
कालिदास
की
रचनाओं
को
पढ़े
बिना
प्राचीन
भारतीय
मेधा,
शृंगार
और
सच
कहा
जाए
तो
साहित्य
से
पूरा
परिचय
कर
पाना
संभव
नहीं
है.
कालिदास
की
रचनाओं
की
अनेक
विशेषताओं
में
एक
ये
भी
है
कि
उनके
शब्द,
प्रतीक,
बिम्ब
विधान
कुछ
ऐसे
हैं
जो
पूरे
परिवेश
को
सामने
जीवंत
कर
देते
हैं.
ज्यादातर
आलोचक
और
आचार्य
इस
पर
सहमत
है
कि
कालिदास
ने
अगर
अपना
पूरे
रचना
संसार
में
से
कोई
एक
भी
रचना
की
होती
तो
वे
उसी
शिखर
पर
होते
जैसे
अब
हैं.
उनकी
रचना
‘मेघदूत’
की
कल्पना
तो
बिल्कुल
निराली,
अद्भुत
है.
इस
रचना
में
कवि
ने
विरही
यक्ष
के
मनोदशा
के
वर्णन
के
साथ
प्रकृति
और
भारतीय
हिंदू
मिथकीय
कथाओं
का
अद्भुत
प्रयोग
करते
हैं.
लेकिन
अब
कालिदास
को
पढ़ना
बहुत
सारे
लोगों
के
लिए
इस
कारण
परेशानी
वाला
हो
गया
है
क्योंकि
मूल
रचनाएं
तो
संस्कृत
में
हैं
और
इनके
अनुवाद
अपेक्षाकृत
कठिन
हिंदी
में
ही
मिलते
हैं.
कालिदास
के
‘मेघदूत’
को
पेंगुइन
स्वदेश
प्रकाशन
ने
सरल
हिंदी
में
पॉकेट
बुक
स्टाइल
में
छाप
कर
इसे
पढ़ना
सरल
बनाने
की
कोशिश
की
है.
आचार्य
महावीर
प्रसाद
द्विवेदी
की
भूमिका
को
किताब
में
शामिल
किया
गया
है.
आचार्य
द्विवेदी
की
भूमिका
से
ही
‘मेघदूत’
के
बारे
में
बहुत
कुछ
पता
चल
जाता
है.
आठ
पृष्ठों
की
इस
भूमिका
में
उन्होंने
बहुत
ही
सरल
तरीके
से
कालिदास
और
उनकी
रचना
के
बारे
में
समझा
दिया
है.
उन्होंने
बहुत
प्रभावी
तरीके
से
यक्ष
के
कुबेर
की
अलकापुरी
से
निकाले
जाने
की
कथा
और
फिर
निर्जीव
बादल
से
संवाद
के
आधार
को
समझाया
है.
आचार्य
द्विवेदी
आचार्य
द्विवेदी
ने
यक्ष
के
बारे
में
बताते
हुए
कहा
है
उसके
हृदय
में
इतना
अधिक
प्रेम
है
कि
उसमें
ईर्ष्या,
विद्वेष
जैसी
भावनाओं
का
कोई
स्थान
ही
नहीं
है.
यही
कारण
है
कि
उसे
पत्नी
से
अलग
रहने
का
आदेश
देने
वाले
अपने
स्वामी
पर
भी
कोई
गुस्सा
नहीं
है.
कालिदास
ने
मेघ
को
दूत
बनाने
की
अपनी
योजना
और
उद्देश्य
के
बारे
में
भी
साफ
किया
है
कि
विरही
श्रीराम
ने
पवनसुत
को
अपना
दूत
बनाया
था.
उसी
तरह
से
पवन
से
मैत्री
रख
कर
उड़ने
वाले
मेघ
को
यक्ष
ने
अपना
दूत
बनाया.
कालिदास
और
मेघदूत
‘कालिदास
और
मेघदूत’
के
बारे
में
इसी
पुस्तक
में
प्रसिद्ध
शिक्षाविद्
और
साहित्यकार
डॉ.
भगवतशरण
उपाध्याय
लिखते
हैं-
महाकवि
कालिदास
हमारे
देश
के
उन
यशस्वी
साहित्यकारों
में
से
हैं,
जो
सदा-सदा
के
लिए
अमर
हो
गए
हैं.
उनका
यश
इस
विशाल
देश
की
सीमाओं
को
लांघकर
सारे
सभ्य
संसार
में
फैल
चुका
है.
उन्हें
हुए
लगभग
डेढ़
हज़ार
वर्ष
हो
चुके
हैं
पर
उनके
काव्य
और
नाटक
आज
भी
अपना
सानी
नहीं
रखते;
बल्कि
यह
कहना
अधिक
संगत
होगा
कि
उनकी
लोकप्रियता
दिनोदिन
बढ़ती
ही
जा
रही
है.
इस
महान
कवि
के
जन्मस्थान,
जन्मतिथि,
यहां
तक
कि
नाम
और
रचनाओं
के
बारे
में
भी
विद्वानों
में
गहरा
मतभेद
है.
विद्वानों
ने
उन्हें
बंगाल,
उड़ीसा
से
लेकर
मध्यभारत
और
कश्मीर
तक
का
निवासी
माना
है.
