
क्लाइमेट
चेंज
दुनिया
भर
में
बदलते
मौसम
की
कहानी
हम
फूल
से
शुरू
करते
हैं.
ये
मौसम
है
भी
फूलों
का.
वसंत
का
मौसम
अभी
बीता
ही
है,
तापमान
बढ़ना
शुरू
हो
गया
है,
मगर
आप
अपने
आस
पास
पेड़ों
पर
नई-नई
पत्तियां
और
फूलों
की
सुंदरता
आबो
हवा
में
महसूस
कर
सकते
हैं.
फूल
होते
ही
हैं
इतने
आकर्षक.
प्रकृति
ने
इन्हें
हर
मौसम
के
लिए
अलग
अलग
रूप
में
आजाद
किया
है.
लेकिन
आज
की
कहानी
का
नायक
है
एक
खास
फूल-
हनामी
जो
जापान
में
पैदा
होता
है.
अंग्रेजी
में
इसे
चेरी
ब्लॉसम
कहते
हैं.
जापान
में
वसंत
की
शुरूआत
इसी
हनामी
फूल
से
होती
है.
गुलाबी
और
सफेद
रंगत
लिए
ये
फूल
10
दिनों
तक
खिला
रहता
है.
ये
जापान
का
ऐसा
आकर्षण
है,
जिसे
देखने
के
लिए
हर
साल
लाखों
सैलानी
यहां
आते
हैं.
लेकिन
जापान
में
इस
साल
ये
फूल
मौसम
वैज्ञानिकों
के
लिए
चिंता
का
विषय
बना
हुआ
है.
ब्रिटेन
की
एक
रिपोर्ट
बताती
है
कि
हनामी
फूल
अपने
तय
समय
से
एक
पखवाड़ा
पहले
खिलना
शुरु
हो
चुका
है.
मौसम
विशेषज्ञों
ने
इसकी
वजह
बताई
है,
क्लाइमेंट
चेंज,
जो
पूरी
दुनिया
के
सामने
चिंता
की
बड़ी
वजह
बना
हुआ
है.
कुछ
हालिया
घटनाक्रम
इस
बात
की
तस्दीक
करते
हैं.
पहली
घटना
है
तापमान
की
रिकार्डिंग-
तापमान
की
रिकॉर्डिंग
का
इतिहास
1850
से
शुरु
होता
है.
तब
से
लेकर
आज
तक
पिछले
साल,
यानी
2023
को
सबसे
गर्म
साल
के
रूप
में
दर्ज
किया
गया.
इससे
पहले
2016
सबसे
गर्म
साल
के
रूप
में
दर्ज
था.
इसी
साल
मार्च
सबसे
गर्म
रहने
वाला
लगातार
दसवां
महीना
बन
गया
है.
अब
दूसरी
घटना
को
समझिए.
कुछ
ही
हफ्तों
पहले
आईएमडी,
यानी
भारतीय
मौसम
विभाग
ने
आशंका
जताई
है
कि
अप्रैल
से
लेकर
जून
तक
देश
का
85
फीसदी
हिस्से
में
हीटवेव
यानू
लू
के
कई
फेज
देखने
को
मिलेंगे.
इस
दौरान
तापमान
सामान्य
से
5
डिग्री
या
इससे
भी
ज्यादा
रह
सकता
है.
लू
का
एक
दौर
लगातार
20
दिन
तक
चल
सकता
है.
सामान्य
तौर
पर
इन
महीनों
में
4
से
8
तक
दिन
लू
चलती
है.
मौसम
और
तापमान
में
ये
बदलाव
वैसे
ही
है,
जिसके
संकेत
दुनिया
भर
के
वैज्ञानिक
कई
देते
आ
रहे
थे.
दुनिया
भर
में
बदलते
मौसम
को
लेकर
ये
तो
सिर्फ
हालिया
घटनाएं
हैं,
इस
लेख
में
कुछ
और
रिपोर्टस
पर
एक
नजर
डालेंगे…
ये
भी
पढ़ें
जर्मन
वॉच
की
रिपोर्ट
क्या
कहती
है
जर्मनवॉच
बॉन
स्थित
एक
गैर-सरकारी
संगठन
है
जो
हर
साल
59
देशों
और
यूरोपीय
संघ
को
जलवायु
कार्यों
पर
उनके
प्रदर्शन
के
आधार
पर
रैंक
करता
है.
इस
रैंकिग
का
नाम
है
क्लाइमेट
चेंज
परफॉर्मेंस
इंडेक्स.
