Arvind Kejriwal: क्या है 100 साल पुराना सरकारी गवाह बनाने वाला वो कानून, जिस पर हाईकोर्ट ने की टिप्पणी

Arvind Kejriwal: क्या है 100 साल पुराना सरकारी गवाह बनाने वाला वो कानून, जिस पर हाईकोर्ट ने की टिप्पणी
Arvind Kejriwal: क्या है 100 साल पुराना सरकारी गवाह बनाने वाला वो कानून, जिस पर हाईकोर्ट ने की टिप्पणी


केजरीवाल
को
द‍िल्‍ली
हाईकोर्ट
से
राहत
नहीं
म‍िल
सकी.

दिल्ली
सीएम
अरविंद
केजरीवाल
को
हाईकोर्ट
में
राहत
नहीं
मिली.
जस्टिस
स्वर्ण
कांता
शर्मा
ने
केजरीवाल
की
गिरफ्तारी
को
वैध
ठहराया
और
टिप्पणी
की
कि
कानून
सीएम
और
आम
आदमी
के
लिए
बराबर
हैं.
फैसले
में
कोर्ट
ने
ये
भी
कहा
कि
यदि
सरकारी
गवाह
पर
सवाल
उठाया
जाता
है
तो
वह
कोर्ट
पर
सवाल
उठाने
की
तरह
है.जबकि
सरकारी
गवाह
बनाने
का
कानून
100
साल
पुराना
है.

दिल्ली
के
कथित
शराब
घोटाले
में
ED
ने
दिल्ली
के
सीएम
अरविंद
केजरीवाल
को
गिरफ्तार
किया
गया
है.
कोर्ट
में
दायर
की
गई
याचिका
में
सरकारी
गवाह
पर
सवाल
उठाए
गए
हैं.
तर्क
दिया
जा
रहा
है
कि
सरकारी
गवाह
के
बयान
पर
उनकी
गिरफ्तारी
की
गई
है.
इसी
पर
दिल्ली
हाईकोर्ट
ने
ये
टिप्पणी
की
थी.
इसमें
कोर्ट
ने
बताया
कि
है
सरकारी
गवाह
पर
सवाल
उठाना
कोर्ट
पर
सवाल
उठाने
जैसा
है.
यह
कानून
100
साल
पुराना
है.

क्या
होता
है
सरकारी
गवाह?

गवाहों
का
जिक्र
भारतीय
साक्षम
अधिनियम
में
आता
है,
यह
अधिनियम
1872
में
लागू
हुआ
था.
इसी
अधिनियम
की
धारा
118
में
गवाह
की
परिभाषा
बताई
गई
है.
इसमें
बताया
गया
है
कि
किसी
भी
अपराध
के
बारे
में
जानकारी
देने
वाला
गवाह
होता
है,
जब
किसी
अपराध
में
या
षड्यंत्र
में
कई
लोग
शामिल
हों
और
उन्हीं
में
से
किसी
एक
को
पुलिस
कानूनी
गवाह
बना
ले
जो
अपराध
के
बारे
में
हर
जानकारी
देने
में
सक्षम
हो
तो
उसे
सरकारी
गवाह
कहा
जाता
है.
पुलिस
या
किसी
जांच
एजेंसी
का
सरकारी
गवाह
बनने
पर
उस
व्यक्ति
को
क्षमादान
भी
दिया
जा
सकता
है.

क्या
है
वो
कानून
?

इसके
लिए
हमें
भारतीय
साक्ष्य
अधिनियम
1872
की
धारा
133
को
समझना
होगा
जो
सह
अपराधी
की
अवधारणा
से
संबंधित
है.
सह
अपराधी
का
अर्थ
उस
व्यक्ति
से
है
जो
उस
अपराध
में
शामिल
रहा
हो,
जिसमें
एक
से
अधिक
व्यक्ति
शामिल
हैं.
इस
धारा
के
तहत
सह
अपराधी
को
किसी
भी
अभियुक्त
के
खिलाफ
सक्षम
गवाह
माना
जाएगा.
ऐसा
व्यक्ति
पुलिस
या
जांच
एजेंसी
की
पेशकश
पर
या
स्वेच्छा
से
कोर्ट
की
अनुमति
के
बाद
सरकारी
गवाह
बन
सकता
है.
हालांकि
सरकारी
गवाह
के
बयान
को
दोषसिद्धि
का
आधार
तब
तक
नहीं
माना
जा
सकता
जब
तक
उसका
बयान
अन्य
साक्ष्यों
को
सत्यापित

करे.
कानूनी
तौर
इसे
संपुष्टि
कहा
जाता
है.
इस
आधार
पर
किसी
भी
सह
अपराधी
की
गवाही
के
आधार
पर
अभियुक्त
को
मिलने
वाली
सजा
या
होने
वाली
कार्यवाही
को
वैध
माना
जाता
है.

