चुनावी किस्से: जब नेहरू को प्रचार करने के लिए भरना पड़ा किराया, बनी थी सरकारी कमेटी

चुनावी किस्से: जब नेहरू को प्रचार करने के लिए भरना पड़ा किराया, बनी थी सरकारी कमेटी

देश
में
जब
चुनावी
माहौल
बनता
है
तो
आचार
संहिता
लगती
है,
जो
नेताओं
पर
कई
तरह
की
पाबंदियां
भी
लगा
देती
है.
कोई
सांसद
या
मंत्री
किसी
भी
तरह
से
सरकारी
व्यवस्थाओं
का
लाभ
नहीं
ले
सकता
है,
क्योंकि
चुनावी
माहौल
में
वो
एक
प्रत्याशी
होता
है
और
कुछ
भी
नहीं.
लेकिन
सोचिए
कि
जब
देश
में
पहली
बार
चुनाव
हो
रहे
थे
और
सबसे
बड़े
नेता
जवाहर
लाल
नेहरू
थे,
तब
क्या
उन्होंने
सरकारी
प्लेन
का
प्रयोग
चुनाव
के
प्रचार
में
किया
था?
नेहरू
ने
आखिर
अपना
पहला
चुनाव
लड़ा
कैसे
था,
कैसे
एक
अकेले
नेहरू
अपनी
पार्टी
के
लिए
सबसे
बड़े
स्टार
प्रचारक
बन
गए
थे.

चुनाव
लड़ने
की
बारी
आई
तो
नेहरू
ने
ज़ाहिर
तौर
पर
अपने
घर
को
ही
चुना,
यानी
इलाहाबाद
को.
जवाहर
लाल
नेहरू
ने
अपना
पहला
लोकसभा
चुनाव
इलाहाबाद
ईस्ट
और
जौनपुर
वेस्ट
की
संयुक्त
सीट
से
लड़ा,
ये
सीट
बाद
में
फूलपूर
लोकसभा
सीट
बन
गई.
शुरुआत
के
तीन
लोकसभा
चुनाव
नेहरू
ने
इसी
सीट
से
जीते.
कमाल
की
बात
ये
है
कि
शुरुआत
के
दो
चुनाव
ऐसे
थे,
जिसमें
इन
सीट
से
एक
नहीं
बल्कि
दो
सांसद
चुने
जाते
थे.

खैर,
जवाहर
लाल
नेहरू
उस
वक्त
देश
के
सबसे
बड़े
नेता
थे
और
कांग्रेस
का
सबसे
बड़ा
चेहरा
भी.
ऐसे
में
उनका
जिम्मा
सिर्फ
अपनी
सीट
तक
सीमित
नहीं
था,
बल्कि
पूरे
देश
में
पार्टी
के
लिए
प्रचार
करना
भी
था.
ये
आज़ाद
भारत
का
पहला
चुनाव
था,
दूर
सुदूर
लोगों
में
नेहरू
को
देखने
के
लिए
पागलपन
था.
चुनाव
शुरू
होने
वाला
था,
लेकिन
उससे
पहले
एक
संकट
आया
चुनाव
प्रचार
का.
पूरे
देश
में
नेहरू
चुनाव
कैसे
करेंगे,
क्यूंकि
यही
वो
दौर
था
जब
दुनिया
में
कुछ
बड़े
नेताओं
की
हत्या
कर
दी
गई
थी.

