तीन रंग की ‘चुनावी स्याही’ जो मिटाए नहीं मिटती, क्या है फॉर्मूला, इस बार इतनी शीशियां हुईं सप्लाई

तीन रंग की ‘चुनावी स्याही’ जो मिटाए नहीं मिटती, क्या है फॉर्मूला, इस बार इतनी शीशियां हुईं सप्लाई
तीन रंग की 'चुनावी स्याही' जो मिटाए नहीं मिटती, क्या है फॉर्मूला, इस बार इतनी शीशियां हुईं सप्लाई


प्रतीकात्मक
तस्वीर.

भारत
में
19
अप्रैल
को
लोकसभा
की
102
सीटों
पर
वोट
डाले
जाएंगे.
इन
चुनावों
के
लिए
पूरा
देश
तैयार
है.
सभी
को
इंतजार
है
कि
किसके
हाथ
इस
बार
देश
की
सत्ता
आएगी.
वोटिंग
में
कोई
गड़बड़ी

हो,
इसके
लिए
पुख्ता
इंतजाम
किए
जा
रहे
हैं.
इस
बीच
वोटिंग
के
बाद
उंगली
पर
लगाई
जाने
वाली
स्याही
की
बोतलों
की
सप्लाई
भी
हो
गई
है.
चुनावी
स्याही
बनाने
वाली
एकमात्र
कंपनी
मैसूर
पेंट्स
एंड
वार्निश
लिमिटेड
(MPVL)
ने
बताया
कि
26.55
लाख
शीशियां
सभी
राज्यों
और
केंद्र
शासित
प्रदेशों
में
पहुंचा
दी
गईं
हैं.
इनकी
लागत
55
करोड़
रुपये
है.

कंपनी
ने
बताया
कि
2019
के
चुनाव
में
33
करोड़
रुपये
की
लगभग
26
लाख
शीशियों
का
इस्तेमाल
हुआ
था.
यानी,
पिछली
बार
के
मुकाबले
इस
बार
2.2
शीशियों
की
सप्लाई
ज्यादा
की
गई
है.
कंपनी
के
मैनेजिंग
डायरेक्टर
के.
मोहम्मद
इरफान
ने
न्यूज
एजेंसी
को
बताया
कि
स्याही
की
सबसे
ज्यादा
3.58
लाख
शीशियां
उत्तर
प्रदेश
में
भेजी
गई
हैं.
वहीं,
सबसे
कम
110
शीशियां
लक्षद्वीप
में
गई
हैं.


700
वोटर्स
के
लिए
एक
शीशी

चुनाव
आयोग
के
मुताबिक,
इस
बार
लोकसभा
चुनाव
में
करीब
97
करोड़
वोटर्स
हैं.
सबसे
ज्यादा
15.30
करोड़
वोटर्स
उत्तर
प्रदेश
में
हैं.
जबकि,
सबसे
कम
57,500
वोटर्स
लक्षद्वीप
में
हैं.
उत्तर
प्रदेश
के
बाद
स्याही
की
सबसे
ज्यादा
2.68
लाख
शीशियां
महाराष्ट्र
में
भेजी
गई
हैं.
उसके
बाद
2
लाख
पश्चिम
बंगाल,
1.93
लाख
बिहार,
1.75
लाख
तमिलनाडु,
1.52
लाख
मध्य
प्रदेश,
1.50
लाख
तेलंगाना,
1.32
लाख
कर्नाटक,
1.30
लाख
राजस्थान,
1.16
लाख
आंध्र
प्रदेश
और
1.13
लाख
गुजरात
में
भेजी
गईं
हैं.

स्याही
की
एक
शीशी
10
ml
की
होती
है.
एक
शीशी
से
लगभग
700
लोगों
की
उंगली
पर
स्याही
लगाई
जा
सकती
है.
एक
पोलिंग
बूथ
पर
लगभग
15
सौ
वोटर
होते
हैं.
चुनाव
आयोग
के
मुताबिक,
इस
बार
देशभर
में
12
लाख
से
ज्यादा
पोलिंग
स्टेशन
बनाए
गए
हैं.


