भारत से पंगा लिया तो घुटनों पर आया मालदीव, कच्चातिवु पर अब क्या श्रीलंका भी वही कर रहा?

भारत से पंगा लिया तो घुटनों पर आया मालदीव, कच्चातिवु पर अब क्या श्रीलंका भी वही कर रहा?
भारत से पंगा लिया तो घुटनों पर आया मालदीव, कच्चातिवु पर अब क्या श्रीलंका भी वही कर रहा?


श्रीलंकाई
सरकार
का
कहना
है
कि
कच्चातिवू
उसके
नियंत्रण
रेखा
के
भीतर
आता
है.

पड़ोसी
से
बैर
नहीं
करना
चाहिए,
वह
भी
उस
पड़ोसी
से
जो
हर
तरह
आपसे
इक्कीस
हो,
लेकिन
मालदीव
के
नये
राष्ट्रपति
ने
भारत
से
बैर
किया
और
दूर
देश
स्थित
चीन
से
दोस्ती.
नतीजा
यह
हुआ
कि
जल्द
ही
मालदीव
जमीन
पर

गया.
रोटी
और
पानी
के
लाले
पड़
गए,
अंत
में
भारत
ही
काम
आया.
भारत
ने
मालदीव
पर
आलू,
प्याज,
अंडे,
गेहूं
के
आटे,
दालों
और
चीनी
पर
लगा
प्रतिबंध
उठा
लिया.
इन
वस्तुओं
का
निर्यात
जारी
रखने
को
मंजूरी
दे
दी.
विदेश
व्यापार
महानिदेशालय
(DGFT)
ने
अपनी
अधिसूचना
में
कहा
है
कि
2024-2025
के
लिए
दोनों
देशों
का
व्यापार
यथावत
चलेगा.
इन
वस्तुओं
की
आपूर्ति
से
मालदीव
को
बड़ी
राहत
मिली
है.
वहां
के
विदेश
मंत्री
मूसा
जमीर
ने
भारत
के
इस
कदम
के
लिए
शुक्रिया
बोला
है.
भारत
पहले
भी
मालदीव
के
बुनियादी
ढांचे
के
विकास
के
लिए
मदद
करता
रहा
है.
किंतु
वहां
पर
राष्ट्रपति
मोहम्मद
मुइज्जु
के
सत्ता
में
आने
के
बाद
से
दोनों
मुल्कों
के
बीच
रिश्ते
बिगड़ने
लगे
थे.

अभी
पिछले
दिनों
भारत
के
एक
और
पड़ोसी
देश
श्रीलंका
ने
कच्चातिवु
द्वीप
को
लेकर
भारत
के
विरोध
में
आंखें
तरेर
लीं.
बंगाल
की
खाड़ी
और
हिंद
महासागर
में
स्थित
285
एकड़
में
फैला
यह
द्वीप
श्रीलंका
और
भारत
के
लगभग
बीच
में
है.
मगर
जनशून्य
और
जल
विहीन
इस
द्वीप
को
प्रधानमंत्री
इंदिरा
गांधी
ने
1974
में
श्रीलंका
को
दे
दिया
था.
कच्चातिवु
में
एक
चर्च
जरूर
है,
जिसमें
पूजा-अर्चना
के
लिए
भारतीय
मछुआरे
भी
जाते
रहे
हैं.
किंतु
अब
श्रीलंका
इस
द्वीप
के
लिए
सख्त
हो
गया
है.
वह
यहां
भारतीय
मछुआरों
को
नहीं
आने
देता.
अभी
31
मार्च
को
प्रधानमंत्री
नरेंद्र
मोदी
ने
अपने
सोशल
मीडिया
प्लेटफार्म
एक्स
पर
लिखा,
कि
कच्चातिवु
द्वीप
को
श्रीलंका
को
सौंपना
एक
गलत
कदम
था.
जब
इस
समझौते
पर
दस्तखत
हुए
तब
केंद्र
में
कांग्रेस
की
और
तमिलनाडु
में
द्रमुक
(DMK)
की
सरकार
थी.

