नेशनल कॉन्फ्रेंस की शर्तों पर हुई जम्मू-कश्मीर में डील! जानिए कांग्रेस को कितना फायदा कितना नुकसान

नेशनल कॉन्फ्रेंस की शर्तों पर हुई जम्मू-कश्मीर में डील! जानिए कांग्रेस को कितना फायदा कितना नुकसान
नेशनल कॉन्फ्रेंस की शर्तों पर हुई लद्दाख और J&K की सीटों पर डील! जानिए कांग्रेस को कितना फायदा कितना नुकसान


कांग्रेस
नेता
पवन
खेड़ा
और
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
नेता
उमर
अब्दुल्ला.

तमाम
अटकलों
के
बीच
लद्दाख
और
जम्मू-कश्मीर
की
लोकसभा
सीटों
पर
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
और
कांग्रेस
के
बीच
डील
डन
हो
गई
है.
इसमें
ये
तय
हुआ
है
कि
कश्मीर
संभाग
की
तीनों
लोकसभा
सीटों
(अनंतनाग,
बारामुला
और
श्रीनगर)
पर
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
लड़ेगी.
जबकि
जम्मू
संभाग
की
दो
सीटों
(जम्मू
और
उधमपुर)
के
साथ
ही
लद्दाख
लोकसभा
सीट
पर
कांग्रेस
चुनाव
लड़ेगी.

इस
डील
पर
एक
नजर
डालें
तो
ये
बात
साफ
है
कि
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
ने
अपनी
शर्तें
मनवाई
हैं.
पार्टी
ने
अपनी
उन
सीटों
पर
समझौता
नहीं
किया
है,
जिन
पर
उसके
सांसद
हैं.
कांग्रेस
को
वही
सीटें
दी
हैं,
जहां
बीजेपी
का
कब्जा
है.
जम्मू
लोकसभा
सीट
जहां
से
जुगल
किशोर
शर्मा
और
उधमपुर
लोकसभा
सीट
से
जितेंद्र
सिंह
सांसद
हैं.
वहीं,
लद्दाख
लोकसभा
चुनाव
से
बीजेपी
के
ही
जामयांग
सेरिंग
सांसद
हैं.

बीते
सालों
में
जम्मू
संभाग
की
दोनों
सीटों
पर
सियासी
रसूख
रखने
वाले
कई
बड़े
नेता
कांग्रेस
को
झटका
दे
चुके
हैं.
इसमें
सबसे
बड़ा
नाम
पूर्व
मुख्यमंत्री
गुलाम
नबी
आजाद
का
है.
कभी
पार्टी
के
सिपहसालार
रहे
आजाद
ने
जब
पार्टी
छोड़ी
तो
कांग्रेस
को
हर
मौके
पर
घेरा.
आजाद
के
सियासी
रसूख
से
कांग्रेस
भी
भलीभांति
परिचित
है.

ये
भी
पढ़ें

इतना
ही
अब
कांग्रेस
की
सहयोगी
पार्टी
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
के
जम्मू
संभाग
के
कई
बड़े
नेता
भाजपाई
हो
चुके
हैं.
इसमें
उमर
अब्दुल्ला
के
राजनीतिक
सलाहकार
रहे
देवेंद्र
सिंह
राणा
का
नाम
प्रमुख
है.
राणा
ने
2021
में
बीजेपी
का
दामन
थाना
था.
इस
तरह
कांग्रेस
को
दोहरी
चुनौती
का
सामना
करना
पड़
सकता
है.

एक
ओर
गुलाम
नबी
आजाद
जम्मू
संभाग
में
अपने
प्रभाव
वाले
क्षेत्रों
में
कांग्रेस
को
नुकसान
पहुंचा
सकते
हैं
तो
वहीं
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
के
आहत
महबूबा
मुफ्ती
भी
कोई
कसर
नहीं
छोड़ने
वाली
हैं.
बीते
दिनों
उन्होंने
कहा
भी
था
कि
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
ने
हमारे
लिए
उम्मीदवार
खड़ा
करने
और
चुनाव
लड़ने
के
अलावा
कोई
विकल्प
नहीं
छोड़ा
है.

उन्होंने
कहा,
जब
इंडिया
ब्लॉक
की
बैठक
मुंबई
में
हुई
तो
मैंने
कहा
था
कि
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
के
अध्यक्ष
फारूक
अब्दुल्ला
हमारे
वरिष्ठ
नेता
हैं.
वो
सीट-बंटवारे
पर
निर्णय
लेंगे.
न्याय
करेंगे.
मुझे
उम्मीद
थी
कि
वो
पार्टी
हितों
को
एक
तरफ
रख
देंगे.
इसके
साथ
ही
महबूबा
ने
दो
टूक
कहा
कि
वो
उमर
के
फैसले
और
उनकी
पार्टी
के
रैवये
से
आहत
हैं.

