
2024
के
लोकसभा
चुनाव
में
क्या
हुआ
‘माय’
समीकरण
का?
बिहार
की
सियासत
में
आरजेडी
की
राजनीतिक
इमारत
भी
यूपी
में
सपा
की
तरह
मुस्लिम-यादव
की
नींव
पर
खड़ी
हुई
है,
लेकिन
इस
बार
के
लोकसभा
चुनाव
में
लालू
प्रसाद
यादव
एम-वाई
की
छवि
से
बाहर
निकलने
की
कोशिश
कर
रहे
हैं.
इंडिया
गठबंधन
के
तहत
बिहार
में
आरजेडी
23
सीटों
पर
चुनाव
लड़
रही
है,
जिसमें
ज्यादातर
सीटों
पर
उम्मीदवारों
के
नाम
का
ऐलान
कर
दिया
है.
हालांकि,
आरजेडी
इस
बार
उम्मीदवारों
की
सूची
जारी
करने
के
बजाय
लालू
यादव
सीधे
उम्मीदवारों
को
सिंबल
अलॉट
कर
रहे
हैं.
आरजेडी
ने
अपने
कोटे
की
23
सीटों
में
से
करीब
18
सीटों
पर
उम्मीदवारों
को
चुनाव
लड़ने
की
हरी
झंडी
दे
दी
है.
पहले
और
दूसरे
चरण
की
सीटों
के
लिए
आरजेडी
के
उम्मीदवारों
ने
नामांकन
भी
दाखिल
कर
रखा
है
तो
बाकी
संभावित
प्रत्याशी
अपने-अपने
संसदीय
क्षेत्र
में
डेरा
जमाए
हुए
हैं.
गया
सीट
से
कुमार
सर्वजीत,
नवादा
से
श्रवण
कुमार,
औरंगाबाद
सीट
से
अभय
कुशवाहा,
जमुई
से
अर्चना
रविदास,
जहानाबाद
से
सुरेंद्र
यादव,
पाटिलपुत्र
से
मीसा
भारती,
मुंगेर
से
अनीता
देवी,
बांका
से
जय
प्रकाश
नारायण
यादव,
पूर्णिया
से
बीमा
भारती
और
दरभंगा
से
ललित
यादव
को
टिकट
आरजेडी
ने
दिया
है.
इसके
अलावा
सारण
से
रोहिणी
आचार्य
का
टिकट
कन्फर्म
है.
अब
तक
आठ
यादव
उम्मीदवार
के
नाम
तय
बिहार
में
आरजेडी
के
कोर
वोटबैंक
यादव
और
मुस्लिम
माने
जाते
हैं,
लेकिन
यादव
को
उनके
आबादी
के
लिहाज
से
हिस्सेदारी
दे
रही
है.
माना
जा
रहा
है
कि
आरजेडी
से
करीब
आठ
यादव
उम्मीदवार
मैदान
में
उतर
सकते
हैं,
लेकिन
मुस्लिम
समुदाय
से
अभी
तक
एक
भी
उम्मीदवार
के
नाम
का
ऐलान
नहीं
किया
है.
मधुबनी
सीट
से
अशरफ
अली
फातमी
को
टिकट
मिलने
की
संभावना
है.
इसके
अलावा
अररिया
सीट
पर
सरफराज
और
शाहनवाज
में
से
किसी
एक
को
आरजेडी
से
टिकट
मिलने
की
उम्मीद
है.
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हालांकि
आरजेडी
इससे
पहले
तक
बिहार
में
चार
से
पांच
सीटों
पर
मुस्लिम
उम्मीदवार
उतारती
रही
है,
लेकिन
पहली
बार
है
कि
जब
मुसलमानों
को
टिकट
देने
से
बच
रही
है.
सीवान
से
शहाबुद्दीन
चुनाव
लड़ते
रहे
हैं
तो
अररिया
से
तस्लीमुद्दीन
सांसद
रहे.
इसके
अलावा
दरभंगा
से
अशरफ
अली
फातमी
और
बेगूसराय
से
तनवीर
अहमद
चुनाव
लड़ते
रहे
हैं.
इसके
अलावा
शिवहर
से
भी
2019
में
मुस्लिम
कैंडिडेट
उतारे
थे,
लेकिन
इस
बार
आरजेडी
ने
अभी
तक
सिर्फ
मधुबनी
सीट
से
अशरफ
अली
फातमी
के
चुनाव
लड़ने
की
हरी
झंडी
मिली
है.
इसके
अलावा
किसी
दूसरी
सीट
पर
कोई
संभावना
है
तो
अररिया
सीट
है,
जहां
से
तस्लीमुद्दीन
के
दोनों
बेटों
में
से
किसी
एक
को
प्रत्याशी
बनाया
जा
सकता
है.
वैशाली
से
मुन्ना
शुक्ला
की
पत्नि,
उजियारपुर
से
आलोक
मेहता,
सीवान
से
अवध
बिहारी
चौधरी,
गोपालगंज
से
सुरेंद्र
राम,
हाजीपुर
से
शिवचंद्र
राम,
बक्सर
से
सुधाकर
सिंह,
शिवहर
से
रामा
सिंह,
सीतामढ़ी
से
रीतू
जायसवाल,
सुपौल
से
चंद्रहास
चौपाल
या
कंतलाल
शर्मा,
मधेपुरा
से
प्रो.
चंद्रशेखर
या
शांतनु
यादव,
झंझारपुर
से
प्रशांत
मंडल
को
आरजेडी
अपना
प्रत्याशी
बना
सकती
है.
