नॉर्मल डिलीवरी के बजाय ऑपरेशन को क्यों चुन रही हैं महिलाएं?

नॉर्मल डिलीवरी के बजाय ऑपरेशन को क्यों चुन रही हैं महिलाएं?

जिंदगी
का
एक
अहम
मुकाम
होता
है
मदरहुड.
जब
कोई
मां
बनने
का
फैसला
करता
है,
वो
सिर्फ
अपनी
जिंदगी
का
फैसला
नहीं
करता,
बल्कि
उसके
साथ
दूसरी
जिंदगी
भी
जुड़ी
होती
है.
अपनी
संतान
को
इस
दुनिया
में
लाना,
उसके
लिए
इसी
दुनिया
में
स्पेस
क्रियेट
करना…ऐसी
तमाम
बातें
बच्चे
को
9
महीने
पेट
में
पालने
वाली
मां
के
ज़ेहन
में
चलती
रहती
है.
और
फिर
एक
वक्त
आता
है,
जब
आपको
फैसला
लेना
होता
है

बच्चे
का
जन्म
कैसे
हो.
नॉर्मल
डिलीवरी
से
या
फिर
सर्जिकल
हेल्प
से?

आज
के
इस
लेख
में
डिलिवरी
के
इन्हीं
पहलुओं
पर
एक
नजर
डालेंगे.
वैसे
नॉर्मल
डिलिवरी
मां
और
बच्चे
दोनों
के
लिए
बेहतर
मानी
जाती
है.
इसकी
पैरोकारी
बॉलीवुड
की
मशहूर
एक्ट्रेस
भी
करती
रही
है.
माधुरी
दीक्षित
से
लेकर
मिस
वर्ल्ड
ऐश्वर्या
राय,
रबीना
टंडन,
ट्विंकल
खन्ना
और
नई
पीढ़ी
में
मीरा
राजपूत
जैसी
सेलिब्रिटीज
ने
अपनी
प्रेग्नेंसी
एनाउंस
करने
के
बाद
नॉर्मल
डिलिवरी
को
चुना.
इस
पर
बात
की
लोगों
को
जागरूक
किया.
लेकिन
आज
रियलिटी
इससे
काफी
अलग
है.
पूरी
दुनिया
में
लोग
डिलीवरी
के
लिए
सर्जरी
का
सहारा
लेते
हैं
जिसे
मेडिकल
भाषा
में
सिजेरियन
यानी
सी
सेक्शन
कहते
हैं.

आईआईटी
मद्रास
की
एक
रिसर्च
के
मुताबिक
2016
से
2021
के
बीच
यानी
पांच
साल
में
22
फीसदी
की
बढ़ोतरी
हुई
है.
2016
से
पहले
यह
आंकड़ा
17
फीसदी
हुआ
करता
था.
इसमें
कोई
दो
राय
नहीं
है
कि
सी
सेक्शन
डिलीवरी
के
समय
मां
बच्चे
की
जिंदगी
बचाई
जा
सकती
है.
लेकिन
अब
इसका
बेजा
इस्तेमाल
काफी
चिंताजनक
तस्वीर
पेश
करती
है.
रिपोर्ट
के
ही
मुताबिक
इजाफा
तब
हुआ
है
जब
महिला
को
कोई
प्रेगनेंसी
कॉमप्लीकेशन
नहीं
थी.

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WHO
क्या
कहता
है?

