अजय
दुबे
वाइल्ड
लाइफ
एक्टिविस्ट
विस्तार
मध्य
प्रदेश
का
उमरिया
जिला
इन
दिनों
काफी
सुर्खियों
में
है।
हाल
ही
में
जिले
के
बांधवगढ़
टाइगर
रिर्जव
में
10
हाथियों
की
मौत
हुई
है,
जो
पूरे
प्रदेश
और
देश
में
चर्चा
का
विषय
बन
गई
है।
आज
तक
देश
में
इतनी
बड़ी
संख्या
में
हाथियों
की
एक
साथ
मौत
नहीं
हुई
थी,
जिससे
प्रशासन
में
हड़कंप
मच
गया
है।
वाइल्डलाइफ
एक्टिविस्ट
अजय
दुबे
ने
पहले
ही
चेतावनी
दी
थी
कि
कुछ
लापरवाह
अधिकारियों
की
वजह
से
निर्दोष
जानवरों
की
जान
जा
रही
है
और
अब
उनकी
आशंका
सच
साबित
हुई
है।
2022
में
भी
एक
हाथी
के
शिकार
की
खबर
आई
थी,
लेकिन
उस
समय
छोटे
कर्मचारियों
पर
कार्रवाई
की
गई
थी
जबकि
बड़े
अधिकारी
अब
भी
अपनी
जगह
बने
हुए
हैं,
जिससे
इस
प्रकार
की
घटनाएं
समय-समय
पर
सामने
आ
रही
हैं।
अजय
दुबे
ने
अपने
पत्र
में
लिखा
है
कि
वन्य
जीवन
के
इतिहास
में
हाथियों
की
जहरीले
पदार्थ
से
हत्या
की
यह
अब
तक
की
सबसे
दर्दनाक
घटना
है।
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अजय
दुबे
ने
अपने
पत्र
में
लिखा-
बांधवगढ़
टाइगर
रिजर्व
में
बीते
कुछ
दिनों
में
10
हाथियों
की
मौत
हो
चुकी
है।
इससे
पहले
2022
में
भी
पनपथा
रेंज
में
एक
हाथी
का
शिकार
हुआ
था,
जिसकी
शिकायत
मैंने
एनटीसीए
को
की
थी।
जांच
के
बाद
कई
वन
कर्मियों
को
आरोपी
पाया
गया,
लेकिन
इस
केस
में
दो
बड़े
आरोपी
अब
भी
कानूनी
कार्रवाई
से
मुक्त
हैं।
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विज्ञापन
इनमें
एसडीओ
फतेह
सिंह
निनामा,
जो
आज
भी
पनपथा
अभयारण्य
के
अधीक्षक
हैं
और
पूर्व
डीएफओ
लावित
भारती,
जो
किसी
अन्य
स्थान
पर
पदस्थ
हैं।
इस
केस
की
सही
जांच
जरूरी
है
ताकि
वर्तमान
हादसे
की
जांच
में
मदद
मिल
सके।
मेरी
जानकारी
के
अनुसार,
निकटवर्ती
गांवों
में
बड़े
पैमाने
पर
जहरीले
कीटनाशकों
का
उपयोग
होता
है
और
संभवतः
इसी
का
फायदा
उठाकर
अपराधियों
ने
हाथियों
पर
जानलेवा
हमला
किया।
वन
विभाग
के
अलावा
उमरिया
जिला
प्रशासन
को
भी
इस
क्षेत्र
की
गतिविधियों
पर
सक्रिय
और
सजग
रहना
चाहिए
था।
यह
उठ
रहे
हैं
सवाल
-
उमरिया
जिला
प्रशासन
पेस्टीसाइड
विक्रेताओं
से
उन
लोगों
का
रिकॉर्ड
निकालें
जिन्होंने
घटना
स्थल
के
पास
इतनी
बड़ी
मात्रा
में
पेस्टीसाइड
क्यों
खरीदा? -
बांधवगढ़
टाइगर
रिजर्व
के
फील्ड
डायरेक्टर
गौरव
चौधरी
छुट्टी
पर
थे।
उनका
कार्यभार
किसे
सौंपा
गया
था,
यह
जांच
का
विषय
है।
घटना
स्थल
पर
सिर्फ
डीएफओ
प्रकाश
वर्मा
को
सक्रियता
से
कार्यवाही
करते
देखा
गया। -
जानकारी
के
अनुसार,
बांधवगढ़
टाइगर
रिजर्व
में
हाथियों
के
जहरीला
पदार्थ
खाने
के
बाद
निकट
के
सरकारी
पशु
चिकित्सकों
ने
मदद
करने
से
मना
कर
दिया,
जो
गंभीर
लापरवाही
है।
केवल
डॉक्टर
मधु
जैन
ही
अकेले
वहां
पहुंचकर
इलाज
शुरू
कर
सकीं। -
मध्य
प्रदेश
के
वन
विभाग
ने
वन्य
प्राणी
संरक्षण
अधिनियम
1972
की
धारा
38(U)
के
तहत
मुख्यमंत्री
की
अध्यक्षता
में
राज्य
स्तरीय
स्टीयरिंग
कमेटी
का
गठन
नहीं
किया
है,
जिससे
वन्य
प्राणी
संरक्षण
में
लापरवाही
हो
रही
है। -
मध्य
प्रदेश
में
गोपनीय
सूचनाएं
साझा
करने
के
लिए
वन
विभाग
और
पुलिस
के
साथ
गठित
राज्य
स्तरीय
और
जिला
टाइगर
सेल
भी
निष्क्रिय
हैं,
जिससे
वन्य
अपराधियों
में
कोई
भय
नहीं
है।
मध्य
प्रदेश
सरकार
स्पेशल
टास्क
फोर्स
क्यों
नहीं
गठित
कर
रही
है?
दुर्लभ
वन्य
प्राणियों,
जैसे
बाघ
और
हाथियों
के
शिकार
को
रोकने
के
लिए
स्पेशल
टाइगर
प्रोटेक्शन
फोर्स
का
गठन
करने
में
असफल
मध्य
प्रदेश
सरकार
को
जवाब
देना
चाहिए,
ताकि
इस
फोर्स
का
गठन
शीघ्र
हो
सके।
मैं
इस
फोर्स
के
गठन
के
लिए
वर्ष
2014
से
मध्य
प्रदेश
हाई
कोर्ट
में
कानूनी
लड़ाई
लड़
रहा
हूं।