हेपेटाइटिस से कैसे मुक्त हुआ इजिप्ट और भारत में कैसे घातक हुई ये बीमारी?

हेपेटाइटिस से कैसे मुक्त हुआ इजिप्ट और भारत में कैसे घातक हुई ये बीमारी?

दुनिया
में
ऐसी
ना
जाने
कितनी
बीमारियां
हैं
जिसके
बारे
में
हम

के
बराबर
जानते
हैं.
पर
हजारों
करोड़ों
लोगों
को
इससे
अपने
जीवन
में
दो
चार
होना
पड़ता
है.
एक
ऐसी
ही
बीमारी
है
हेपेटाइटिस.
शायद
ये
नाम
आपने
बहुत
बार
सुना
भी
होगा.
अलग
अलग
नाम
से,
जैसे
हेपेटाइटिस
ए,
बी,
सी
वगैरह,
वगैरह.
पर
ये
होता
क्या
है
इसकी
जानकारी
बहुत
कम
लोगों
को
होगी.
हेपेटाइटिस
बीमारी
आज
भारत
के
लिए
चिंता
का
सबब
बनी
हुई
है.
चीन
के
बाद
भारत
दूसरा
ऐसा
देश
बन
गया
है
जहां
हेपेटाइटिस
से
संक्रमित
लोग
सबसे
पाए
जाते
हैं.
वर्ल्ड
हेल्थ
ऑर्गेनाइजेशन
की
नई
ग्लोबल
हेपेटाईटिस
रिपोर्ट
2024
ऐसा
कहती
है.

हेपिटाइटिस
का
सीधा
असर
आपके
लीवर
पर
पड़ता
है.
इसका
आसान
भाषा
में
मतलब
होता
है
लीवर
पर
आई
हुई
सूजन.
रिपोर्ट
की
माने
तो
भारत
में
3.5
करोड़
लोगों
को
ये
बीमारी
है,
जिसमें
2.9
करोड़
लोगों
को
हेपेटाइटिस
बी
है
तो
0.55
करोड़
लोग
ऐसे
हैं
जिन्हें
हेपेटाइटिस
सी
है.
2022
में
50
हजार
नए
हेपेटाइटिस
बी
और
1.4
लाख
हेपेटाइटिस
के
केसस
रिपोर्ट
किए
गए.
1.23
लाख
लोगों
की
इस
इंफेक्शन
से
मौत
हुई.
हर
घंटे
हेपेटाइटिस
बी
और
सी
संक्रमण
से
वैश्विक
स्तर
पर
145
लोग
मर
रहे
हैं.
वहीं
एक
देश
ऐसा
भी
जो
हेपेटाइटिस
सी
से
मुक्त
हो
चुका
है.
इस
देश
का
नाम
है-
इजिप्ट.
इस
लेख
में
जानेंगे
कि
कैसे
इजिप्ट
ने
ये
मुकाम
हासिल
किया,
बाकी
देश
क्या
सीख
सकते
हैं
और
भारत
के
सामने
किस
तरह
की
चुनौती
है?

कभी
हुआ
करती
थी
रहस्यमयी
बीमारी

1960
के
दशक
में
यह
लोगों
के
लिए
एक
बड़ी
चिंता
का
विषय
था.
दरअसल
होता
ये
था
कि
जो
लोग
दूसरों
से
रक्तदान
लेते
थे
उन्हें
एक
अज्ञात
और
रहस्यमयी
बीमारी
हो
जाती
थी
जिसके
वजह
से
उनके
लीवर
में
जलन
पैदा
हो
जाती
थी.
फिर
इसकी
खोज
शुरू
हो
गई
1989
में
इसके
जेनिटिक
चेन
के
बारे
में
पहचान
हुई.

ये
भी
पढ़ें

वायरल
हेपेटाइटिस
के
मुख्य
पांच
प्रकार
हैंः
हेपेटाइटिस
ए,
बी,
सी,
डी
और
ई.
लेकिन
हेपेटाइटिस
बी
और
सी
का
इंफेक्शन
96
फीसदी
मौतों
का
जिम्मेदार
होता
है.
हेपेटाइटिस
बी
और
सी
के
चलते
लिवर
का
कैंसर
भी
हो
सकता
है.
ये
ज्यादातर
दूषित
खून
या
दूषित
बॉडी
के
फ्लूइड
जैसे
थूक,
बलग़म
या
पेशाब
के
संपर्क
में
आने
से
होता
है.