यहां
पर
एक
बात
और
नोट
करना
भी
जरूरी
है
कि
भारत
में
सिजेरियन
डिलीवरी
का
धड़ल्ले
से
बढ़ना
इसलिए
भी
चिंताजनक
है
क्योंकि
विश्व
स्वास्थय
संगठन
के
निर्धारित
किए
दायरे
की
अनदेखी
हुई
है.
विश्व
स्वास्थ्य
संगठन
के
मुताबिक
सिजेरियन
डिलीवरी
की
स्टैंडर्ड
रेंज
10
से
15%
तक
रहनी
चाहिए.
लेकिन
भारत
में
ये
इससे
ज्यादा
है.
तेलंगाना,
तमिलनाडु,
आंध्र
प्रदेश,
जम्मू
और
कश्मीर
और
गोवा
में
सी-सेक्शन
का
रेट
सबसे
ज्यादा
है.
जिसमें
तेलंगाना
60.70%
के
साथ
लिस्ट
में
टॉप
पर
है.
दूसरी
ओर,
नागालैंड
में
मात्र
5.2%
की
दर
दर्ज
की
गई.

हालांकि
सिर्फ
भारत
नहीं
बल्कि
ब्रिटेन
और
अमेरिका
जैसे
देशों
में
सी
सेक्शन
का
रेट
40
फीसदी
तक
है.
इस
बढ़ोतरी
पर
एक
तरफ
डॉक्टर
यह
राय
देते
हैं
कि
खुद
गर्भवती
महिलाएं
नॉर्मल
डिलीवरी
के
डर
से
सी
सेक्शन
को
चुनती
हैं
तो
दूसरा
पहलू
ये
है
कि
मरीज
कौन
सा
ऑप्शन
चुनते
हैं
वो
काफी
हद
तक
डॉक्टरों
पर
ही
निर्भर
करता
है.
इस
लेख
में
इन्हीं
पहलुओं
को
तलाशने
की
कोशिश
करेंगे.

रिसर्च
की
मुख्य
बातें
क्या
है?

हाल
फिलहाल
में
जारी
की
गई
ये
स्टडी
आईआईटी
मदरास
के
डिपार्टमेंट
ऑफ
ह्ययूमैनिटीज
एंड
सोशल
सांइसेज
के
रिसर्चर्स
ने
मिलकर
की
है.
इन्होंने
नेशनल
फैमिली
हेल्थ
सर्वे
का
2015-2016
और
2019-2021
के
डेटा
को
एनालाइज
किया
है.
इस
स्टडी
में
यह
भी
पता
चला
कि
प्राइवेट
अस्पतालों
में
मेडिकल
की
जरूरतों
के
हिसाब
से
सी
सेक्शन
रेट
काफी
ज्यादा
है.
प्राइवेट
अस्पतालों
में
जितनी
भी
डिलीवरी
होती
है
उसमें
से
आधे
से
ज्यादा
सी
सेक्शन
से
होती
है.

पब्लिक
अस्पतालों
के
मुकाबले
प्राइवेट
अस्पतालों
में
ये
आंकड़ा
चार
गुना
हो
जाता
है.
ये
बढ़ता
ट्रेंड
छत्तीसगढ़
जैसे
राज्यों
में
और
पुख्ता
हो
जाती
है
जहां
के
प्राइवेट
अस्पतालों
में
सी
सेक्शन
का
रेट
10
गुना
ज्यादा
है.
वहीं
तमिलनाडु
में
ये
3
गुना
ज्यादा
है.
आईआईटी
मदरास
की
स्टडी
के
मुताबिक
जिन
महिलाओं
की
उम्र
35
से
49
साल
के
बीच
होती
है
उनमें
सी
सेक्शन
होने
की
संभावना
ज्यादा
रहती
है.
इसके
अलावा,
शहरी
क्षेत्रों
में
रहने
वाली
पढ़ी
लिखी
महिलाओं
में
भी
सी-सेक्शन
रेट
ज्यादा
था.

सी-सेक्शन
डिलीवरी
की
वजहें?


