
मप्र
हाईकोर्ट
के
चीफ
जस्टिस
सुरेश
कुमार
कैत
और
जस्टिस
विवेक
जैन
की
युगलपीठ
ने
अपने
अंतरिम
आदेश
के
जरिए
स्कूलों
के
रजिस्टर्ड
किरायानामा
की
शर्त
पर
रोक
लगा
दी
है।
इसके
साथ
ही
युगलपीठ
ने
मामले
में
राज्य
शासन
को
जवाब
पेश
करने
के
लिए
छह
सप्ताह
की
मोहलत
दी
है।
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विज्ञापन
दरअसल,
2009
के
निशुल्क
शिक्षा
अधिकार
अधिनियम
के
अंतर्गत
2011
में
मध्य
प्रदेश
में
यह
अधिनियम
लागू
किया
गया
था।
तब
रजिस्टर्ड
किरायानामा
और
सुरक्षा
निधि
और
प्रत्येक
वर्ष
का
मान्यता
शुल्क
ऐसे
कोई
भी
नियम
निर्धारित
नहीं
किए
गये
थे।
20
से
25
वर्षों
से
संचालित
स्कूल
रजिस्टर्ड
किरायानामा
के
कारण
स्थाई
रूप
से
बंद
होने
की
कगार
पर
आ
गये
हैं।
30
से
40
प्रतिशत
स्कूल
संचालकों
ने
नोटरी
कृत
किरायानामा
लगाकर
आवेदन
किया,
जिनकी
मान्यता
निरस्त
हो
रही
है।
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होंगे
तैयार
नये
नियमों
से
लगभग
सात
से
आठ
हजार
स्कूलों
के
बंद
होने
की
संभावना
है।
इनमें
कार्यरत
शिक्षक
शिक्षिका
और
कर्मचारी
बेरोजगार
हो
सकते
हैं।
निशुल्क
शिक्षा
अधिकार
अधिनियम
में
पढ़ने
वाले
बच्चे
शिक्षा
से
वंचित
हो
सकते
हैं।
उक्त
सभी
समस्याओं
को
मप्र
प्राइवेट
स्कूल
वेलफेयर
संचालक
मंच
के
प्रदेश
अध्यक्ष
शैलेष
तिवारी,
प्रदेश
अध्यक्ष
आनंद
भागवत,
प्रदेश
सचिव
अरविंद
मिश्रा,
सहसचिव
अनुराग
भार्गव,
कोषाध्यक्ष
मोनू
तोमर,
सलाहकार
विकास
अवस्थी,
जबलपुर
की
ओर
से
चुनौती
दी
गई।
याचिकाकर्ताओं
का
पक्ष
अधिवक्ता
स्मिता
वर्मा
अरोरा
ने
रखा।
उन्होंने
निजी
स्कूलों
की
समस्या
हाईकोर्ट
के
समक्ष
रखी।
जिस
पर
गौर
करने
के
बाद
हाईकोर्ट
ने
सात
मई
2025
तक
छह
जनवरी
2023
के
राजपत्र
अधिसूचना
को
स्थगित
रखे
जाने
की
अंतरिम
व्यवस्था
दे
दी।