

-
Hindi
News -
National -
Maharashtra
Minor
Rape
Victim
Abortion
Case;
DY
Chandrachud
|
Supreme
Court
नई
दिल्ली26
मिनट
पहले
-
कॉपी
लिंक

सुप्रीम
कोर्ट
ने
19
अप्रैल
को
इस
मामले
में
अर्जेंट
सुनवाई
की
थी,
जिसमें
कोर्ट
ने
लड़की
का
मेडिकल
कराने
का
आदेश
दिया
था।
सुप्रीम
कोर्ट
ने
14
साल
की
रेप
विक्टिम
को
30
हफ्ते
की
प्रेग्नेंसी
में
अबॉर्शन
कराने
की
इजाजत
दे
दी
है।
सुप्रीम
कोर्ट
ने
सोमवार
(22
अप्रैल)
को
मुंबई
के
लोकमान्य
तिलक
अस्पताल
को
तत्काल
अबॉर्शन
के
लिए
इंतजाम
करने
का
आदेश
दिया
है।
सुप्रीम
कोर्ट
ने
19
अप्रैल
को
इस
मामले
में
अर्जेंट
सुनवाई
की
थी,
जिसमें
कोर्ट
ने
लड़की
का
मेडिकल
कराने
का
आदेश
दिया
था।
आज
सुबह
10:30
बजे
अस्पताल
ने
सुप्रीम
कोर्ट
में
अपनी
रिपोर्ट
दाखिल
की।
चीफ
जस्टिस
डीवाई
चंद्रचूड़
और
जस्टिस
जेबी
पारदीवाला
की
बेंच
ने
आदेश
सुनाते
हुए
कहा-
मेडिकल
रिपोर्ट
में
साफ
कहा
गया
है
कि
प्रेग्नेंसी
जारी
रखने
से
विक्टिम
की
मेंटल
और
फिजिकल
हेल्थ
पर
असर
पड़ेगा।
हालांकि,
रिपोर्ट
में
यह
भी
कहा
गया
है
कि
अबॉर्शन
कराने
में
थोड़ा
रिस्क
तो
है,
लेकिन
प्रेग्नेंसी
जारी
रखने
में
और
भी
बड़ा
रिस्क
है।
दरअसल,
नाबालिग
की
मां
ने
पहले
बॉम्बे
हाईकोर्ट
में
याचिका
दाखिल
की
थी।
4
अप्रैल
को
बॉम्बे
हाईकोर्ट
ने
नाबालिग
को
अबॉर्शन
की
इजाजत
नहीं
दी।
इसके
बाद
लड़की
की
मां
ने
सुप्रीम
कोर्ट
में
याचिका
डाली
थी।
सुप्रीम
कोर्ट
ने
19
अप्रैल
को
हाईकोर्ट
के
फैसले
को
खारिज
करते
हुए
नाबालिग
का
मेडिकल
चेकअप
कराने
का
आदेश
दिया
था।

सुप्रीम
कोर्ट
ने
कहा-
मेडिकल
बोर्ड
राय
दे
कि
बच्ची
की
जिंदगी
खतरे
में
डाले
बिना
अबॉर्शन
कैसे
होगा
इस
मामले
में
IPC
की
धारा
376
और
POCSO
एक्ट
में
केस
दर्ज
है।
CJI
चंद्रचूड़
की
बेंच
ने
पिछली
सुनवाई
में
कहा
कि
यौन
उत्पीड़न
को
लेकर
बॉम्बे
हाईकोर्ट
ने
जिस
मेडिकल
रिपोर्ट
पर
भरोसा
किया,
वह
नाबालिग
पीड़ित
की
शारीरिक
और
मानसिक
कंडीशन
का
आकलन
करने
में
विफल
रही
है।
बेंच
ने
निर्देश
दिया
था
कि
महाराष्ट्र
सरकार
याचिकाकर्ता
और
उसकी
नाबालिग
बेटी
को
सेफ्टी
के
साथ
अस्पताल
ले
जाना
तय
करे।
जांच
के
लिए
गठित
मेडिकल
बोर्ड
इस
बात
पर
भी
राय
दे
कि
क्या
नाबालिग
के
जीवन
को
खतरे
में
डाले
बिना
अबॉर्शन
किया
जा
सकता
है।
प्रेग्नेंसी
अबॉर्शन
का
नियम
क्या
कहता
है
मेडिकल
टर्मिनेशन
ऑफ
प्रेग्नेंसी
(MTP)
एक्ट
के
तहत,
किसी
भी
शादीशुदा
महिला,
रेप
विक्टिम,
दिव्यांग
महिला
और
नाबालिग
लड़की
को
24
हफ्ते
तक
की
प्रेग्नेंसी
अबॉर्ट
करने
की
इजाजत
दी
जाती
है।
24
हफ्ते
से
ज्यादा
प्रेग्नेंसी
होने
पर
मेडिकल
बोर्ड
की
सलाह
पर
कोर्ट
से
अबॉर्शन
की
इजाजत
लेनी
पड़ती
है।
MTP
एक्ट
में
बदलाव
साल
2020
में
किया
गया
था।
उससे
पहले
1971
में
बना
कानून
लागू
होता
था।

