चुनावी किस्से: जब नेहरू ने कहा चुनाव कराओ और इस अफसर ने मना कर दिया

चुनावी किस्से: जब नेहरू ने कहा चुनाव कराओ और इस अफसर ने मना कर दिया

साल
1947
में
देश
आज़ाद
हुआ,
उसके
बाद
अंग्रेज़
वापस
जाने
लगे
और
पूरी
तरह
से
सत्ता
हिन्दुस्तान
के
हाथ
में

गई.
गुलामी
के
बाद
जब
देश
में
लोकतंत्र
लाना
चाहा,
तब
उसका
सबसे
अहम
रास्ता
चुनाव
ही
हो
सकता
था.
यही
वजह
थी
कि
जवाहर
लाल
नेहरू
देश
में
जल्द
से
जल्द
चुनाव
करवाना
चाहते
थे,
जैसे
ही
संविधान
लागू
हुआ
उसके
तुरंत
बाद
नेहरू
चुनावी
तैयारियों
में
जुट
गए.
लेकिन
गुलामी
से
बाहर
निकले
देश
में
चुनाव
कराए
कौन,
जहां
80
फीसदी
लोग
कम
पढ़े
लिखे
हो
उन्हें
वोट
डालने
का
मतलब
कौन
समझाए.
इस
चुनौती
को
स्वीकार
किया
बंगाल
से
निकले
एक
अफसर
ने,
जिसने
देश
में
पहले
लोकसभा
के
चुनाव
करवाए.
नाम
था
सुकुमार
सेन.

1899
में
पैदा
हुए
सुकुमार
सेन
अंग्रेज़ों
के
वक्त
में
ही
इंडियन
सिविल
सर्विस
में

गए
थे,
उन्होंने
अलग-अलग
जिलों
में
अपनी
सेवाएं
दीं,
इसके
अलावा
वो
जज
भी
रहे.
जब
भारत
अपनी
आज़ादी
की
ओर
बढ़
गया
था
और
अब
संविधान
गढ़ने
की
तैयारी
चल
रही
थी,
तब
तक
इधर
सुकुमार
सेन
भी
बंगाल
के
चीफ
सेक्रेटरी
बन
गए
थे.
जैसा
हमने
आपको
बताया
कि
संविधान
लागू
होने
के
बाद
जवाहर
लाल
नेहरू
चाहते
थे
कि
चुनाव
जल्द
से
जल्द
करा
लिए
जाएं.

लेकिन
पहली
बार
चुनाव
इतना
आसान
भी
नहीं
होता
है.
तब
के
बंगाल
के
मुख्यमंत्री
बीसी
रॉय
ने
जवाहर
लाल
नेहरू
को
सुकुमार
सेन
का
ही
नाम
दिया.
सुकुमार
सेन
दिल्ली
पहुंचे
तो
उन्हें
मुख्य
चुनाव
आयुक्त
बना
दिया
गया,
प्रधानमंत्री
नेहरू
ने
उनसे
कहा
कि
आप
देश
में
जल्द
से
जल्द
चुनाव
करवाइए.
अब
आप
सोचिए
कि
नेहरू
जैसा
ताकतवर
नेता
आपसे
कुछ
कहे
और
आपको
वो
करने
की
ताकत
भी
दे,
तो
आप
क्या
जवाब
देंगे.
नेहरू
जैसे
कद
का
व्यक्ति
पूछेगा
तो
आप
हां
कर
दी
देंगे,
लेकिन
सुकुमार
सेन
ने
मना
कर
दिया.
उन्होंने
कारण
दिया
कि
अभी
देश
तुरंत
चुनाव
नहीं
करवा
सकता
है,
क्यूंकि
इसके
लिए
एक
लंबी
तैयारी
चाहिए
होगी.