डॉक्टर
अक्ता
बजाज,
गायनेकोलॉजिस्ट,
उजाला
सिगनस
हॉस्पिटल,
21
साल
का
अनुभव

उजाला
सिग्नस
ग्रुप
ऑफ
हॉस्पिटल
में
गायनेकोलॉजिस्ट
अक्ता
बजाज
भारत
में
सिजेरियन
डिलीवरी
बढ़ने
की
तीन
वजहें
बताती
हैं.
पहला
कारण
है
कि
कई
महिलाएं
दर्द
सहन
नहीं
करना
चाहती.
पहली
प्रेगनेंसी
को
लेकर
वो
काफी
डरी
हुई
रहती
हैं.
वो
सेफ,
टाइम
पर
डिलीवरी
चाहती
है.
इसलिए
सीजेरियन
ही
की
सलाह
ही
एकमात्र
रास्ता
बचता
है.

दूसरी
वजह
ये
है
कि
आजकल
लोग
सिर्फ
एक
या
दो
बच्चे
चाहते
हैं
और
शादी
भी
देरी
से
करते
हैं.
कई
महिलाएं
30
के
बाद
मां
बन
रही
है
जिससे
कॉम्पलिकेशन
बढ़ने
का
खतरा
भी
रहता
है.
ऐसे
में
सिजेरियन
के
अलावा
कोई
विक्लप
नहीं
बचता.

तीसरी
वजह
है
महिलाओं
की
खराब
लाइफस्टाइल.
जिसमें
एक्सरसाइज
के
लिए
कोई
जगह
नहीं
हैं.
मसलन
प्रेगनेंसी
में
महिलाओं
का
वजन
15
से
20
किलो
तक
बढ़
जाता
है
जिससे
बच्चे
के
जन्म
के
दौरान
तकलीफ
होती
है.


डॉक्टर
विनीता
दिवाकर,
गायनेकोलॉजिस्ट
और
ऑबस्ट्रेशियन,
मणिपाल
हॉस्पिटल,
30
साल
का
अनुभव

डॉक्टर
विनीता
मानती
हैं
कि
सीजेरियन
डिलीवरी
एक
रूटीन
मोड
बनता
जा
रहा
है.
उसके
पीछे
वो
तीन
वजहे
गिनाती
हैं.
वो
कहती
हैं
कि
सीजेरियन
दो
तरीके
से
हो
रही
है.
एक
मरीज
तय
करता
है
और
एक
जब
डॉक्टर
तय
करता
है.
मरीज
के
रिक्वेस्ट
पर
डिलीवरी
में
बढ़ोतरी
हो
रही
है
क्योंकि
लोग
कंप्यूटर
की
तरह
हर
चीज
टाइम
पर
चाहते
हैं.
उन्होंने
कहा
कि
कई
बार
तो
लोग
चाहते
हैं
कि
बच्चा
किसी
खास
दिन
या
खास
मुहूर्त
में
पैदा
हो.
ऐसी
स्थिति
में
भी
डॉक्टर
को
सी-सेक्शन
का
रास्ता
ही
अपनाना
होता
है.

डॉक्टर
विनीता
कुछ
हद
तक
इसमें
दोष
आज
कल
के
डॉक्टर्स
और
खासकर
प्राइवेट
मेडिकल
कॉलेज
से
पढ़कर
आने
वालों
लोगों
का
भी
बताती
हैं
जिन्हें
पता
ही
नहीं
होता
कि
नॉर्मल
डिलीवरी
करते
कैसे
हैं.
विनीता
डिलीवरी
को
वहीं
एक
आर्ट
मानती
हैं.
ये
एक
ऐसा
बारीक
काम
है
जिसमें
थोड़ी
सी
ऊंच
नीच
भी
किसी
की
जान
को
खतरे
में
डाल
सकती
है.
इसलिए
यह
जरूरी
है
कि
इसे
अनुभवी
डॉक्टर
ही
करें
ना
कि
जुनियर
डॉक्टर
के
भरोसे
छोड़
दिया
जाए.
कोई
भी
गलती
इस
दौरान
होने
से
लोगों
के
जहन
में
एक
डर
बैठ
जाता
है
और
वो
नेचुरल
तरीके
से
डिलीवरी
नहीं
करवाना
चाहते
हैं.
अगर
जुनियर
डॉक्टर
से
करवाना
ही
है
तो
वो
किसी
सीनियर
डॉक्टर
के
सुपरविजन
में
ही
हों.