सिर्फ
यही
नहीं
हेल्थ
केयर
वर्कर्स
जो
इन
दूषित
बॉडी
फ्लूइड
के
संपर्क
में
आते
हैं,
उनमें
भी
हेपेटाइटिस
बी,
सी
होने
की
संभावना
बढ़
जाती
है.
केंद्रीय
स्वास्थ्य
और
परिवार
कल्याण
मंत्रालय
के
हेपेटाइटिस
नेशनल
एक्शन
प्लान
के
मुताबिक
हेपेटाइटिस
बी
और
सी
असुरक्षित
इंजेक्शन,
संक्रमित
खून,
सेक्शुअल
ट्रांसमिशन
और
संक्रमित
मां
से
बच्चे
में
फैलता
है.

दुनियाभर
में
कितना
बुरा
हाल?

चीन
ने
2022
में
2.98
करोड़
हेपेटाइटिस
बी
के
मामले
दर्ज
किए,
जबकि
हेपेटाइटिस
सी
संक्रमण
की
संख्या
55
लाख
थी.
187
देशों
के
इस
नए
आंकड़ों
से
पता
चला
है
कि
वायरल
हेपेटाइटिस
से
होने
वाली
मौतों
की
अनुमानित
संख्या
2019
में
1.1
मिलियन
से
बढ़कर
2022
में
1.3
मिलियन
हो
गई.
इसमें
से
83
प्रतिशत
हेपेटाइटिस
बी
और
17
प्रतिशत
हेपेटाइटिस
सी
की
वजह
से
हुई.
दोनों
2022
में
सिर्फ
कोरोना
महामारी
से
हुई
मौतों
के
बाद
दूसरे
सबसे
बड़े
संक्रामक
हत्यारे
बने
रहे.
रिपोर्ट
के
अनुसार
दुनिया
भर
में
लगभग
30
करोड़
से
ज्यादा
लोग
हेपेटाइटिस
बी
और
सी
से
पीड़ित
हैं.

बांग्लादेश,
चीन,
इथियोपिया,
भारत,
इंडोनेशिया,
नाइजीरिया,
पाकिस्तान,
फिलीपींस,
रूसी
संघ
और
वियतनाम
सामूहिक
रूप
से
हेपेटाइटिस
बी
और
सी
के
वैश्विक
बोझ
का
लगभग
दो-तिहाई
हिस्सा
झेलते
हैं.
वैश्विक
स्तर
पर
इसका
सफाया
करने
के
लिए
कई
तरह
की
कोशिशें
की
जा
रही
है
बावजूद
इसके
मृत्यु
दर
बढ़
रही
है.

इजिप्ट
कैसे
बना
दुनिया
के
लिए
मिसाल?

9
अक्टूबर,
2023
को
पूरी
दुनिया
को
पता
चला
इजिप्ट
पहला
ऐसा
देश
बन
गया
है
जिसने
हेपेटाइटिस
सी
इंफेक्शन
से
खुद
को
मुक्त
कर
लिया
है.
डब्ल्यूएचओ
के
डायरेक्टर
जेनरल
टेड्रोस
घेबियस
ने
इजिप्ट
के
राष्ट्रपति
अब्देल
फतह
अल-सिसी
को
इस
दिन
स्वर्ण
स्तर
का
सर्टिफिकेट
देकर
ये
घोषणा
की
थी.
कभी
विश्व
स्तर
पर
सबसे
हेपेटाइटिस
सी
के
मामले
रिपोर्ट
करने
वाले
इजिप्ट
ने
डब्ल्यूएचओ
के
हर
मानक
को
पूरा
करते
हुए
ये
मील
का
पत्थर
हासिल
किया
है.
अगर
हम
इजिप्ट
की
सफलता
को
देखें,
तो
पाएंगे
कि
देश
भर
में
किसी
बीमारी
को
खत्म
करने
में
सबसे
महत्वपूर्ण
भूमिका
सरकार
की
इच्छाशक्ति
निभाती
है.

इजिप्ट
में
7
महीने
में
12
लाख
मरीज
हुए
ठीक

जब
राष्ट्रपति
अब्देल
फतह
अल-सिसी
और
इजिप्ट
की
सरकार
ने
अपने
देश
में
बढ़ते
हेपेटाइटिस
सी
के
बोझ
को
पहचाना
तो
उन्होंने
इसे
हल
करने
की
ठान
ली
थी.
सितंबर
2019
में
सरकार
ने
अपना
100
मिलियन
हेल्दी
लाइव्स
प्रोग्राम
लागू
किया.
सात
महीने
का
ये
प्रोग्रम
दुनिया
के
सबसे
बड़े
सार्वजनिक
स्वास्थ्य
जांच
अभियानों
में
से
एक
था.
इन
महीनों
में
इजिप्ट
ने
अपने
12
साल
से
अधिक
उम्र
की
आबादी
की
कुशलता
से
हेपेटाइटिस
सी
की
जांच
और
इलाज
करने
में
मदद
की.
प्रोग्राम
का
बस
एक
ही
मकसद
था,
लोगों
की
स्क्रीनिंग,
ट्रीटमेंट
और
फॉलो
अप.