Sukumar Sen

सुकुमार
सेन
ने
करवाया
था
देश
का
पहला
चुनाव
(Getty)

ये
बात
ठीक
भी
थी,
तब
देश
की
जनसंख्या
करीब
35
करोड़
थी.
इसमें
से
कौन
वोट
डालेगा,
कौन
नहीं
डालेगा,
कैसे
वोट
डालेगा
ये
कुछ
तय
नहीं
था.
ऐसे
में
जब
तक
कोई
खाका
नहीं
बनता,
तब
तक
चुनाव
कैसे
हो
जाएगा.
सरकार
द्वारा
Representation
of
the
People
Act
लागू
किया
गया,
जिसके
बाद
तय
हुआ
कि
वोट
डालने
की
ज़रूरी
उम्र
21
साल
की
होगी.
ऐसे
में
देश
में
करीब
17
करोड़
वोटर
तैयार
हुए,
कमाल
की
बात
ये
है
कि
भारत
ने
महिलाओं
को
भी
वोट
डालने
का
अधिकार
दिया
और
वो
भी
अपने
पहले
ही
आम
चुनाव
में.
अमेरिका,
ब्रिटेन
जैसे
पुराने
और
बड़े
लोकतंत्रों
को
भी
ऐसा
करने
के
लिए
100
साल
से
ज्यादा
लग
गए
थे.

इतिहासकार
रामचंद्र
गुहा
ने
भी
जब
सुकुमार
सेन
के
बारे
में
लिखा,
तब
उन्हें
भारतीय
लोकतंत्र
का
एक
अनसंग
हीरो
बताया,
जिन्होंने
इस
देश
में
लोकतंत्र
के
सबसे
बड़े
त्योहार
को
पहली
बार
सफल
तरीके
से
ज़मीन
पर
लागू
किया.
क्योंकि
उस
वक्त
सबकुछ
ज़ीरो
से
ही
शुरू
होना
था,
कौन
राष्ट्रीय
पार्टी
बनेगी
कौन
क्षेत्रीय
पार्टी
होगा,
किसे
क्या
सिंबल
मिलेगा,
निर्दलीय
कैसे
चुनाव
लड़ेंगे.
सीटों
में
सामाजिक
बैलेंस
कैसे
बनेगा,
चुनाव
लड़ाने
के
अलावा
वोट
डालने
वालों
को
भी
ध्यान
में
रखना
था.

बैलेट
पेपर
से
लेकर
वोट
देने
के
बाद
लगने
वाली
स्याही
तक,
हर
चीज़
को
लेकर
तैयारी
की
गई.
जगह
जगह
बूथ
बनाए
गए,
कई
जगह
साइकिल
से
तो
कई
जगह
नाव
से
मतदान
पेटी
पहुंचाई
गई.
कमाल
की
बात
ये
भी
रही
कि
6
महीने
तक
देश
में
आम
चुनाव
हुए,
लेकिन
उससे
पहले
भी
एक
मॉक
इलेक्शन
करवाए
गए
थे
जहां
पर
लोगों
को
वोट
डालना
सिखाना
था.
उस
वक्त
कोई
ईवीएम
नहीं
होती
थी,
बल्कि
हर
पार्टी
का
अलग
बैलेट
बॉक्स
होता
था.

नासिक
की
सरकारी
प्रिंटिंग
प्रेस
में
बैलेट
पेपर
थे,
एक
लाख
से
ऊपर
बूथ
बनाए
गए.
सिर्फ
महिलाओं
के
लिए
स्पेशल
बूथ
बनाए
गए,
महिलाओं
से
जुड़ा
तो
एक
और
किस्सा
है
कि
करीब
80
लाख
महिलाएं
तो
इसलिए
वोटिंग
लिस्ट
में
नहीं

पाई
क्योंकि
वो
अपना
नाम
नहीं
बताना
चाहती
थीं.
लेकिन
करीब
70
फेज़
और
6
महीने
की
मेहनत
के
बाद
पहली
बार
आम
चुनाव
करवाए
गए,
जिसमें
मतदान
प्रतिशत
45
फीसदी
से
ज्यादा
आया
था.
और
ये
सब
सुकुमार
सेन
की
अगुवाई
वाले
चुनाव
आयोग
और
उनकी
टीम
की
वजह
से
ही
संभव
हो
पाया.
और
इसलिए
आज
भी
चुनाव
के
वक्त
पर
अक्सर
सुकुमार
सेन
को
याद
भी
किया
जाता
है.