तीसरी
वजह
विनीता
साइंस
में
हो
रहे
विकास
को
भी
सिजेरियन
के
मामले
बढ़ने
की
वजह
बताती
है.
आज
तरह
तरह
की
मशीनों
से
हम
पहले
ही
पता
लगा
पाते
हैं
कि
बच्चे
को
गर्भ
के
अंदर
कोई
समस्या
है
या
नहीं.
गर्भ
के
अंदर
बच्चे
का
रहना
ठीक
है
या
उसके
लिए
बाहर
आने
कि
जरूरत
है.
जब
एक
टाइम
फिक्स
करना
पड़े
बच्चे
की
सेहत
के
हिसाब
से
तो
डॉक्टर
को
मजबूरन
सी
सेक्शन
की
सलाह
देनी
पड़ती
है.

कुछ
बाकी
कारणों
में
बेहतर
स्वास्थ्य
सुविधाओं
के
अभाव
के
साथ
ही
आम
लोगों
में
जागरूकता
की
कमी
भी
शामिल
है.
सरकारी
अस्पतालों
की
भीड़
भी
औरतों
को
प्राइवेट
अस्पतालों
की
तरफ
बढ़ने
पर
मजबूर
करता
है
जहां
सीजेरियन
के
मामले
काफी
ज्यादा
है.

डॉक्टर-अस्पतालों
पर
क्यों
लगता
है
आरोप?

सिजेरियन
डिलीवरी
की
वजह
महिला
को
रिकवर
होने
में
काफी
वक्त
लग
जाता
है.
ऐसे
में
ये
आरोप
लगता
है
कि
इसका
फायदा
डॉक्टर
और
प्राइवेट
अस्पतालों
को
ही
होता
है.
बहस
इस
बात
पर
भी
होती
है
कि
महिला
को
कैसी
डिलीवरी
करानी
चाहिए
इस
बात
का
फैसला
अकेले
डॉक्टर
ही
ले
लेता
है.
हालांकि
डॉक्टर
अक्ता
बजाज
और
विनीता
दोनों
ही
इससे
इत्तेफाक
नहीं
रखती
हैं.
वो
कहती
हैं
कि
कई
सालों
से
सीजेरियन
और
नॉर्मल
डिलीवरी
की
फीस
लगभग
एक
जैसी
कर
दी
गई
है
ताकि
लोगों
को
ये
महंगा

लगे.

अक्ता
बजाज
इसे
थोड़ा
और
विस्तार
देते
हुए
कहती
हैं
कि
नॉर्मल
डिलीवरी
को
लेकर
लोगों
के
बीच
एक
आम
धारणा
होती
है
कि
ये
सस्ता
होता
है
इसलिए
डॉक्टर
सीजेरियन
की
सलाह
देता
है.
ब्लकि
प्राइस
पैकज
तो
नॉर्मल
डिलीवरी
का
ज्यादा
होना
चाहिए
क्योंकि
ये
एक
जटिल
प्रक्रिया
है
जिसमें
ये
तय
नहीं
किया
जा
सकता
कि
डिलीवरी
कब
हो
पाएगी.
कभी
6
से
12
घंटे
का
वक्त
लग
सकता
है
तो
कभी
पूरा
एक
दिन
भी
लग
जाता
है.

सी-सेक्शन
की
सलाह
कब
दी
जाती
है

ऐसे
बहुत
सारे
फैक्टर्स
हैं
जिससे
तय
होता
है
कि
किस
तरह
की
डिलीवरी
होनी
चाहिए.
पहले
से
तय
की
गई
सी
सेक्शन
डिलीवरी
इन
हालातों
में
होती
है
जब
मां
की
उम्र
ज्यादा
हो,
मोटापा
हो
या
बच्चे
की
पोजिशन
सही

हो.
वहीं
इमरजेंसी
सी
सेक्शन
डिलीवरी
कई
सारे
मेडिकल
वजहों
से
होती
है.
फीटल
डिस्ट्रेस
यानी
भ्रूण
संकट
और
एमनियॉटिक
फ्लुइड
यानी
बच्चे
की
जरूरत
का
लिक्विड
जो
मां
के
शरीर
में
होता
है
उसमें
कमी
हो
जाती
है.