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Nehru In Colombo

जवाहर
लाल
नेहरू
(फाइल
फोटो:
Getty)

ऐसे
में
एक
चुनौती
नेहरू
की
सुरक्षा
को
लेकर
भी
थी,
वैसे
तो
प्रधानमंत्री
को
भारतीय
वायुसेना
का
हेलिकॉप्टर
मिलता
ही
था
लेकिन
नेहरू
नहीं
चाहते
थे
कि
वो
चुनाव
प्रचार
में
इसका
इस्तेमाल
करें,
क्योंकि
कई
तरह
के
सवाल
खड़े
होते.
तब
इसका
भी
एक
रास्ता
निकाला
गया,
फ़्रॉम
कर्ज़न
टू
नेहरू
एंड
आफ़्टर
नाम
की
किताब
में
ये
बताया
गया
है
कि
सरकार
ने
तब
इस
मसले
का
हल
निकालने
के
लिए
एक
कमेटी
बनाई,
जिसके
बाद
ये
तय
हुआ
कि
प्रधानमंत्री
को
सुरक्षा
के
मद्देनज़र
सरकारी
हेलिकॉप्टर
का
इस्तेमाल
करने
दिया
जाएगा.

इसमें
तय
ये
भी
हुआ
कि
नेहरू
अपना
किराया
देंगे,
उनके
साथ
जो
सुरक्षाकर्मी
रहेंगे
उनका
खर्चज
सरकार
वहन
करेगी,
क्योंकि
वो
प्रधानमंत्री
की
सुरक्षा
में
लगे
हैं.
साथ
ही
अगर
कोई
कांग्रेस
का
नेता
उस
विमान
में
सफर
करता
है,
तब
भी
उसको
किराया
देना
होगा.
इस
तरह
नहरू
के
चुनाव
प्रचार
का
मसला
हल
हो
गया.
नेहरू
ने
अपना
चुनाव
प्रचार
1
अक्टूबर
से
शुरू
कर
दिया
था,
25
अक्टूबर
को
पहला
वोट
पड़ा
था.
दावा
किया
जाता
है
कि
8-9
महीने
के
वक्त
में
ही
नेहरू
ने
तब
40
हज़ार
किमी
तक
का
सफर
कर
लिया
था,
इसमें
हवाई
जहाज,
गाड़ी,
रेल
और
नाव
तक
के
जरिए
नेहरू
प्रचार
कर
रहे
थे.

आखिर
में
आपको
जवाहर
लाल
नेहरू
के
चुनावी
इतिहास
के
बारे
में
भी
बताते
हैं.
1952
यानी
पहले
चुनाव
में
जवाहर
लाल
नेहरू
को
करीब
39
फीसदी
वोट
मिले,
इसके
बाद
1957
में
भी
37
फीसदी
वोट
मिले.
लेकिन
ये
खास
इसलिए
भी
रहा,
क्योंकि
इन
दोनों
चुनावों
में
इस
सीट
से
एक
नहीं
बल्कि
दो
सांसद
चुने
जाते
थे.
ऐसे
में
कांग्रेस
की
ओर
से
यहां
जवाहर
लाल
नेहरू
जीते
और
उनके
अलावा
मसुरियादीन
पासी
इस
सीट
से
कांग्रेस
के
सांसद
चुने
गए.

1962
का
चुनाव
जब
हुआ,
तब
तक
ये
सीट
फूलपूर
लोकसभा
सीट
हो
गई
थी
और
अब
एक
सीट
पर
एक
ही
सांसद
चुना
जा
रहा
था.
नेहरू
को
इस
बार
60
फीसदी
से
ज्यादा
वोट
मिले,
लेकिन
यहां
भी
उनकी
टेंशन
खत्म
नहीं
हुई
क्योंकि
इस
बार
उनके
खिलाफ
राममनोहर
लोहिया
मैदान
में
थे.
लोहिया
की
रैलियों
में
दमदार
भीड़
भी
आती
थी,
तब
कांग्रेस
को
हल्का
झटका
तो
लगा
लेकिन
चुनाव
के
नतीजे
आए
तो
सब
सही
हुआ.
इस
लोकसभा
चुनाव
के
दो
साल
बाद
ही
नेहरू
का
निधन
हो
गया
था.
जब
इस
सीट
पर
उपचुनाव
हुआ,
तब
जवाहर
लाल
नेहरू
की
बहन
विजय
लक्ष्मी
पंडित
यहां
से
सांसद
बन
गईं.