इंडेक्स
2021
में
ये
जानकारी
सामने
आई
थी
कि
भारत
दुनिया
का
7वां
सबसे
जलवायु
प्रभावित
देश
है.
इंडेक्स
के
मुताबिक
2019
में
जलवायु
से
जुड़ी
आपदाओं
के
चलते
भारत
में
2,267
लोगों
की
जान
गई
थी.
वहीं
करीब
501,659
करोड़
रुपए
का
आर्थिक
नुकसान
हुआ
था.
अगर
इस
इंडेक्स
में
10
सबसे
ज्यादा
प्रभावित
देशों
को
देखें
तो
इनमें
सबसे
ज्यादा
नुकसान
भारत
को
ही
उठाना
पड़ा
था.
गौरतलब
है
कि
2022
में
जारी
क्लाइमेट
इंडेक्स
में
भारत
इस
लिस्ट
में
पांचवे
नंबर
पर
था.
फिर
2023
की
रिपोर्ट
जब
आई
तब
भारत
को
एक
स्थान
उपर
यानी
चौथा
सबसे
मजबूत
दर्जा
दिया
गया.
2022
की
तरह
डेनमार्क
का
प्रदर्शन
सर्वश्रेष्ठ
आंका
गया
और
उसने
चौथी
रैंक
अर्जित
की.
2023
में
भारत
से
बेहतर
प्रदर्शन
वाले
दूसरे
दो
देश
एस्टोनिया
और
फिलीपींस
थे.
NASA
की
रिपोर्ट..2050
बाढ़
की
तीव्रता
बढ़ेगी
हाल
ही
में
नासा
ने
2020
को
भी
दुनिया
के
सबसे
गर्म
साल
के
रूप
में
मान्यता
दी
थी.
यह
स्पष्ट
रूप
से
दिखता
है
कि
हमारी
धरती
बहुत
तेजी
से
गर्म
हो
रही
है
जिसका
असर
जलवायु
पर
भी
पड़
रही
है.
नतीजन
बाढ़,
सूखा,
तूफान
जैसी
आपदाओं
का
आना
सामान्य
सी
बात
बन
गया
है.
अगर
प्राकृतिक
आपदाओं
से
हुए
नुकसान
को
देखें
तो
2020
में
इनके
चलते
15,36,412
करोड़
रुपए
का
नुकसान
हुआ
था
जबकि
2019
में
यह
नुकसान
करीब
12,14,498
करोड़
रुपए
का
था.
नासा
के
ही
आंकड़ों
से
पता
चलता
है
कि
1993
के
बाद
से
वैश्विक
औसत
समुद्र
स्तर
कुल
मिलाकर
लगभग
चार
इंच
बढ़
गया
है.
इस
इजाफे
का
मतलब
है
कि
2050
तक
वैश्विक
औसत
समुद्र
स्तर
20
सेंटीमीटर
और
बढ़ने
की
राह
पर
हैं.
अगर
ऐसा
ही
चलता
रहा
तो
बाढ़
के
आने
और
उसकी
तीव्रता
बेतहाशा
बढ़ेगी.
UN
की
एमिशन
गैप
रिपोर्ट..टार्गेट
से
कहीं
पीछे
देश
यूएन
की
तरफ
से
प्रकाशित
“एमिशन
गैप
रिपोर्ट
2020”
से
पता
चला
है
कि
अगर
तापमान
में
हो
रही
बढ़ोतरी
इसी
तरह
जारी
रहती
है
तो
सदी
के
अंत
तक
यह
वृद्धि
3.2
डिग्री
सेल्सियस
के
पार
चली
जाएगी.
जिस
तरह
और
जिस
रफ्तार
से
तापमान
में
यह
बढ़ोतरी
हो
रही
है,
उसके
चलते
बाढ़,
सूखा,
तूफान,
हीट
वेव,
शीत
लहर
जैसी
घटनाएं
बहुत
आम
बात
हो
जाएंगी
और
यह
हो
भी
रही
है.
वहीं
एमिशन
गैप
रिपोर्ट
के
मुताबिक
2015
में
जो
पैरिस
एग्रीमेंट
हुआ
था
उसमें
थोड़ा
सुधार
हुआ
है.
हालांकि
यूएन
ने
ये
भी
कहा
है
कि
ग्लोबल
वॉर्मिंग
को
अगर
1.5
डिग्री
पर
रोकना
है
तो
उसके
लिए
2030
तक
ग्रीनहाउस
गैसेस
का
एमिशन
में
42
फीसदी
की
कटौती
करना
पड़ेगी.
