विक्रमोत्सव: उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य ने की थी विक्रम संवत की शुरुआत, 2080 साल पुराना है इनका इतिहास

बाबा
महाकाल
की
नगरी
उज्जयिनी
की
पहचान
महाकाल
के
अलावा
राजा
विक्रमादित्य
से
भी
होती
है।
उन्होंने
हिन्दू
कैलेंडर
विक्रम
संवत
की
शुरुआत
उज्जैन
से
की
थी।
राजा
विक्रमादित्य
का
36
पुुतलियों
वाले
रहस्यमयी
सिंहासन
को
लेकर
भी
कई
किस्से
कहानियां
उज्जैन
में
प्रचलित
हैं।


विज्ञापन

Trending
Videos

माना
जाता
है
कि
राजा
विक्रमादित्य
का
दरबार
उनकी
कुलदेवी
हरसिद्धि माता
के
मंदिर
के
सामने
लगता
था
और
वहीं
उनका
सिंहासन
स्थित
था।
उस
स्थान
पर
खुदाई
में
निकले
पत्थरों
को
सिंहासन
के
अवशेष
मानकर
रोज
उनकी
पूजा
होती
है
और
पर्यटक
उस
विक्रम
टीले
को
भी
देखने
दूर
दूर
से
आते
हैं।
उज्जैनवासियों
की
मान्यता
है
कि
रुद्र
सागर
के
पास
जो
टीला
है,
वहां
पर
सिंहासन
जमीन
में
दबा
है।
प्रदेश
सरकार
ने
वर्ष
2015
को
इस
स्थान
पर
राजा
विक्रमादित्य
के
सिंहासन
वाली
प्रतिमा
यहां
स्थापित
की
है
और
अब
यहां
एक
पैदल
पुल
भी
बनाया
गया।


विज्ञापन


विज्ञापन


रोज
होती
है
सिंहासन
की
पूजा

उज्जैन
मेंं
विक्रमादित्य
का
एक
प्राचीन
मंदिर
भी
है।
इसके
अलावा
सिंहासन
के
अवशेषों
के
भी
उनकी
एक
मूर्ति
रखी
है।
पुजारी
बताते
हैं
कि
विक्रमादित्य
के
सिंहासन
की
रोज
पूजा
होती
है।
उनके
स्थान
पर
अलग
ही
अनुभूति
होती
है।
कई
लोग
यहां
ध्यान
लगाकर
भी
बैठते
हैं।


32
मुखों
वाला
सिंहासन
भी
है
खास

पंडित
रघुनन्दन
शर्मा
ने
बताया
कि
सिंहासन
बत्तीसी
के
बारे
में
यह
मान्यता
है
कि
सम्राट
विक्रमादित्य
उस
सिंहासन
पर
बैठकर
न्याय
करते
थे
और
उस
पर
बने
32
मुख
इसमें
उनकी
सहायता
किया
करते
थे।
विक्रमादित्य
का
राज
समाप्त
होने
के
बाद
सिंहासन
गायब
हो
गया
तो
सालों
बाद
राजा
भोज
ने
इसकी
वापस
खोज
करवाई
और
उस
पर
बैठना
चाहा,
लेकिन
उनकी
इच्छा
पूरी
नहीं
हो
पाई।
सिंहासन
की
32
पुतलियों
ने
राजा
विक्रमादित्य
की
महानता
का
बखान
करते
हुए
राजा
भोज
को
सिंहासन
पर
बैठने
नहीं
दिया।