
मालवा
निमाड़
–
फोटो
:
अमर
उजाला
विस्तार
चुनाव
के
दौरान
क्षेत्रीय
समीकरण
भी
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभाते
है।
थोकबंद
वोटबैंक
वाले
क्षेत्र
यदि
दूसरे
लोकसभा
क्षेत्र
में
जुड़
जाए
तो
फिर
वर्षों
से
बनी
राजनीतिक
पकड़
कमजोर
होना
तय
है।
मालवा
निमाड़
की
धार
और खरगोन
लोकसभा
सीट
के
साथ
भी
यही
हुआ।
दोनो
सीटें
कांग्रेस
का
गढ़
मानी
जाती
थी,
लेकिन
वर्ष
2009
में
हुए
परिसीमन
के
बाद
दोनो
सीटों
पर राजनीतिक
बदलाव
देखने
को
मिला,
हालांकि
वर्ष
2009
में
धार
से
कांग्रेस
के
उम्मीदवार
गजेंद्र
राजूखेड़ी
चुनाव
जीत
गए
थे,
लेकिन
लीड
का
अंतर
2661
वोट
था।
तब
यह
प्रदेश
की
सबसे
कम
वोटों
की
जीत
थी,लेकिन
फिर
वर्ष
2014
के
बाद
कांग्रेस
कभी
इस
सीट
पर
कब्जा
नहीं
जमा
पाई।
परिसीमन
के
बाद
धार
लोकसभा
सीट
में
इंदौर
जिले
की
महू
विधानसभा
सीट
भी
जुड़
गई
थी।
परिसीमन
के
कारण
अरुण
यादव
को
खंडवा
से
लड़ना
पड़ा
खरगोन
लोकसभा
क्षेत्र
वर्ष
2009
के
पहले
अनारक्षित
था।
वर्ष
2004
में
भाजपा
के
वरिष्ठ
नेता
कृष्णमुरारी
मोघे
को
भाजपा
ने
उम्मीदवार
बनाया
था।
वे
चुनाव
जीत
गए,
लेकिन
लाभ
के
दो
पदों
के
कारण
उनकी
सांसदी
छिन
गई।
वर्ष
2007
में
खरगोन
में
फिर
उपचुनाव
हुए,
लेकिन
तब
मोघे
का
सामना
कांग्रेस
के
कद्दावर
नेता
व
पूर्व
मुख्यमंत्री
रहे
सुभाष
यादव
के
बेटे
अरुण
यादव
से
हुआ।
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यादव
ने
मोघे
को
डेढ़
लाख
वोटों
के
अंतर
से
हराकर
राजनीति
में
अपनी
धमाकेदार
शुरूआत
की,लेकिन
वर्ष
2009
में
वे
खरगोन
लोकसभा
सीट
से
चुनाव
नहीं
लड़
पाए,क्योकि
परिसीमन
के
कारण
बड़वाह
और
भगवानपुरा
विधानसभा
खंडवा
लोकसभा
क्षेत्र
में
जुड़
गई
और
खरगोन
लोकसभा
सीट
एसटी
सीट
हो
गई।
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कहा
जाता
है
कि
तब
एससी
सीट
छिंदवाड़ा
होने
वाली
थी,
लेकिन
फिर
खरगोन
लोकसभा
सीट
में
बदलाव
कर
उसे
एससी
श्रेणी
के
लिए
आरक्षित
किया
गया।
वर्ष
2009
में
अरुण
यादव
खंडवा
से
लड़े
और चुनाव
भी
जीत
गए,
लेकिन
वर्ष
2014
में
वे
खंडवा
लोकसभा
सीट
से
चुनाव
हार
गए।
परिसीमन
के
बाद
वर्ष
2009
से
खरगोन
लोकसभा
सीट
भाजपा
के
कब्जे
में
है।