सी-सेक्शन
के
फायदे
और
नुकसान


फायदे

सिजेरियन
डिलीवरी
से
बच्चे
को
जन्म
देने
वाली
महिलाओं
में
पेशाब

रोक
पाने
और
पेल्विक
प्रोलेप्स
का
खतरा
कम
होता
है.
ज्यादातर
सिजेरियन
डिलीवरी
प्रेगनेंसी
के
39वें
हफ्ते
में
होती
है.
इसलिए
डॉक्टर
को
डिलीवरी
के
कुछ
समय
बाद
ही
पता
चल
जाता
है
कि
बच्चे
को
जन्मजात
हृदय
रोग
संबंधी
सर्जरी
तो
नहीं
करनी.
पहले
से
प्लान
की
हुई
सिजेरियन
डिलीवरी
में
जन्म
के
समय
लगने
वाली
चोटों
का
खतरा
कम
हो
जाता
है.
जैसे-
ऑक्सीजन
की
कमी
और
फ्रैक्चर
की
कमी
वगैरह.
सिजेरियन
डिलीवरी
में
पहले
से
समय
का
पता
होता
है
इसलिए
मां
बच्चे
के
जन्म
से
जुड़ी
तैयारियों
को
पहले
से
पूरा
कर
लेती
है.

नुकसान

सी
सेक्शन
डिलीवरी
से
लंबे
समय
तक
चलने
वाले
गंभीर
नतीजे
हो
सकते
हैं.
जिनमें
इंफेक्शन,
खून
का
ज्यादा
बह
जाना,
अंगो
में
चोट

जाना
जैसी
चीजें
भी
हो
सकती
है.
कभी
कभी
एक
और
सी
सेक्शन
करने
की
भी
जरूरत
पड़
जाती
है.
इसके
साथ
ही
अस्पताल
में
ज्यादा
दिनों
के
लिए
रुकना
पड़
सकता
है
और
रिकवरी
टाइम
भी
बढ़
जाता
है.

लैंसेट
में
छपी
एक
रिसर्च
में
पाया
गया
है
कि
जो
महिलाएं
सी
सेक्शन
से
गुजरती
हैं
उनमें
गर्भाशय
का
टूटना,
खून
का
ज्यादा
बह
जाना,
अंगो
में
चोट

जाना
जैसी
चीजें
भी
हो
सकती
है.
हर
ऐक
सी
सेक्शन
के
साथ
ये
जोखिम
बढ़ता
जाता
है.
इस
तरह
से
जन्म
लेने
वाले
शिशुओं
को
योनि
से
जन्म
लेने
वाले
शिशुओं
की
तुलना
में
अलग-अलग
हार्मोनल,
शारीरिक
और
माइक्रोबियल
वातावरण
का
सामना
करना
पड़ता
है,
जिससे
एलर्जी,
अस्थमा
जैसी
होने
वाली
बीमीरी
के
प्रति
उनकी
संवेदनशीलता
बढ़
जाती
है.

नॉर्मल
डिलीवरी
के
फायदे
और
नुकसान

फायदे

सबसे
बड़ा
फायदा
तो
यही
है
कि
महिलाएं
डिलीवरी
के
बाद
जल्द
ही
रिकवर
कर
जाती
हैं.
बच्चे
के
जन्म
के
कुछ
घंटे
बाद
ही
वे
अपने
पैरों
पर
चल
फिर
सकती
हैं
और
उन्हें
किसी
की
हेल्प
की
जरूरत
नहीं
पड़ती.
महिलाएं
लंबे
समय
तक
होने
वाले
दर्द
से
बच
जाती
हैं
क्योंकि
इस
तरह
की
डिलीवरी
के
समय
छोटा
सा
ही
कट
लगता
है.
इंफेक्शन
का
रिस्क
भी
कम
रहता
है.