इन
सबके
बीच
अनंतनाग
लोकसभा
सीट
पर
और
भी
ट्विस्ट
देखने
को
मिल
सकता
है.
यहां
से
गुलाम
नबी
आजाद,
महबूबा
मुफ्ती
और
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
प्रत्याशी
मियां
अल्ताफ
के
बीच
दिलचस्प
जंग
देखने
को
मिल
सकती
है.
महबूबा
को
भी
इसका
भान
है.
शायद
इसीलिए
उन्होंने
बीते
दिनों
बयान
भी
दिया
था,
जिसमें
आजाद
को
घेरा
था.

बात
करें
कांग्रेस
और
नेकां
के
गठबंधन
में
सीट
शेयरिंग
की
तो
कांग्रेस
के
खाते
में
गईं
तीनों
सीटों
पर
उसे
कड़ी
मेहनत
करनी
होगी.
बेगाने
हुए
पुरानी
साथी
टांग
खींचने
में
कोई
कसर
नहीं
छोड़ेंगे
तो
नेकां
से
आहत
महबूबा
की
आंखों
को
यह
गठबंधन
सुहाएगा
नहीं.


अनंतनाग

बीते
लोकसभा
चुनाव
में
अनंतनाग
लोकसभा
सीट
पर
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
के
हसनैन
मसूदी
ने
महबूबा
मुफ्ती
को
हराया
था.
महबूबा
को
करीब
30
हजार
वो
ही
मिले
थे.
इस
सीट
पर
महबूबा
2014
में
सांसद
बनीं
थीं.
हालांकि
जुलाई
2016
में
उन्होंने
इस्तीफा
दे
दिया
था.

अनंतनाग
लोकसभा
सीट
1967
में
अस्तित्व
में
आई
थी.
इस
सीट
पर
हुए
पहले
चुनाव
में
कांग्रेस
के
मोह्ममद
शफी
कुरैशी
जीते
थे.
वो
लगातार
तीन
बार
सांसद
रहे.
इसके
बाद
1980
से
लेकर
1989
तक
इस
सीट
पर
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
का
कब्जा
रहा.
इसके
बाद
1996
में
इस
सीट
से
जनता
दल
के
टिकट
पर
चुनाव
जीतकर
मोहम्मद
मकबूल
संसद
पहुंचे
थे.


बारामुला

2019
में
इस
सीट
पर
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
ने
जीत
दर्ज
की
थी.
पार्टी
ने
अकबर
लोन
को
टिकट
दिया
था.
उन्होंने
पीपुल्स
कॉन्फ्रेंस
के
उम्मीदवार
एजाज
अली
को
हराया
था.
कांग्रेस
प्रत्याशी
यहां
5वें
स्थान
पर
थे.
इस
सीट
पर
पहले
तीन
चुनावों
(1957,
1967
और
1971)
में
कांग्रेस
ने
जीत
दर्ज
की
थी.
इसके
बाद
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
ने
इस
सीट
पर

केवल
कब्जा
किया
बल्कि
इसे
अपना
गढ़
बनाया
और
लगातार
पांच
चुनाव
जीते.


श्रीनगर

केंद्र
शासित
प्रदेश
की
ये
सबसे
हॉट
सीट
मानी
जाती
है.
इस
सीट
से
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
नेता
फारूक
अब्दुल्ला
सांसद
हैं.
बीते
चुनाव
में
उन्होंने
पीडीपी
उम्मीदवार
सैयद
मोहसिन
को
बड़ें
अंतर
से
चुनाव
हराया
था.
इस
सीट
पर
बीजेपी
के
खालिद
जहांगीर
को
4,631
वोट
मिले
थे
और
वो
चौथे
स्थान
पर
रहे
थे.
यह
सीट
1967
में
अस्तित्व
में
आई
थी.पहला
चुनाव
नेशनल
कॉन्फ्रेंस
ही
जीती
थी.
बख्शी
गुलाम
मोहम्मद
ने
जीत
दर्ज
की
थी.


लद्दाख

यह
सीट
अनुसूचित
जनजाति
के
लिए
सुरक्षित
है.
इसमें
कारगिल
और
लेह
आते
हैं.
इस
संसदीय
क्षेत्र
में
चार
विधानसभा
सीटें
आती
हैं.
इसमें
कारगिल,
लेह,
नोबरा
और
जंस्कार
विधानसभा
है.
वहीं,
जम्मू
और
उधमपुर
लोकसभा
सीट
पर
बीजेपी
का
कब्जा
है.
इस
सीट
पर
बीजेपी
ने
अपने
दोनों
सांसद
को
दुबारा
मैदान
में
उतारा
है.