अक्टूबर
2023
में
कोर्ट
ने
26
हफ्ते
की
प्रेग्नेंट
शादीशुदा
महिला
को
अबॉर्शन
की
इजाजत
नहीं
दी
थी
पिछले
साल
16
अक्टूबर
को
सुप्रीम
कोर्ट
ने
26
हफ्ते
5
दिन
की
प्रेग्नेंट
विवाहित
महिला
की
अबॉर्शन
की
अपील
खारिज
कर
दी
थी।
CJI
डीवाई
चंद्रचूड़,
जस्टिस
हिमा
कोहली
और
जस्टिस
बी
वी
नागरत्ना
की
बेंच
ने
तर्क
दिया
था
कि
प्रेग्नेंसी
टर्मिनेशन
की
24
हफ्तों
की
समय
सीमा
खत्म
हो
चुकी
है।
ऐसे
में
महिला
को
अबॉर्शन
की
इजाजत
नहीं
दे
सकते।
मामले
की
सुनवाई
के
दौरान
महिला
के
वकील
कॉलिन
गोन्जाल्विस
ने
तर्क
दिया
था
कि
यह
एक्सीडेंटल
और
अनप्लान्ड
प्रेग्नेंसी
थी।
महिला
को
नहीं
लगता
है
कि
वह
अगले
तीन
महीने
तक
इस
प्रेग्नेंसी
को
जारी
रख
सकती
है।
ये
उसके
अधिकारों
का
हनन
है।
इस
पर
बेंच
ने
कहा-
महिला
26
हफ्ते
और
5
दिन
की
प्रेग्नेंट
है।
AIIMS
की
रिपोर्ट
के
मुताबिक,
कोख
में
पल
रहा
भ्रूण
पूरी
तरह
स्वस्थ
है।
मां
को
भी
कोई
खतरा
नहीं
है।
AIIMS
महिला
की
डिलीवरी
करे
और
सरकार
इसका
खर्च
उठाए।
बच्चे
के
जन्म
के
बाद
मां-बाप
फैसला
करें
कि
वो
उसे
पालना
चाहते
हैं
या
अडॉप्शन
के
लिए
देंगे।
इसमें
सरकार
उनकी
मदद
करेगी।
पूरी
खबर
यहां
पढ़ें…

