Damoh News: इस सीट पर अजब है 35 साल का इतिहास, दल बदलकर बनता है सांसद या बनने के बाद बदल देता है

Damoh News: इस सीट पर अजब है 35 साल का इतिहास, दल बदलकर बनता है सांसद या बनने के बाद बदल देता है
Unique history of Damoh Lok Sabha, MPs kept changing parties before or after winning the elections

मध्यप्रदेश
लोकसभा
चुनाव


फोटो
:
अमर
उजाला

विस्तार

दमोह
लोकसभा
संसदीय
क्षेत्र
का
एक
अनोखा
इतिहास
रहा
है।
यहां
दल
बदलने
वाले
नेता
ही
35
वर्षों
से
लोकसभा
का
चुनाव
जीत
रहे
हैं।
इस
अवधि
में
सिर्फ
2009
के
निर्वाचित
भाजपा
सांसद
को
छोड़
दिया
जाए
तो
जितने
भी
सांसद
बने,
उन्होंने
चुनाव
से
पहले
या
बाद
में
दल
बदलने
का
काम
अवश्य
ही
किया
है।
यह
क्रम
उस
समय
से
प्रारंभ
है
जब
दमोह-पन्ना
संसदीय
क्षेत्र
हुआ
करता
था।
आज
यह
दमोह-रहली
संसदीय
क्षेत्र
बन
गया
है।

पूर्व
में
दमोह-पन्ना
संसदीय
क्षेत्र
में
जिले
की
चार
विधानसभा
के
अलावा
छतरपुर
जिले
की
बड़ा
मलहरा
और
पन्ना
की
तीन
विधानसभा
सीटें
शामिल
रहती
थी।
नए
परिसीमन
के
बाद
दमोह
संसदीय
क्षेत्र
में
दमोह
जिले
की
चारों,
छतरपुर
जिले
की
बड़ा
मलहरा
और
सागर
जिले
की
देवरी,
रहली
और
बंडा
विधानसभा
सीटों
को
शामिल
कर
दमोह-रहली
संसदीय
क्षेत्र
बनाया
गया
है।


राजा
लोकेंद्र
सिंह
से
शुरू
हुआ
सिलसिला

जब
दमोह-पन्ना
संसदीय
क्षेत्र
हुआ
करता
था,
तब
1989
में
पन्ना
राजा
लोकेंद्र
सिंह
ने
भाजपा
के
टिकट
पर
कांग्रेस
के
डालचंद
जैन
को
हराया
था।
इसके
बाद
जब
उन्हें
दूसरी
बार
टिकट
नहीं
मिला
तो
कांग्रेस
में
चले
गए।
फिर पन्ना
से
कांग्रेस
के
विधायक
बने।
रामकृष्ण
कुसमरिया
ने
1991
में
डालचंद
जैन,
1996
में
मुकेश
नायक,
1998
में
नरेश
जैन
और
वर्ष
1999
में
तिलक
सिंह
लोधी
को
हराया।
लगातार
चार
बार
सांसद
बने।
2004
में
उन्हें
खजुराहो
संसदीय
सीट
से
दिल्ली
जाने
का
मौका
मिला।
2013
में
कुसमरिया
पथरिया
विधानसभा
से
विधायक
बने
और
मध्य
प्रदेश
में
बतौर
मंत्री
कृषि
विभाग
संभाला।
2018
में
उन्हें
टिकट
नहीं
दिया
तो
बागी
हो
गए।
दमोह
और
पथरिया
सीटों
से
निर्दलीय
चुनाव
लड़ा
और
दोनों
पर
हारे।
2018
में
कांग्रेस
की
सरकार
बनी
तो
उसमें
चले
गए।
एक
साल
बाद
घर
वापसी
हो
गई


पैसे
लेकर
क्रॉस
वोटिंग
के
आरोप

2004
में
भाजपा
के
टिकट
चंद्रभान
सिह
ने
कांग्रेस
के
तिलक
सिंह
लोधी
को
हराया
था।
लोकसभा
में
परमाणु
संधि
पर
आए
अविश्वास
प्रस्ताव
के
दौरान
सदन
से
अनुपस्थित
रहे
थे।
उन
पर
क्रॉस
वोट
का
आरोप
लगा
और
भाजपा
ने
पार्टी
से
निकाल
दिया
था।
तब
चंद्रभान
सिंह
कांग्रेस
में
शामिल
हो
गए
थे।
2009
के
लोकसभा
चुनाव
में
कांग्रेस
प्रत्याशी
बने
और
हार
गए।
विधानसभा
चुनाव
भी
लड़ा
लेकिन
दोनों
ही
चुनाव
हार
गए।
तब
एक
बार
फिर
वापस
भाजपा
में
लौट
गए।
2014
और
2019
के
चुनावों
में
जीते
प्रहलाद
पटेल
भी
भाजपा
एक
बार
छोड़
चुके
हैं।
वह
2005
में
उमा
भारती
के
साथ
उनकी
भारतीय
जनशक्ति
पार्टी
में
चले
गए
थे।
जब
नई
पार्टी
को
चुनावी
सफलता
नहीं
मिली
तो
भाजपा
में
लौट
आए
थे।
इस
समय
नरसिंहपुर
से
विधायक
हैं
और
राज्य
शासन
में
मंत्री
भी
हैं। 2009
में
शिवराज
लोधी
सांसद
बने
थे,
जिन्होंने
दल-बदल
नहीं
किया।
अन्यथा
वर्ष
1989
से
लगातार
जो
भी
सांसद
बना,
उसने
चुनाव
लड़ने
से
पहले
या
बाद
में
दल
जरूर
बदला
है।
इन
35
वर्षों
में
शिवराज
लोधी
को
छोड़कर
कोई
भी
सांसद
ऐसा
नहीं
रहा,
जो
सिर्फ
एक
पार्टी
से
जुड़ा
रहा
हो।  


वर्तमान
में
भाजपा
प्रत्याशी
ने
भी
किया
दलबदल

लोकसभा
चुनाव
में
दमोह
संसदीय
क्षेत्र
से
भाजपा
के
टिकट
पर
राहुल
सिंह
लोधी
चुनाव
मैदान
में
हैं।
वर्ष
2018
में
दमोह
विधानसभा
से
कांग्रेस
विधायक
बने
थे।
उसके
बाद
विधायक
एवं
पार्टी
से
त्यागपत्र
देकर
भाजपा
में
शामिल
हो
गए
थे।
उपचुनाव
में
उन्हें
हार
का
सामना
करना
पड़ा
था।
उसके
बाद
वर्तमान
में
भाजपा
ने
इन्हें
लोकसभा
में
अपना
प्रत्याशी
बनाया
है।
उनके
सामने
कांग्रेस
के
तरवर
सिंह
लोधी
है,
जो
एक
जमाने
में
राहुल
सिंह
के
मित्र
हुआ
करते
थे।
दोनों
अलग-अलग
विधानसभा
क्षेत्रों
से
साथ
में
ही
विधानसभा
पहुंचे
थे।