तमिलनाडु
में
19
अप्रैल
को
है
वोटिंग

तमिलनाडु
में
19
अप्रैल
को
मतदान
है.
कांग्रेस
और
DMK
ने
मतदान
के
ठीक
पहले
यह
मुद्दा
उठाने
की
वजह
राजनीतिक
बताई
है.
तमिलनाडु
में
DMK
और
कांग्रेस
का
गठबंधन
है.
प्रधानमंत्री
ने
दोनों
को
एक
साथ
लपेटे
में
लिया
है.
उधर
श्रीलंका
इस
बात
से
भड़क
उठा
है.
श्रीलंका
ने
कहा
है,
वह
किसी
भी
सूरत
में
कच्चातिवु
वापस
करने
से
रहा.
लेकिन
तमिलनाडु
के
मछुआरे
चाहते
हैं,
उन्हें
इस
द्वीप
पर
बेरोकटोक
आवाजाही
की
अनुमति
दी
जाए
क्योंकि
वे
अपने
मछली
पकड़ने
के
जाल
यहां
सुखाते
रहे
हैं.
अब
इस
मुद्दे
के
राजनीतिकरण
हो
जाने
से
कांग्रेस
और
DMK
दोनों
बेचैन
हैं.
तमिलनाडु
के
मछुआरों
के
लिए
कच्चातिवु
पर
आना-जाना
लाभ
का
सौदा
है.
यदि
भाजपा
सरकार
इस
मुद्दे
का
हल
तलाश
लेती
है
तो
उनके
वारे-न्यारे
हो
जाएंगे.
ऐसे
में
तमिलनाडु
में
बीजेपी
को
लाभ
मिल
सकता
है.

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पढ़ें

अपनी
ही
बातों
में
उलझ
गए
एमके
स्टालिन

1974
और
1976
से
सुस्त
पड़े
हुए
इस
मुद्दे
पर
चिंगारी
सुलगाई
थी,
तमिलनाडु
के
मुख्यमंत्री
एमके
स्टालिन
ने.
अब
वे
खुद
इस
जाल
में
उलझ
गए
हैं.
उनका
पाला
जिन
नरेंद्र
मोदी
से
पड़ा
है,
वे
राजनीतिक
चातुर्य
में
बेजोड़
हैं.
स्टालिन
समझ
नहीं
पा
रहे
कि
इस
मुद्दे
पर
क्या
सफाई
दें.
कच्चातिवु
रामेश्वरम
से
25
किमी
उत्तर
पूर्व
में
पाक
जलडमरू
में
पड़ता
है.
श्रीलंका
के
डेफल्ट
द्वीप
से
24
किमी
दूर
है.
चूंकि
यह
बहुत
छोटा
द्वीप
है,
इसकी
चौड़ाई
मात्र
300
मीटर
है
और
लंबाई
डेढ़
किमी
है.
यह
द्वीप
अब
सामरिक
दृष्टि
से
बहुत
महत्त्वपूर्ण
है.
खासतौर
पर
तब
जब
चीन
हिंद
महासागर
में
अपने
पैर
पसार
रहा
है.
मालदीव
को
भारत
के
विरुद्ध
उकसाने
वाला
चीन
ही
था.
और
जब
वहां
संकट
आया
तब
वह
चुप
बैठा
है.
यहां
पहले
भारत
और
श्रीलंका
दोनों
देशों
के
मछुआरे
मछली
पकड़ने
आया
करते
थे.
लेकिन
1920
में
यहां
के
मालिकाना
हक
को
लेकर
विवाद
पैदा
हुआ.

कच्चातिवु
द्वीप
पर
मौजूद
है
सेंट
एंथोनी
चर्च

तब
भारत
और
श्रीलंका
दोनों
देश
में
ब्रिटेन
के
नियंत्रण
में
थे.
दोनों
ही
देशों
की
ब्रिटिश
सरकारों
ने
इस
द्वीप
पर
अपना-अपना
दावा
ठोका.
यह
विवाद
चलता
ही
रहा.
आजादी
के
बाद
भी
इस
द्वीप
की
स्थिति
उलझी
ही
रही.
शायद
इसलिए
भी
क्योंकि
एक
तो
यह
द्वीप
बहुत
छोटा
और
ऊपर
से
निर्जन
तथा
पीने
के
पानी
का
कोई
जुगाड़
नहीं.
यहां
पर
सेंट
एंथोनी
चर्च
जरूर
था,
जिसमें
दोनों
देशों
के
ईसाई
मछुआरे
पूजा
के
लिए
आया
करते
थे.
अंततः
1974
में
प्रधानमंत्री
इंदिरा
गांधी
ने
श्रीलंका
की
राष्ट्रपति
सिरिमाओ
भंडारनायके
के
साथ
मिल
कर
एक
समझौते
पर
दस्तखत
कर
दिए.
इस
संधिपत्र
के
अनुसार
इस
द्वीप
पर
श्रीलंका
का
अधिकार
हो
गया.
लेकिन
दोनों
देशों
के
मछुआरों
की
आवाजाही
बनी
रही.
खासकर
पूजा
के
अवसर
पर
और
भारतीय
मछुआरों
द्वारा
इस
द्वीप
पर
मछली
पकड़ने
का
जाल
सुखाने
की
अनुमति
मिली
रही.
इसके
लिए
वीजा
की
जरूरत
नहीं
थी.

