
साल
2002
में
विदेश
में
पढ़ाई
और
फिर
नौकरी
करने
के
बाद
कांग्रेस
नेता
राहुल
गांधी
हिन्दुस्तान
वापस
आए
थे.
सबको
मालूम
था
कि
राहुल
गांधी
देर
या
सवेर
राजनीति
में
आएंगे
ही,
तब
उनकी
मां
सोनिया
गांधी
पूरी
तरह
से
राजनीति
में
एक्टिव
थीं
और
सत्ता
में
वापसी
के
लिए
पार्टी
संघर्ष
कर
रही
थी.
2002
में
राहुल
गांधी
आए
तो
उन्होंने
पॉलिटिक्स
जॉइन
नहीं
की,
लेकिन
दोस्तों
के
साथ
एक
स्टार्टअप
कंपनी
खोली.
जिसका
नाम
बैकॉप्स
सर्विसेज़
लिमिटेड
था
और
काम
बिजनेस
या
उससे
जुड़े
मसलों
पर
सलाह
देना
था.
डेढ़-दो
साल
बाद
राहुल
गांधी
की
राजनीति
में
एंट्री
हो
गई,
साल
था
2004
और
लोकसभा
सीट
थी
अमेठी.
21
मार्च
2004
को
अंबिका
सोनी
ने
कांग्रेस
मुख्यालय
में
प्रेस
कॉन्फ्रेंस
की
और
उम्मीदवारों
का
ऐलान
किया.
इसी
लिस्ट
में
बताया
गया
कि
राहुल
गांधी
अमेठी
से
चुनाव
लड़ेंगे,
जबकि
सोनिया
गांधी
ने
रायबरेली
से
चुनाव
लड़ने
का
फैसला
किया
है.
इसी
के
साथ
सक्रिय
राजनीति
में
गांधी-नेहरू
परिवार
की
पांचवीं
पीढ़ी
की
एंट्री
हो
गई.
अमेठी
से
चुनाव
लड़ना
ये
बताता
था
कि
पार्टी
राहुल
गांधी
को
एक
सॉफ्ट
लॉन्चिंग
पैड
देना
चाहती
है,
क्यूंकि
ये
एक
तरह
से
गांधी
परिवार
की
ही
पारंपरिक
सीट
रही
थी.
1999
में
सोनिया
गांधी
यहां
से
सांसद
बनीं
और
फिर
राहुल
गांधी
को
यहां
पर
सांसद
बनने
के
लिए
भेजा
गया.
उस
वक्त
के
अखबार
के
पन्ने
पलटेंगे
या
फिर
ब्लॉग
पढ़ेंगे,
तब
मालूम
पड़ेगा
कि
राहुल
गांधी
को
लेकर
उस
तरह
का
माहौल
किस
तरह
का
रहा.
बीबीसी
की
एक
रिपोर्ट
में
बताया
गया
कि
जब
प्रियंका
गांधी
अमेठी
में
राहुल
गांधी
की
मुलाकात
पत्रकारों
और
स्थानीय
लोगों
से
करवा
रही
थीं,
तब
राहुल
काफी
शरमाए
हुए
लड़के
की
तरह
मिल
रहे
थे.
ये
भी
पढ़ें
अपने
परिवार
के
साथ
राहुल
गांधी
(Gett)
राहुल
की
उम्र
तब
34-35
साल
रही
होगी,
लेकिन
वो
लगते
लड़के
ही
थे
और
इसी
छवि
के
साथ
राहुल
मैदान
में
उतरे.
सफेद
कुर्ता
पायजामा
पहने,
एक
बड़ा
सा
चश्मा
और
लोगों
से
सिर्फ
इतना
ही
कहा
कि
मैं
चुनाव
नहीं
दिल
जीतने
आया
हूं,
लोगों
से
मिलता
हूं
तो
पापा
की
याद
आती
है
क्योंकि
मैं
यहां
पर
पापा
के
साथ
ही
आया
करता
था.
गांधी
परिवार
के
किसी
भी
सदस्य
के
साथ
हमेशा
यही
चीज़
रही
है,
क्यूंकि
उनके
पास
अपने
किस्से
हैं
और
लोगों
का
उस
परिवार
के
प्रति
एक
सम्मान
है
और
यही
चीज़
उस
वक्त
भी
ज़मीन
पर
काम
कर
रही
थी.
2004
का
चुनाव
कांग्रेस
के
लिए
यादगार
था,
क्यूंकि
वाजपेयी
सरकार
के
इंडिया
शायनिंग
के
नारे
के
बीच
भी
एनडीए
चुनाव
हार
गया
था
और
सत्ता
में
काग्रेस
की
वापसी
हुई
थी,
जो
एक
यूपीए
संगठन
के
रूप
में
थी.
अमेठी
के
चुनाव
में
राहुल
गांधी
के
सामने
कोई
बड़ा
चेहरा
नहीं
था,
क्यूंकि
तब
तक
ये
मान
लिया
जाता
था
कि
गांधी
परिवार
या
फिर
अन्य
कोई
बड़ा
नेता
जहां
से
चुनाव
लड़
रहा
होता
है
वहां
औपचारिकता
के
लिए
पार्टियां
अपने
उम्मीदवार
तो
घोषित
करती
हैं,
लेकिन
वो
इतना
बड़ा
नाम
या
टक्कर
देने
वाला
चेहरा
मुश्किल
ही
होता
है.
राहुल
गांधी
ने
2004
में
अपनी
बहन
प्रियंका
गांधी
के
साथ
ही
चुनावी
मोर्चा
संभाला,
अमेठी
के
अलग-अलग
गांव
में
जाकर
प्रचार
किया.
विदेश
से
पढ़कर
लड़का
अगर
गांव
लौटे
तो
मोहल्ले
में
वैसे
ही
भीड़
लग
जाती
है,
लेकिन
ये
लड़का
राजीव
गांधी
का
बेटा
था
और
सांसद
बनने
आया
था,
राहुल
को
सुनने
वालों
के
लिए
हर
चौराहा
भर
जाता
था.
राहुल
गांधी
65
फीसदी
वोटों
के
साथ
ये
चुनाव
जीत
गए
और
पहली
बार
सांसद
बने.
अमेठी
के
सांसद
के
तौर
पर
जो
सफर
2004
में
शुरू
हुआ
था,
वो
2019
तक
चला.
19
में
स्मृति
ईरानी
ने
राहुल
गांधी
को
मात
दी
और
राहुल
गांधी
अमेठी
के
पूर्व
सांसद
हो
गए.