पर
ज्यादा
से
इसके
14
फीसदी
चांसेज
ही
है.
यूएन
का
ये
अनुमान
दिखाता
है
कि
सरकारों
का
तापमान
को
कम
करने
का
टार्गेट
दम
तोड़
चुका
है.
2021
से
2022
के
बीच
दुनियाभर
में
ग्लोबल
हाउस
गैस
एमिशन
1.2
से
57.4
तक
पहुंच
चुका
है.
जलवायु
परिवर्तन
को
सीमित
करने
के
लिए
देशों
की
ने
जो
प्रतिज्ञाएं
ली
उसके
बाद
अभी
भी
दुनिया
को
इस
सदी
में
लगभग
3
डिग्री
सेल्सियस
तक
गर्म
करने
की
राह
पर
ले
जाएंगी.
IPCC,
पानी
के
लिए
तरसेंगे
50
फीसदी
लोग
आईपीसीसी
संयुक्त
राष्ट्र
की
एक
संस्था
है
जो
जलवायु
संकट
के
मुद्दे
पर
काम
कर
रही
है.
इससे
जुड़े
वैज्ञानिक
तेजी
से
हो
रहे
जलवायु
परिवर्तन
के
मौजूदा
प्रभाव
और
इसकी
वजह
से
भविष्य
में
आने
वाले
खतरों
की
समीक्षा
करते
हैं.
साथ
ही,
इससे
होने
वाले
नुकसान
को
कम
करने
और
दुनिया
के
तापमान
को
स्थिर
रखने
के
विकल्पों
के
बारे
में
बताते
हैं.
एक
रिपोर्ट
आईपीसीसी
की
2014
में
प्रकाशित
की
गई
थी
जो
इस
संगठन
की
पांचवी
रिपोर्ट
थी.
इस
रिपोर्ट
के
आधार
पर
ही
जलवायु
परिवर्तन
पर
2015
के
पेरिस
समझौते
में
यह
तय
किया
गया
कि
इस
सदी
के
अंत
तक
ग्लोबल
वार्मिंग
को
1.5
डिग्री
सेल्सियस
पर
बनाए
रखना
है.
2021
और
2022
के
बीच,
आईपीसीसी
ने
तीन
भागों
में
अपनी
छठी
अस्स्मेंट
रिपोर्ट
जारी
की,
जिसमें
जलवायु
परिवर्तन
की
शुरुआत
को
धीमा
करने
के
लिए
तत्काल
कार्रवाई
का
आह्वान
किया
गया.
इसकी
रिपोर्ट
की
मुताबक
पिछले
पचास
सालों
में
इतना
कार्बन
एमिशन
हुआ
है
कि
साल
1750
के
मुकाबले
धरती
का
तापमान
1.1
डिग्री
सेल्सियस
बढ़
गया
है.
इसकी
वजह
से
ग्लेशियर
पिघल
रहे
हैं
और
कुछ
इलाकों
में
बारिश
इतनी
बढ़
गई
है
कि
बाढ़
आ
जाती
है.
दूसरी
बात
ये
सामने
आई
है
कि
साल
2100
तक
3
डिग्री
सेलसियस
बढ़
सकता
है.
अगर
ये
हो
गया
तो
दुनिया
की
50
फीसदी
आबादी
को
पानी
नहीं
मिलेगा.
14
%
लोगों
को
भयानक
लू
का
सामना
करना
पड़ेगा.
सारे
द्वीप
डूब
जाएंगे.
और
जानवरों
और
पेड़
पौधों
की
कई
प्रजातियां
नष्ट
हो
जाएंगी.
रिपोर्ट
यह
भी
बताती
है
कि
कैसे
शहरीकरण
ने
जलवायु
को
प्रभावित
किया
है
और
बाढ़
की
घटनाओं
में
बढ़ोतरी
हुई
है.
ऑक्सफैम,
उत्सर्जन
में
भी
असंतुलन
अंतरराष्ट्रीय
चैरिटी
संस्था
ऑक्सफ़ैम
की
एक
रिपोर्ट
के
मुताबिक
दुनिया
के
एक
फीसदी
सबसे
अमीर
लोग
उतना
ही
कार्बन
उत्सर्जित
करते
हैं
जितना
कि
सबसे
गरीब
5
अरब
लोग,
जो
वैश्विक
आबादी
का
66
प्रतिशत
हैं,
करते
हैं.