इनमें
से
कई
आरजेडी
नेता
अपने-अपने
क्षेत्र
में
सक्रिय
हैं.
मुस्लिमों
को
टिकट
देने
से
बच
रही
है
पार्टी
सीवान
से
शहाबुद्दीन
के
बेटे
और
पत्नी
को
आरजेडी
इस
बार
चुनावी
मैदान
में
नहीं
उतारेगी.
इसके
चलते
ही
शहाबुद्दीन
की
पत्नी
हिना
शहाब
ने
निर्दलीय
चुनावी
मैदान
में
उतरने
का
ऐलान
कर
दिया
है.
वहीं,
बेगूसराय
सीट
आरजेडी
ने
लेफ्ट
को
दे
दी
है,
जिसके
चलते
तनवीर
हसन
के
लोकसभा
चुनाव
लड़ने
की
उम्मीदों
पर
पूरी
तरह
से
पानी
फिर
गया
है.
ऐसे
में
आरजेडी
2024
के
चुनाव
में
सिर्फ
मधुबनी
और
अररिया
सीट
से
ही
मुस्लिम
कैंडिडेट
उतार
सकती
है
जबकि
यादव
समुदाय
को
8
टिकट
दिए
हैं.
यादव
और
मुस्लिम
समुदाय
की
आबादी
तकरीबन
बराबर
है.
वहीं,
बिहार
में
इंडिया
गठबंधन
के
मुस्लिमों
के
उम्मीदवारों
पर
देखें
तो
कांग्रेस
ने
अपने
कोटे
की
9
में
से
दो
सीट
पर
ही
मुस्लिम
टिकट
दिए
हैं,
जिसमें
किशनंगज
से
मौजूदा
सांसद
मोहम्मद
जावेद
और
कटियार
से
तारिक
अनवर
को
प्रत्याशी
बनाया
है.
इंडिया
गठबंधन
के
तीसरे
सहयोगी
लेफ्ट
पार्टी
है,
जिन्हें
पांच
लोकसभा
सीटें
मिली
है.
लेफ्ट
ने
एक
भी
सीट
पर
मुस्लिम
प्रत्याशी
नहीं
उतारा
है.
इसी
तरह
हाल
ही
में
इंडिया
गठबंधन
का
हिस्सा
मुकेश
सहनी
की
वीआईपी
को
तीन
सीटों
मिली
हुई
हैं,
लेकिन
एक
भी
सीट
पर
मुस्लिम
को
प्रत्याशी
नहीं
बनाया
जा
रहा
है.
इंडिया
गठबंधन
में
बिहार
की
40
लोकसभा
सीटों
में
से
तीन
से
चार
सीट
पर
ही
मुस्लिमों
के
टिकट
मिलने
की
उम्मीद
है.
बिहार
में
कितने
फीसदी
है
मुस्लिम
वोट?
बता
दें
कि
बिहार
में
जातिगत
जनगणना
के
आंकड़े
के
मुताबिक
बिहार
में
17.70
फीसदी
मुस्लिम
हैं.
सामाजिक
न्याय
के
नारे
जिसकी
जितनी
हिस्सेदारी,
उसकी
उतनी
भागेदारी
के
लिहाज
से
देखें
तो
7
से
8
टिकट
मुसलमानों
के
बनते
हैं.
मुसमलानों
का
70
से
80
फीसदी
वोट
आरजेडी
और
कांग्रेस
को
मिलता
है.
आरजेडी
के
प्रमुख
लालू
प्रसाद
यादव
से
लेकर
तेजस्वी
यादव
तक
जिसकी
जितनी
आबादी,
उसकी
उसकी
हिस्सेदारी
की
बात
करते
हैं,
लेकिन
मुस्लिमों
को
टिकट
देने
में
उनके
हाथ
लड़
खड़ा
रहे
हैं.
मुस्लिम
सियासत
पर
संकट
क्यों?
AIMIM
के
प्रमुख
असदुद्दीन
ओवैसी
मुस्लिमों
के
प्रतिनिधित्व
की
मुद्दा
उठाते
रहे
हैं.
ओवैसी
कई
बार
कह
चुके
हैं
कि
आरजेडी
और
सपा
जैसे
दल
मुस्लिमों
का
वोट
तो
चाहते
हैं,
लेकिन
उन्हें
हिस्सेदारी
नहीं
देना
चाहते
हैं.
मुस्लिम
लीडरशिप
खड़ी
करने
की
बात
कर
ओवैसी
मुस्लिम
के
वोटबैंक
को
साधने
की
कोशिश
में
है.
ऐसे
में
आरजेडी
के
टिकट
वितरण
ने
ओवैसी
को
एक
और
मौका
दे
दिया
है.
राजनीतिक
विश्लेषकों
की
मानें
तो
मौजूदा
सियासी
दौर
में
मुस्लिम
सियासत
पर
संकट
खड़ा
हो
गया
है,
क्योंकि
आरजेडी
और
सपा
जैसे
दलों
को
लगता
है
कि
मुस्लिमों
को
टिकट
देने
पर
उन
पर
बीजेपी
मुस्लिम
तुष्टीकरण
का
आरोप
लगा
सकती
है.
आरजेडी
की
कोशिश
मुस्लिम
परस्त
छवि
को
तोड़ने
की
है,
जिसके
चलते
ही
इस
बार
मुस्लिम
उम्मीदवार
उतारने
से
बच
रही
है.