
के
बाद
अहिल्या
बाई
ने
सती
होने
का
फैसला
लिया,
पर
ससुर
खंडेराव
ने
उन्हें
काफी
समझाया।
ससुर
मल्हारराव
होलकर
ने
अहिल्या
बाई
से
कहा-”अब
तू
ही
मेरा
बेटा
है,
तू
चली
जाएगी
तो
मुझे
कौन
संभालेगा?
मल्हारराव
ने
आगे
कहा
-बेटी
जिस
पुत्र
को
मैंने
इतने
लाड़-प्यार
से
बड़ा
किया,
वह
आज
मझधार
में
छोड़
कर
चला
गया।
क्या
तू
भी
मुझे
अनाथ
कर
चली
जाएगी?
तू
रहेगी
तो
समझूंगा
मेरा
खंडू
जिंदा
है…
मल्हारराव
ने
अहिल्या
से
कहा
था-
देख
बेटा,
यह
सारा
राजपाट
तेरा
ही
है
यह
सब
तुझे
ही
संभालना
है,
अभी
तक
तुझे
अपना
लड़का
समझ
कर
सब
कुछ
तुझे
ही
सौंप
रखा
था,
तू
रहेगी
तो
मैं
समझूंगा
कि
मेरा
खंडू
अभी
जिंदा
है,
तुझे
देखकर
मैं
सारा
दुःख
भूल
जाऊंगा।
बेटी,
सती
होने
का
निर्णय
त्याग
दे।
तू
तो
महासती
है।
इस
घटनाक्रम
के
बाद
देवी
अहिल्या
ने
राज्य
और
परिवार
के
हित
में
सती
नहीं
होने
का
निर्णय
लिया
था।
मल्हारराव
होलकर
बहू
अहिल्या
बाई
की
योग्यता,
हिम्मत
को
जानते
थे।
अहिल्या
बाई
ने
जिस
तरीके
से
होलकर
राजवंश
का
अपना
कार्यकाल
संचालित
किया
और
अपने
कार्यों
से
आज
तक
अपने
नाम
को
अमर
कर
लिया।
1776
में
मल्हारराव
का
निधन
हो
गया
मई
1766
में
अहिल्या
बाई
के
ससुर
होलकर
राज्य
के
संस्थापक
मल्हारराव
होलकर
का
निधन
हो
गया,
बना
बाई
और
द्वारका
बाई
(उनकी
पत्नियां)
सती
हो
गई
थीं
(संदर्भ
होलकर
शाहीचा
इतिहास
खंड
प्रथम-पेज-160,चंद्रचूड़
दफ्तर)।
बेटे
मालेराव
ने
सिर्फ
एक
वर्ष
संभाला
राजकाज
ससुर
के
निधन
के
बाद
अहिल्या
बाई
के
बेटे
मालेराव
ने
23
जुलाई
1766
को
राज्य
का
कार्यभार
संभाला।
मालेराव
अधिक
समय
तक
राजपाठ
संभाल
नहीं
पाए
और
1767
में
उनका
निधन
हो
गया।
अहिल्या
बाई
मालेराव
के
स्वभाव
और
व्यवहार
से
खुश
नहीं
थी।
28
साल
राज
किया
देवी
अहिल्या
ने
बेटे
के
आकस्मिक
निधन
के
बाद
देवी
अहिल्या
बाई
ने
होलकर
रियासत
की
सत्ता
1767
में
संभाली
थी।
वे
करीब
28
वर्ष
5
माह
17
दिन
होलकर
रियासत
की
महारानी
रहीं।
उनका
जन्म
31
मई
1725
को
हुआ
था
और
13
अगस्त
1795
को
70
वर्ष
की
उम्र
में
अहिल्या
बाई
का
निधन
हो
गया।
इस
वर्ष
31
मई
2025
को
उनके
जन्म
को
300
वर्ष
पूरे
हो
रहे
हैं।
इस
उपलक्ष्य
में
मध्य
प्रदेश
सरकार
उनका
त्रिशताब्दी
जन्म
महोत्सव
मना
रही
है।