इसके
लिए
जगह
जगह
पर
बैनर,
पोस्टर्स,
टीवी
पर
विज्ञापन
चलाए
गए,
लोगों
को
प्रोग्राम
में
भाग
लेने
के
लिए
प्रोतसाहित
किया
गया.
पूरे
कार्यक्रम
के
दौरान,
16
लाख
वयस्क
हेपेटाइटिस
सी
पॉजिटिव
पाए
गए.
14
लाख
ने
ये
माना
कि
बिना
किसी
लागत
के
सरकार
ने
इलाज
किया
और
हेपेटाइटिस
सी
संक्रमण
वाले
अनुमानित
12
लाख
इजिप्ट
के
नागरिक
ठीक
हो
गए.
मिस्र
अपने
ड्रग,
डायग्नॉस्टिक
में
आने
वाले
खर्चे
को
कम
करने
में
इतना
सफल
रहा
कि
वह
अपनी
पूरी
आबादी
के
लिए
फ्री
टेस्टिंग
और
ट्रीटमेंट
देने
में
सक्षम
हो
गया.

भारत
को
कितना
जोर
लगाना
होगा?

2022
में
भारत
में
डेढ़
लाख
लोगों
की
हेपेटाइटिस
की
वजह
से
मौत
हुई
थी.
लेकिन
रिपोर्ट
कहती
है
कि
हेपेटाइटिस
बी
के
कुल
केसेस
में
से
सिर्फ
2.4
फीसदी
को
डायगनॉसिस
मिला.
हेपेटाइटिस
सी
का
डायगनॉस्टिक
और
ट्रीटमेंट
कवरेज
भारत
में
तुलनात्मक
तौर
पर
बेहतर
है,
जिसमें
28
पर्सेंट
लोग
डायगनॉस
हुए
और
21
फीसदी
लोगों
को
इलाज
मिला.
रिपोर्ट
कहती
है
कि
भारत
को
हेपेटाइटिस
का
बोझ
कम
करने
के
लिए
इस
कवरेज
को
और
बढ़ाने
की
जरूरत
है.
वहीं
ये
भी
सुनिश्चित
करना
होगा
कि
सभी
नवजात
बच्चे
का
वैक्सीनेशन
हो.

भारत
का
वैक्सीनेशन
अभियान

क्रोनिक
हेपेटाइटिस
बी
संक्रमण
को
वैक्सीनेशन
से
रोका
जा
सकता
है.
रिपोर्ट
के
मुताबिक
भारत
में
इसकी
वजह
से
40
से
50
फीसदी
मामलों
में
हेपैटोसेलुलर
कार्सिनोमा
यानी
एक
तरह
का
लिवर
कैंसर
होता
है
तो
20
से
30
प्रतिशत
मामले
सिरोसिस
के
आते
हैं.
भारत
में
हेपेटाइटिस
का
वैक्सीन
प्रोग्राम
2002-2003
के
बीच
में
एक
पायलट
प्रोजेक्ट
के
तौर
पर
शुरू
किया
गया
था
और
फिर
2010
में
देशभर
में
बच्चों
को
इंफेक्शन
से
बचाने
के
लिए
इस
बड़ा
रूप
दिया
गया.

हेपेटाइटिस
बी
वैक्सीन
को
बर्थ
डोज
के
अलावा
6,
10
और
14
सप्ताह
में
पेंटावेलेंट
वैक्सीन
के
रूप
में
भी
लगाया
जाता
है.
पेंटावेलेंट
वैक्सीन
बच्चों
को
डिप्थीरिया,
काली
खांसी,
टेटनस,
हेपेटाइटिस
बी
और
हिब
जैसी
पांच
जानलेवा
बीमारियों
से
बचाने
के
लिए
लगाई
जाती
है.
हालाँकि,
भारत
के
2020
के
एक
अध्ययन
में
कहा
गया
है
कि
देश
में
तीसरी
खुराक
हेपेटाइटिस
बी
वैक्सीन
का
कवरेज
तो
86
प्रतिशत
तक
पहुंच
गया
है,
लेकिन
संस्थागत
प्रसव
की
उच्च
दर
के
बावजूद
2015
में
जन्म-खुराक
कवरेज
केवल
45
प्रतिशत
था.