जनवरी
2024
में
हाईकोर्ट
ने
29
हफ्ते
की
प्रेग्नेंट
विधवा
को
अबॉर्शन
की
इजाजत
दी
थी,
सुप्रीम
कोर्ट
ने
फैसला
पलटा
इस
साल
5
जनवरी
को
दिल्ली
हाईकोर्ट
ने
मानसिक
बीमारी
से
जूझ
रही
29
हफ्ते
की
प्रेग्नेंट
विधवा
को
अबॉर्शन
की
इजाजत
दी
थी।
कोर्ट
ने
कहा-
प्रेग्नेंसी
जारी
रखने
से
महिला
की
मेंटल
हेल्थ
पर
बुरा
असर
पड़
सकता
है।
रिप्रोडक्शन
चॉइस
राइट
में
बच्चे
को
जन्म
न
देने
का
अधिकार
भी
शामिल
है।
हाईकोर्ट
ने
कहा-
महिला
ने
19
अक्टूबर
2023
को
अपने
पति
को
खो
दिया
और
31
अक्टूबर
2023
को
पता
चला
कि
वो
प्रेग्नेंट
है।
जस्टिस
सुब्रमण्यम
प्रसाद
कहा
कि
महिला
के
मैरिटल
स्टेटस
बदल
गया
है।एम्स
की
मेंटल
हेल्थ
स्टेटस
रिपोर्ट
में
पता
चला
है
कि
महिला
अपने
पति
की
मौत
की
वजह
से
मानसिक
तौर
पर
परेशान
है।
हालांकि,
महिला
की
मेडिकल
रिपोर्ट
देखने
के
बाद
दिल्ली
हाईकोर्ट
ने
23
जनवरी
को
अपना
फैसला
खुद
ही
पलट
दिया।
कोर्ट
ने
कहा
कि
भ्रूण
पूरी
तरह
स्वस्थ
है।
ऐसे
में
प्रेग्नेंसी
को
टर्मिनेट
करना
न्यायसंगत
नहीं
होगा।
इसके
बाद
महिला
ने
दिल्ली
हाईकोर्ट
के
आदेश
के
खिलाफ
सुप्रीम
कोर्ट
में
याचिका
दाखिल
की।
मामले
की
सुनवाई
1
फरवरी
को
हुई,
तब
तक
महिला
32
हफ्ते
की
प्रेग्नेंट
हो
चुकी
थी।
कोर्ट
ने
भी
मेडिकल
रिपोर्ट
का
हवाला
देते
हुए
महिला
को
अबॉर्शन
की
इजाजत
नहीं
दी
थी।
कोर्ट
ने
कहा
कि
बच्चा
एकदम
स्वस्थ्य
है।
हम
ऐसे
मामलों
को
एंटरटेन
नहीं
कर
सकते
हैं।
महिला
के
लिए
सिर्फ
एक-दो
हफ्ते
की
बात
और
है।
अगर
महिला
बच्चे
को
अडॉप्शन
के
लिए
देना
चाहे
तो
सरकार
बच्चे
को
गोद
लेने
को
तैयार
है।
ये
खबरें
भी
पढ़ें…
बाबा
रामदेव
की
सुप्रीम
कोर्ट
में
याचिका:बिहार-छत्तीसगढ़
में
दर्ज
FIR
पर
एक्शन
न
हो,
अदालत
ने
कहा-
शिकायतकर्ताओं
को
भी
शामिल
करें

सुप्रीम
कोर्ट
ने
शुक्रवार
(19
अप्रैल)
को
योग
गुरु
रामदेव
की
एक
याचिका
पर
सुनवाई
की।
जिसमें
उन्होंने
कोविड-19
महामारी
के
दौरान
एलोपैथिक
दवाओं
के
इस्तेमाल
के
खिलाफ
उनकी
टिप्पणियों
पर
दर्ज
कई
FIR
क्लब
करने
और
दिल्ली
ट्रांसफर
करने
की
मांग
की
थी।
जस्टिस
एमएम
सुंदरेश
समेत
2
जजों
की
बेंच
ने
बाबा
रामदेव
से
उन
लोगों
को
भी
पार्टी
बनाने
का
निर्देश
दिया
है,
जिन्होंने
व्यक्तिगत
तौर
पर
उनके
खिलाफ
शिकायत
दर्ज
कराई
थी।
बेंच
ने
सुनवाई
की
अगली
तारीख
जुलाई
में
तय
की
है।
पूरी
खबर
यहां
पढ़ें…
CJI
बोले-
नए
क्रिमिनल
लॉ
समाज
के
लिए
ऐतिहासिक:ये
तभी
सफल
होंगे,
जब
जिन
पर
इन्हें
लागू
करने
का
जिम्मा
है,
वे
इन्हें
अपनाएंगे

चीफ
जस्टिस
डीवाई
चंद्रचूड़
ने
तीन
नए
आपराधिक
कानूनों
को
ऐतिहासिक
बताया।
CJI
ने
ये
भी
कहा
कि
भारत
अपनी
आपराधिक
न्याय
प्रणाली
में
अहम
बदलाव
के
लिए
तैयार
है।
ये
बदलाव
तभी
सफल
होंगे,
जब
जिन
पर
इन्हें
लागू
करने
का
जिम्मा
है,
वे
इन्हें
अपनाएंगे।
CJI
के
मुताबिक,
इन
नए
कानूनों
ने
आपराधिक
न्याय
के
कानूनी
ढांचे
को
एक
नए
युग
में
बदल
दिया
है।
ये
ऐतिहासिक
इसलिए
हैं,
क्योंकि
कोई
भी
कानून
क्रिमिनल
लॉ
जैसा
रोजमर्रा
की
जिंदगी
को
प्रभावित
नहीं
करता।
पूरी
खबर
यहां
पढ़ें…
खबरें
और
भी
हैं…