25
देशों
में
एक्सपोर्ट
होती
है
स्याही

चुनावों
में
इस्तेमाल
होने
वाली
ये
अमिट
स्याही
सिर्फ
भारत
ही
नहीं,
बल्कि
दुनिया
के
कई
मुल्कों
में
भी
इस्तेमाल
होती
है.
कंपनी
के
एमडी
इरफान
ने
बताया
कि
ये
अमिट
स्याही
कनाडा,
घाना,
नाइजीरिया,
मंगोलिया,
मलेशिया,
नेपाल,
साउथ
अफ्रीका
और
मालदीव
समेत
25
से
ज्यादा
देशों
में
एक्सपोर्ट
की
जाती
है.
हालांकि,
इन
देशों
में
स्याही
लगाने
का
तरीका
अलग
होता
है.
उदाहरण
के
लिए
कंबोडिया
और
मालदीव
में
वोटर
को
अपनी
उंगली
स्याही
में
डुबोनी
होती
है.
बुर्किना
फासो
में
इसे
ब्रश
से
लगाया
जाता
है.
जबकि,
तुर्की
में
नोजल
के
जरिए
स्याही
वोटर
को
लगाई
जाती
है.


कब
से
इस्तेमाल
हो
रही
है
स्याही?

भारत
में
पहली
बार
1952
में
चुनाव
हुए
थे,
तब
स्याही
का
इस्तेमाल
नहीं
होता
था.
1957
के
चुनाव
में
भी
इस्तेमाल
नहीं
हुआ.
इसके
बाद
चुनाव
आयोग
को
जब
किसी
दूसरे
की
जगह
वोट
डालने
और
दो
बार
वोट
डालने
की
शिकायतें
मिलीं,
तो
इसका
समाधान
ढूंढा
जाने
लगा.
इसके
बाद
चुनाव
आयोग
ने
नेशनल
फिजिकल
लैबोरेटरी
ऑफ
इंडिया
(NPL)
से
एक
ऐसी
स्याही
बनाने
को
कहा,
जिसे
पानी
या
किसी
केमिकल
से
भी

मिटाया
जा
सके.

इसके
बाद
एनपीएल
ने
कर्नाटक
की
मैसूर
पेंट्स
एंड
वार्निश
लिमिटेड
कंपनी
को
इस
स्याही
बनाने
का
ऑर्डर
दिया.
इस
कंपनी
को
1937
में
मैसूर
के
महाराजा
कृष्णराज
वाडियार
ने
स्थापित
किया
था.
आजादी
के
बाद
इस
कंपनी
का
कर्नाटक
सरकार
ने
अधिग्रहण
कर
लिया.
1962
के
चुनाव
में
पहली
बार
अमिट
स्याही
का
इस्तेमाल
हुआ.
भारतीय
चुनाव
में
इस
स्याही
के
इस्तेमाल
का
श्रेय
पहले
मुख्य
चुनाव
आयुक्त
सुकुमार
सेन
को
दिया
जाता
है.
1962
से
ही
हर
चुनाव
में
इस
स्याही
का
इस्तेमाल
होता
है.


क्यों
नहीं
मिट
सकती
ये
स्याही?

कंपनी
ने
इस
स्याही
को
बनाने
का
फॉर्मूला
कभी
साझा
नहीं
किया.
इस
स्याही
को
बनाने
के
लिए
सिल्वर
नाइट्रेट
केमिकल
का
इस्तेमाल
होता
है.
सिल्वर
नाइट्रेट
इस
स्याही
को
फोटोसेंसेटिव
नेचर
का
बनाता
है,
जिससे
ये
धूप
के
संपर्क
में
आने
पर
और
गहरी
हो
जाती
है.
इतना
ही
नहीं,
पानी
लगने
के
बाद
ये
और
गहरा
हो
जाता
है.
जब
ये
स्याही
उंगली
पर
लगाई
जाती
है
तो
भूरे
रंग
की
होती
है.
फिर
कुछ
ही
समय
में
ये
गहरे
बैंगनी
रंग
में
बदल
जाती
है.
और
फिर
काले
रंग
की
हो
जाती
है.

जब
ये
स्याही
उंगली
में
लगती
है
तो
इसमें
मौजूद
सिल्वर
नाइट्रेट
हमारे
शरीर
में
मौजूद
नमक
के
साथ
मिलकर
सिल्वर
क्लोराइड
बनाता
है.
सिल्वर
क्लोराइड
स्किन
से
चिपक
जाता
है
और
पानी
या
किसी
और
केमिकल
से
नहीं
हटता.
इस
स्याही
का
निशान
धीरे-धीरे
तभी
जाता
है,
जब
स्किन
के
सेल
पुराने
हो
जाते
हैं
और
उतरने
लगते
हैं.


कितने
दिन
में
मिटती
है
स्याही?

2014
के
चुनाव
के
वक्त
कई
लोगों
ने
दावा
किया
था
कि
ये
अमिट
स्याही
कुछ
ही
देर
में
मिट
गई.
इसके
बाद
चुनाव
आयोग
ने
एक
बयान
जारी
कर
बताया
था
कि
इस
स्याही
को
पूरी
तरह
से
हटने
में
15
दिन
का
समय
लगता
है.