पीएम
की
ट्वीट
के
बाद
असंतोष
उभर
कर
सामने
आया

इस
समझौते
से
दोनों
देशों
के
बीच
एक
स्पष्ट
तौर
पर
अंतरराष्ट्रीय
समुद्री
सीमा
रेखा
खिंच
गई.
मन्नार
की
खाड़ी
और
बंगाल
की
खाड़ी
तक
इस
सीमा
रेखा
को
फैलाने
के
लिए
1976
में
एक
समझौता
और
हुआ.
लेकिन
इस
सीमा
रेखा
(IMBL)
के
बाद
दोनों
देशों
के
विशेष
आर्थिक
क्षेत्र
(EEZ)
में
जाकर
मछली
पकड़ने
से
रोक
दिया
गया.
यह
रोक
भारतीय
मछुआरों
के
लिए
भारी
साबित
हुई.
लेकिन
तब

तो
DMK
ने

कांग्रेस
ने
इस
विरोध
को
समझा

कोई
आपत्ति
दर्शायी.
31
मार्च
को
प्रधानमंत्री
की
ओर
से
लिख
देने
से
यह
असंतोष
उभर
कर
सामने
आया
है.
उसी
दिन
शाम
को
तमिलनाडु
बीजेपी
के
अध्यक्ष
अन्नामलाई
ने
प्रेस
को
बताया
कि
उनकी
पार्टी
की
राज्य
इकाई
श्रीलंका
से
कच्चातिवु
को
वापस
लाने
के
लिए
प्रतिबद्ध
है.
उन्होंने
यह
भी
कहा,
कि
इस
द्वीप
पर
फिर
से
दावा
करना
ही
अंतिम
विकल्प
है.

विदेश
मंत्री
बोले-
श्रीलंका
सरकार
से
होगी
बात

अन्नामलाई
ने
यह
भी
कहा,
कि
1974
और
1976
में
तमिलनाडु
में
DMK
सरकार
थी
और
करुणानिधि
मुख्यमंत्री
थे.
उस
समय
के
विदेश
मंत्री
ने
तब
संसद
में
बयान
दिया
था
कि
तमिलनाडु
के
मुख्यमंत्री
के.
करुणानिधि
की
सहमति
से
ही
कच्चातिवु
श्रीलंका
को
सौंपा
गया
था.
लेकिन
आज
उनके
बेटे
और
मुख्यमंत्री
एमके
स्टालिन
कह
रहे
हैं
कि
कच्चातिवु
को
श्रीलंका
से
वापस
लिया
जाए.
अन्नामलाई
ने
कहा
कि
उनकी
पार्टी
बीजेपी
की
राज्य
इकाई
तमिलनाडु
के
मछुआरों
की
भलाई
के
लिए
कच्चातिवु
को
वापस
लाने
का
प्रयास
कर
रही
है.
उन्होंने
यह
भी
बताया
कि
इसके
लिए
उनकी
विदेश
मंत्री
एस
जयशंकर
से
बात
भी
हुई
है.
जयशंकर
ने
भी
कहा
है,
कि
भारत
सरकार
कच्चातिवु
मामले
में
श्रीलंका
सरकार
से
बात
करेगी.
मगर
जयशंकर
इस
मामले
को
सर्वोच्च
न्यायालय
के
अधीन
बताते
हुए
साफ
तौर
पर
कुछ
कहने
से
मुकर
गए.

समझौता
बदला
तो
नहीं
जा
सकता,
पर
समाधान
जरूर
निकल
सकता
है

हालांकि
दो
देशों
के
बीच
किसी
भी
क्षेत्र
को
लेकर
एक
समझौता
जब
हो
चुका
है,
तो
उसे
बदला
नहीं
जा
सकता.
संयुक्त
राष्ट्र
के
नियमों
के
तहत
ऐसा
करना
असंभव
है.
पर
यह
एक
समाधान
अवश्य
है,
कि
दोनों
देश
परस्पर
बातचीत
से
समझौते
से
इतर
दूसरा
समझौता
कर
सकते
हैं.
कुल
मिला
कर
यह
मामला
राजनीतिक
फायदे
के
लिए
उठाया
गया
है.
इसे
उठाने
के
चक्कर
में
स्टालिन
ने
अपने
हाथ
जला
लिए
हैं.
दूसरी
तरफ
मोदी
सरकार
ने
मालदीव
पर
लगे
निर्यात
प्रतिबंधों
को
उठा
कर
यह
संकेत
भी
दिया
है
कि
पड़ोसी
देशों
के
साथ
रिश्तों
में
कोई
कड़वाहट

आने
देने
के
लिए
सरकार
प्रतिबद्ध
है.
यह
एक
इशारा
भी
है
कि
पाकिस्तान,
नेपाल,
श्रीलंका,
मालदीव
जो
भी
देश
अपने
पड़ोसी
भारत
की
अनदेखी
कर
चीन
के
साथ
गया
उसकी
नियति
यही
होगी.