उनके
जन्म
के
संबंध
में
ईसापूर्व
दूसरी
शताब्दी
से
लेकर
ईस्वी
सन्
छठी
शताब्दी
तक
विभिन्न
विद्वानों
के
विभिन्न
मत
हैं,
परंतु
अधिकतर
विद्वान
महाकवि
की
जन्मभूमि
कश्मीर
को
मानते
हैं
और
काल
ईस्वी
सन्
365
से
445
के
बीच.
एक
बात
तो
बिल्कुल
स्पष्ट
है
कि
कालिदास
देश-भर
में
खूब
घूमे
थे.
यही
कारण
है
कि
उन्होंने
अपनी
रचनाओं
में
जिन-जिन
स्थानों
का
वर्णन
किया
है,
वह
पूरी
सच्चाई
लिए
हुए
है.
प्रूफ
की
गलतियां
यक्ष
रामगिरि
में
निर्वसन
गुजार
रहा
है.
वहां
आषाढ़
महीने
के
पहले
दिन
‘आषाढस्य
प्रथमदिवसे…’
उसे
मेघ
दिखता
है.
मेघ
भी
ऐसा
जैसे
कोई
हाथी
टीले
से
खेल-खेल
में
टक्कर
मार
रहा
हो.
उसके
वियोग
का
सब्र
यहां
टूट
जाता
है.
तभी
वो
इसी
मेघ
से
अपनी
कुशलता
और
संदेश
प्रिया
को
भिजवाने
का
विचार
कर
लेता
है.
इस
दूसरे
श्लोक
में
ही
पुस्तक
में
प्रूफ
की
गलती
खटकती
है.

इस
पुस्तक
का
महत्व
सरल
हिंदी
अनुवाद
के
कारण
है
फिर
भी
संस्कृत
मूल
में
प्रूफ
की
गलती
नहीं
होनी
चाहिए.
इसी
क्रम
में
पुस्तक
के
39वें
श्लोक
में
पहली
लाइन
अजीब-सी
प्रकाशित
हो
गई
है.
संस्कृत
श्लोक
शुरू
होने
से
पहले
हिंदी
की
एक
पूरी
लाइन
सबसे
ऊपर
छपी
हुई
है.
इस
तरह
की
गलतियां
सुधी
पाठकों
को
खटेंगी.
जैसे-
“शांत
चिंता,
शांत
नेत्र,
देखी
हुई
भक्ति,
हे
भवन्या”
कथाएं
भी
होती
तो
और
आनंद
होता
फिर
भी
जो
सबसे
अहम
है
वो
इसका
हिंदी
अनुवाद
है.
बहुत
ही
सरल,
कहा
जाए
बोलचाल
की
भाषा
में
अनुवाद
किया
गया
है.
ये
समझने
के
लिए
तो
अच्छा
है
लेकिन
जिन
स्थानों
पर
पारिभाषिक
शब्दावली
या
मिथकीय
प्रतीकों
का
प्रयोग
किया
गया
है
वहां
अगर
स्पष्टीकरण
के
तौर
पर
भी
नीचे
पूरी
बात
लिखी
होती
तो
अच्छा
लगता.
39वें
श्लोक
के
शब्द
-पशुपतेरार्द्रनागजिनेच्छां
–
में
गजचर्म
का
प्रयोग
उस
राक्षस
के
संदर्भ
में
किया
गया
है
जिसे
मार
कर
शिवजी
ने
उसकी
खाल
ही
पहन
ली
थी.
इस
तरह
से
ये
कहानी
श्लोक
का
रस
बढ़ा
देती
है.
फिर
भी
सहज
भाषा
में
किए
गए
इस
अनुवाद
से
पाठकों
और
विद्यार्थियों
को
लाभ
होगा.
किताब
के
अंत
में
दिए
गए
प्रश्नोत्तर
से
भी
प्रतियोगी
परीक्षाओं
को
खास
तौर
से
मदद
मिल
सकती
है.
मेघदूत
प्रश्नोत्तरी
मेघदूत
प्रश्नोत्तरी
ही
इस
पुस्तक
का
निचोड़
है.
मेघदूत
को
समझने
के
साथ-साथ
विद्यार्थी
इस
पुस्तक
से
जुड़े
प्रश्न
और
उत्तर
भी
यहां
पढ़
सकते
हैं.
क्योंकि
कालीदास
की
मेघदूत
ऐसी
रचना
है
जिससे
जुड़े
प्रश्न
12वीं
से
लेकर
बीए,
एमए
सहित
तमाम
प्रतियोगी
परीक्षाओं
में
अक्सर
पूुछे
जाते
हैं.
जैसे-
मेघदूत
किस
विधा
की
रचना
है,
मेघदूत
का
नायक
और
नायिक
कौन
हैं…आदि.
इसलिए
जिन
साहित्यप्रेमियों
ने
अभी
तक
कालीदास
की
इस
महान
कृति
को
नहीं
पढ़ा
है,
वे
पेंगुइन
से
प्रकाशित
इस
पुस्तक
के
माध्यम
से
मेघदूत
के
संदेशों
को
भली-भांति
समझ
सकते
हैं.
पुस्तकः
मेघदूत
रचनाकारः
महाकवि
कालीदास
भूमिकाः
महावीर
प्रसाद
द्विवेदी
प्रकाशकः
पेंगुइन
स्वदेश
मूल्यः
250
रुपये
Tags:
Hindi
Literature,
New
books
FIRST
PUBLISHED
:
July
16,
2024,
19:59
IST