नुकसान

नॉर्मल
डिलीवरी
के
बाद
कई
महिलाओं
को
ये
शिकायत
रहती
है
कि
उनके
पेल्विक
हिस्से
की
मांसपेशियां
कमजोर
हो
गई
हैं.
इसी
डर
की
वजह
से
महिलाएं
सी
सेक्शन
का
विक्लप
चुनती
हैं.
मांसपेशियों
में
कमजोरी
बढ़ने
की
वजह
से
महिलाओं
के
लिए
पेशाब
को
रोक
पाना
और
ज्यादा
मुश्किल
हो
जाता
है.
नॉर्मल
डिलीवरी
की
वजह
से
कई
बार
बच्चे
पर
भी
असर
पड़ता
है.
सेरिबर्ल
पाल्सी
जैसी
बीमारियों
के
होने
को
जोखिम
बढ़
जाता
है.

प्रेगनेंसी
प्लान
करने
से
पहले
क्या
करना
चाहिए

भारत
के
शहरी
इलाकों
में
और
मिडिल
क्लास
लोगों
में
सिजेरियन
डिलीवरी
जरूरत
से
ज्यादा
हो
रही
है.
भारत
में
गैर
जरूरी
सिजेरियन
डिलीवरी
को
रोकने
के
लिए
महिलाओं
और
हेल्थ
केयर
प्रोफेशनलों
को
टारगेट
करते
हुए
पॉलिसी
बनाए
जाने
की
जरूरत
है.
साथ
ही
डॉक्टर
विनीता
दिवाकर
कहती
हैं
कि
जमीन
पहले
से
अच्छी
हो
और
फिर
बीज
लगाया
जाए
तभी
पौधा
अच्छा
होगा.
इसलिए
जरूरत
है
कि
कपल
प्रेगनेंसी
सही
समय
पर
प्लान
करें
और
प्लानिंग
से
पहले
डॉक्टर
से
जरूर
मिलें.
दुसरी
तरफ
8वें
और
9वें
महीने
में
डॉक्टर
की
खासी
जिम्मेदारी
बनती
है
कि
वो
गर्भवती
महिला
की
समय
समय
पर
काउंसिलिंग
करें
ताकि
उसके
डिलीवरी
को
लेकर
मन
में
बैठे
सारे
डर
और
संशय
दूर
हो
सकें.

सरकार
इस
पर
कैसे
अंकुश
लगा
रही
है?

केंद्र
सरकार
ने
अपनी
ओर
से
कई
उपाय
किए
हैं.
राज्य
और
केंद्र
शासित
प्रदेश
के
स्वास्थ्य
अधिकारियों
और
भारत
में
ऑबस्टेट्रिक्ल
एंड
गायनेकोलॉजिस्ट
फेडेरेशन
को
सलाह
भेजी
गई
है,
जिसमें
उनसे
सी-सेक्शन
पर
डब्ल्यूएचओ
के
दिशानिर्देशों
का
पालन
करने
को
कहा
गया
है.
इसके
अलावा
ये
सुनिश्चित
करने
के
लिए
कि
सी
सेक्शन
न्यायसंगत
तरीके
से
किया
जाए
इसके
लिए
सार्वजनिक
अस्पतालों
में
लक्ष्य
नाम
की
सीएस
ऑडिट
पहल
शुरू
की
गई
है.
इसके
अतिरिक्त,
हेल्थ
मैनेजमेंट
इन्फॉर्मेशन
सिस्टम
की
मदद
से
सी-सेक्शन
दरों
के
लिए
सरकारी
और
प्राइवेट
अस्पतालों
की
निगरानी
की
जाती
है.