रिपोर्ट
का
नाम
है
क्लाइमेट
इक्वेलिटी:
ए
प्लैनेट
फॉर
द
99%
है.
विश्लेषण
से
पता
चलता
है
कि
निचले
99
प्रतिशत
लोगों
में
से
किसी
को
भी
उतना
कार्बन
एमिट
करने
में
लगभाग
1500
साल
लगेंगे
जितना
सबसे
अमीर
अरबपति
एक
साल
में
करता
है.
ऑक्सफैम
की
एक
और
रिपोर्ट
कहती
है
कि
मौसम
संबंधी
आपदाओं
के
चलते
बीते
10
दशकों
में
2
करोड़
से
अधिक
लोगों
को
हर
साल
विस्थापित
होना
पड़ता
है.
रिपोर्ट
कहती
है
कि
इस
तरह
की
आपदाएँ
बीते
30
सालों
में
तीन
गुनी
हो
चुकी
हैं.
संयुक्त
राष्ट्र
के
अनुमान
के
मुताबिक
साल
2000
से
सूखे,
बाढ़
और
जंगल
में
आग
लगने
के
कारण
12.3
लाख
लोगों
की
मौत
हुई
है
जबकि
4.2
अरब
लोग
प्रभावित
हुए
हैं.
2050..10
करोड़
बच्चे
पलायन
को
मजबूर
युनिसेफ
ने
अपनी
रिपोर्ट
में
कहा
गया
है
कि
2016
और
2021
के
बीच
कम
से
कम
43
मिलियन
बच्चे
विस्थापित
हुए
यानी
अपने
घर
छोड़ने
के
लिए
मजबूर
हुए.
रिपोर्ट
में
भविष्यवाणी
की
गई
है
कि
अगले
30
वर्षों
में
100
मिलियन
से
अधिक
बच्चे
पलायन
करने
के
लिए
मजबूर
होंगे
और
यूनिसेफ
जलवायु
परिवर्तन
से
प्रभावित
बच्चों
की
मदद
के
लिए
और
भी
बहुत
कुछ
करने
का
आह्वान
कर
रहा
है.
युनिसेफ
की
एक
और
रिपोर्ट
‘दि
क्लाइमेट
चेंज्ड
चाइल्ड’
के
मुताबिक
तीन
में
से
एक
बच्चा
या
दुनिया
भर
में
73.9
करोड़
लोग
पानी
की
भारी
कमी
वाले
क्षेत्रों
में
रहते
हैं,
जलवायु
परिवर्तन
की
वजह
से
स्थिति
के
और
भी
भयावह
होने
का
खतरा
है.
जलवायु
परिवर्तन
के
परिणाम
बच्चों
के
लिए
विनाशकारी
हैं.
उनके
शरीर
और
दिमाग
पर
प्रदूषित
हवा
खराब
पोषण
और
अत्यधिक
गर्मी
का
बहुत
भारी
असर
होता
है.
COP28
मार्च
1995
में
यानी
30
साल
पहले
150
से
अधिक
देशों
ने
धरती
को
तपा
रहे
प्रदूषण
में
खतरनाक
बढ़ोतरी
को
सीमित
करने
के
लिए
एक
संयुक्त
राष्ट्र
संधि
पर
हस्ताक्षर
किए
थे.
इसके
तहत
पहला
कॉन्फ्रेंस
1995
में
बर्लिन,
जर्मनी
में
हुआ
था.
इस
कॉन्फ्रेंस
ऑफ
पार्टीज
यानी
COP
में
संधि
पर
हस्ताक्षर
करने
वाले
सदस्य
देशों
ने
हिस्सा
लिया
था.
तब
से
लगभग
हर
साल
जलवायु
परिवर्तन
पर
सम्मेलन
हो
रहा
है.
इस
सम्मेलन
में
कई
देश
इसी
मकसद
से
जुड़ते
हैं
कि
जलवायु
परिवर्तन
को
कैसे
सीमित
किया
जाए
और
इसके
लिए
किस
स्तर
पर
तैयारी
की
जरूरत
है.
तो
2023
के
नवंबर
महीने
में
दुबई
में
जलवायु
परिवर्तन
को
ध्यान
में
रखकर
आयोजित
की
गई
थी.
समिट
में
शामिल
कई
देश
ऐतिहासिक
समझौते
पर
पहुंचे
कि
जिसके
तहत
ईंधन
के
लिए
कोयले,
तेल
और
गैस
के
इस्तेमाल
को
धीरे-धीरे
खत्म
किया
जाएगा.