
इंदौर
से
एक
अनोखी
और
सराहनीय
पहल
की
शुरुआत
हुई
है,
जिसका
उद्देश्य
तेजी
से
विलुप्त
हो
रही
दुर्लभ
प्रजातियों
के
पेड़-पौधों
और
जड़ी-बूटियों
को
फिर
से
संरक्षित
और
विकसित
करना
है।
इस
नवाचार
की
अगुवाई
इंदौर
वन
विभाग
और
पर्यावरण
वानिकी
विभाग
कर
रहे
हैं।
इंदौर
सहित
मध्यप्रदेश
की
58
दुर्लभ
प्रजातियों
को
फिर
से
तैयार
करने
की
इस
मुहिम
में
होलकर
कॉलेज
के
युवा
विद्यार्थियों
को
भी
जोड़ा
गया
है,
ताकि
नई
पीढ़ी
इन
वनस्पतियों
के
महत्व
को
समझ
सके
और
संरक्षण
में
सहभागी
बन
सके।
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29
पेड़,
14
जड़ी-बूटियाँ
और
11
बेलें
होंगी
संरक्षित
वन
परिक्षेत्र
अधिकारी
कौशाम्बी
झा
के
अनुसार,
इंदौर
समेत
मध्यप्रदेश
में
लुप्त
हो
रही
दुर्लभ
प्रजातियों
में
29
प्रकार
के
पेड़,
14
किस्म
की
जड़ी-बूटियाँ,
4
प्रकार
की
झाड़ीनुमा
वनस्पतियाँ
और
11
प्रकार
की
औषधीय
बेलों
को
शामिल
किया
गया
है।
ये
सभी
प्रजातियाँ
न
सिर्फ
मानव
जीवन
और
आयुर्वेदिक
चिकित्सा
में
उपयोगी
हैं,
बल्कि
पर्यावरणीय
संतुलन
में
भी
अहम
भूमिका
निभाती
हैं।
आधुनिक
जीवनशैली,
समय
के
बदलाव
और
जागरूकता
की
कमी
के
कारण
यह
बेशकीमती
जैविक
विरासत
धीरे-धीरे
समाप्त
होती
जा
रही
है।
घर
की
छत
और
बगीचे
बनेंगे
हरियाली
के
केंद्र
इस
परियोजना
के
अंतर्गत
लोगों
को
प्रोत्साहित
किया
जा
रहा
है
कि
वे
इन
दुर्लभ
वनस्पतियों
को
अपने
घरों,
छतों
के
गमलों
या
बगीचों
में
लगाएं।
इससे
न
केवल
इन
प्रजातियों
का
संरक्षण
संभव
होगा,
बल्कि
आसपास
का
वातावरण
भी
हरियाली
से
भर
जाएगा।
पर्यावरण
को
स्वच्छ
और
सुंदर
बनाने
की
दिशा
में
यह
एक
बड़ा
कदम
माना
जा
रहा
है।
खास
बात
यह
है
कि
इस
अभियान
के
जरिए
युवाओं
को
न
केवल
पौधों
की
विशेषताओं
से
अवगत
कराया
जा
रहा
है,
बल्कि
उन्हें
व्यावहारिक
रूप
से
संरक्षण
कार्यों
में
जोड़ा
भी
जा
रहा
है।
गरुण,
बीजा,
मेदा
जैसी
दुर्लभ
वनस्पतियाँ
बनेंगी
फिर
से
जीवित
पुनः
संरक्षित
की
जाने
वाली
दुर्लभ
प्रजातियों
में
गरुण,
बीजा,
मेदा,
दहिमन,
सोनपाठा,
कुल्लू
धवा,
गोंदी,
पाकर,
सलई,
अचार,
गधा
पलाश,
निर्मली,
अंजन,
मोरखा,
कुम्भी
तिन्सा,
हल्दू,
भिलमा,
कुसुम
और
खटाम्बा
जैसी
वनस्पतियाँ
शामिल
हैं।
ये
प्रजातियाँ
न
केवल
औषधीय
गुणों
से
भरपूर
हैं
बल्कि
वायुमंडल
को
भी
शुद्ध
करने
में
सहायक
होती
हैं।
मुख्य
वन
संरक्षक
पीएन
मिश्रा
और
डीएफओ
प्रदीप
मिश्रा
के
मार्गदर्शन
में
यह
अभियान
तेजी
से
आगे
बढ़
रहा
है,
जिससे
उम्मीद
है
कि
आने
वाले
वर्षों
में
इंदौर
और
मध्यप्रदेश
के
पर्यावरण
को
नई
संजीवनी
मिलेगी।