सरकारी
गवाह
को
मिलता
है
क्षमादान

किसी
भी
मामले
में
सरकारी
गवाह
बनने
पर
सह
अपराधी
को
क्षमादान
मिल
सकता
है.
इसके
लिए
सीआरपीसी
की
धारा
306
में
प्रावधान
किया
गया.
इसके
मुताबिक
किसी
भी
गंभीर
मामले
में
प्रत्यक्ष
और
अप्रत्यक्ष
तौर
पर
शामिल
किसी
व्यक्ति
को
क्षमादान
देने
की
शर्त
पर
संबंधित
मामले
में
पूरी
सच्चाई
बताने
और
अदालत
में
गवाह
बनाने
के
लिए
तैयार
किया
जा
सकता
है.
यदि
संबंधित
व्यक्ति
सरकारी
गवाह
बनने
को
तैयार
हो
जाता
है
तो
अदालत
उसे
क्षमादान
देती
है.

क्षमादान
का
उद्देश्य
और
नियम

किसी
को
सरकारी
गवाह
को
क्षमादान
दिए
जाने
का
उद्देश्य
इंसाफ
होता
है.
दरअसल
ऐसे
किसी
मामले
में
यदि
जांच
एजेंसी
को
कोई
अहम
साक्ष्य
हाथ
नहीं
लग
रहे
हैं
या
साक्ष्यों
की
पुष्टि
के
लिए
गवाह
की
जरूरत
हो
ऐसे
में
आरोपियों
में
से
किसी
को
सरकारी
गवाह
बना
लिया
जाता
है,
ताकि
कम
से
कम
बाकी
अभियुक्तों
को
दंडित
किया
जा
सके.
हालांकि
सभी
मामलों
में
सरकारी
गवाह
की
जरूरत
नहीं
होती.
सरकारी
गवाह
सिर्फ
उन
मामलों
में
बनाया
जा
सकता
है
जिसकी
सुनवाई
सेशन
कोर्ट
में
हो
रही
हो
या
जिन
मामलों
की
सुनवाई
दंड
विधि
संशोधन
अधिनियम
1952
के
अधीन
विशेष
न्यायाधीश
के
अदालत
में
हो
या
ऐसे
अपराध
जिसमें
सात
वर्ष
या
उससे
अधिक
की
सजा
हो.
क्षमादान
का
पूरा
अधिकार
कोर्ट
को
है,
अदालत
को
यह
यकीन
होना
जरूरी
है
कि
सरकारी
गवाह
द्वारा
दी
गई
जानकारियां
सही
और
स्पष्ट
हैं
तो
क्षमादान
दिया
जाता
है.

शराब
घोटाले
में
क्यों
हो
रही
सरकारी
गवाह
की
चर्चा

दिल्ली
के
कथित
शराब
घोटाले
में
ED
ने
सरकारी
गवाह
के
बयान
पर
सीएम
अरविंद
केजरीवाल
की
गिरफ्तारी
की
है.
इस
मामले
में
ईडी
की
ओर
से
दो
सरकारी
गवाह
हैं.
इनमें
पहले
गवाह
शरत
चंद्र
रेड्डी
हैं,
जिन्हें
दिल्ली
की
राउज
एवेन्यू
कोर्ट
की
ओर
से
सरकारी
गवाह
बनने
की
अनुमति
दी
गई
है.
इससे
पहले
पिछले
साल
मामले
में
आरोपी
दिनेश
अरोड़ा
सरकारी
गवाह
बने
थे.
बताया
जाता
है
कि
रेड्डी
ने
खुद
राउज
एवेन्यू
कोर्ट
में
याचिका
दायर
कर
सरकारी
गवाह
बनाए
जाने
का
अनुरोध
किया
था.