कब
तक
जड़
से
मिटा
पाएंगे
देश?

हेपेटाइटिस
सी
से
2030
तक
सिर्फ
11
ही
देश
मुक्त
हो
पाएंगे.
वहीं
5
देशों
पर
इसका
बोझ
सबसे
ज्यादा
है
जिसकी
वजह
से
2050
से
पहले
तो
मुक्त
नहीं
हो
पाएंगे.
ऑस्ट्रेलिया,
कैनेडा,
डेनमार्क,
इजिप्ट,
फिनलैंड,
फ्रांस,
जॉर्जिया,
जापान,
नॉर्वे,
स्पेन
और
युनाइटेड
किंगडम
वो
देश
हैं
जो
2030
का
टार्गेट
हासिल
करने
की
राह
पर
है.
जो
2050
से
पहले
नहीं
कर
पाएंगे
उनमें
चीन,
भारत,
पाकिस्तान,
ब्राजील
और
अमेरिका
जैसे
देशों
का
नाम
शामिल
है.

पहले
इन
मानकों
पर
खरे
उतरने
की
है
चुनौती!

हेपेटाइटिस
को
जड़
से
खत्म
करने
के
लिए
वर्ल्ड
हेल्थ
ऑर्गेनाइजेशन
के
तय
किए
गए
मानकों
पर
खरे
उतरने
की
जरूरत
होगी.

*हेपेटाइटिस
के
मामले
को
80
फीसदी
कम
करना
होगा
या
हर
एक
लाख
लोगों

5
ही
केस
आने
चाहिए.

*हेपेटाइटिससी
से
होने
वाली
मृत्यु
में
65
फीसदी
की
कमी
करनी
होगी
या
इसे
ऐसे
कह
सकते
हैं
कि
हर
एक
लाख
में
से
सिर्फ
दो
लोगों
की
मौत.

*हेपेटाइटिस
सी
से
पीड़ित
90
फीसदी
लोगों
का
डायगनॉसिस
हो

*आखिर
में
जिन
मरीजों
को
डायगनॉसिस
मिल
रहा
हो
उसमें
से
80
फीसदी
लोगों
को
कारगर
इलाज
मिले,
इसे
सुनिश्चित
करना.

हेपेटाइटिस
बी

ये
तो
हेपेटाइटिस
सी
की
बात
हुई
पर
हेपेटाइटिस
बी
का
खात्मा
करने
को
लेकर
कोई
भी
देश
सही
दिशा
में
नहीं
बढ़
रहे
हैं.
हालात
ऐसे
हैं
कि
2050
तक
तो
इसका
खात्मा
मुमकिन
ही
नहीं
लगता.
हालांकि
एक
राहत
की
बात
है
कि
2030
तक
80
देश
5
साल
से
नीचे
उम्र
के
बच्चे
में
होने
वाले
हेपेटाइटिस
बी
को
रोक
पाएंगे.
इसका
काफी
हद
तक
श्रेय
हेपेटाइटिस
बी
बर्थ
डोज
वैक्सीनेशन
को
जाता
है.
पर
ये
भी
एक
फैक्ट
है
कि
2030
तक
बच्चों
में
हेपिटाइटिस
को
रोकने
का
टार्गेट
सिर्फ
उच्च
आय
वाले
देश
और
मध्यम
आय
देश
ही
पूरा
कर
पाएंगे.

इन
तीन
फैक्टर
पर
फोकस
जरूरी

कुल
जमा
बात
है
कि
अगर
बाकी
देशों
को
भी
इजिप्ट
जैसी
मिसाल
कायम
करनी
है
तो
सबसे
पहली
जरूरत
है
वैज्ञानिक
साधनों
और
बायोमेडिकल
उपकरणों
का
होना
ताकि
संक्रमितों
और
जोखिम
वाले
लोगों
का
पता
लगाने
और
उनका
इलाज
करने
में
सफलता
मिले.
दूसरा
ये
भी
सुनिश्चित
करना
होगा
कि
ये
सभी
उपकरण
बिना
किसी
अरचण
के
चलते
रहें.
तीसरा
एक
ऐसी
स्वास्थ्य
प्रणाली
का
निर्माण
करना
है
जो
संक्रमित
आबादी
को
पहचानने,
इलाज
देने
में
सक्षम
हो.
आखिर
में
दवाओं
की
लागत
सरकार
और
नागरिकों
दोनों
के
लिए
सस्ती
होनी
चाहिए.