
भाई-बहन
के
प्रेम
का
प्रतीक
रक्षाबंधन
इस
वर्ष
9
अगस्त
को
मनाया
जाएगा।
पर्व
को
देखते
हुए
इंदौर
के
रानीपुरा
क्षेत्र
में
राखियों
का
होलसेल
बाजार
सज
गया
है।
यहां
की
दुकानों
में
विभिन्न
डिजाइनों
की
राखियों
की
भरमार
है
और
खरीददारों
की
भीड़
भी
धीरे-धीरे
बढ़ने
लगी
है।
आने
वाले
दिनों
में
यही
रौनक
शहर
के
प्रमुख
बाजारों,
गलियों
और
चौराहों
पर
भी
देखने
को
मिलेगी।
इंदौर
हमेशा
से
प्रदेशभर
में
राखियों
की
आपूर्ति
का
केंद्र
रहा
है,
ऐसे
में
यहां
का
बाजार
पूरे
राज्य
के
व्यापार
के
लिए
महत्वपूर्ण
भूमिका
निभा
रहा
है।
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इंदौर
से
प्रदेश
और
बाहर
तक
जाती
हैं
राखियां
रानीपुरा
के
व्यापारी
राजेश
जोशी
ने
बताया
कि
इंदौर
न
केवल
स्थानीय
जरूरतों
को
पूरा
करता
है,
बल्कि
पूरे
मध्यप्रदेश
और
उससे
बाहर
के
राज्यों
में
भी
राखियों
की
आपूर्ति
करता
है।
शहर
में
महीनों
पहले
से
राखियों
का
निर्माण
शुरू
हो
जाता
है।
हालांकि,
बीते
दो
से
तीन
वर्षों
में
राखी
के
दामों
में
विशेष
अंतर
नहीं
आया
है,
लेकिन
बाजार
में
प्रतिस्पर्धा
अब
गुजरात
से
भी
होने
लगी
है।
इस
वर्ष
भी
बाजार
में
डायमंड,
स्टोन,
फैंसी
डोरी,
और
बच्चों
के
पसंदीदा
कार्टून
कैरेक्टर्स
वाली
राखियों
के
साथ
ही
थीम
बेस्ड
राखियों
की
विविध
रेंज
उपलब्ध
है।
अन्य
व्यापारियों
ने
बताया
कि
रक्षाबंधन
से
दो-तीन
दिन
पहले
स्थानीय
बाजारों
में
खरीददारी
का
माहौल
चरम
पर
रहेगा।
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देशभर
से
आती
हैं
वैरायटी
राखियां,
कीमत
पर
असर
रानीपुरा
इंदौर
का
सबसे
बड़ा
राखी
कारोबार
केंद्र
है।
यहां
केवल
इंदौर
में
बनी
राखियां
नहीं
बल्कि
कोलकाता,
मुंबई,
दिल्ली,
राजकोट
और
अहमदाबाद
से
भी
राखियां
मंगाई
जाती
हैं।
इन
राखियों
की
कीमत
उनके
निर्माण
में
प्रयुक्त
सामग्री
और
पैकिंग
की
गुणवत्ता
पर
निर्भर
करती
है।
इस
साल
बाजार
में
5
रुपये
से
लेकर
1200
रुपये
प्रति
दर्जन
तक
की
राखियां
उपलब्ध
हैं।
हालांकि
रानीपुरा
एसोसिएशन
से
जुड़े
व्यापारियों
के
अनुसार,
कुछ
पुराने
ग्राहक
अब
इंदौर
के
बजाय
सीधे
अहमदाबाद
से
खरीदारी
करने
लगे
हैं,
जिससे
इंदौर
के
होलसेल
बाजार
पर
असर
पड़ा
है।
कच्चे
माल
से
इंदौर
में
ही
बनती
हैं
राखियां
इंदौर
के
विभिन्न
क्षेत्रों
में
राखियों
का
निर्माण
एक
घरेलू
उद्योग
के
रूप
में
चलता
है।
रक्षाबंधन
से
करीब
दो
महीने
पहले
ही
बड़ी
संख्या
में
महिलाएं
और
परिवार
कच्चा
माल
लेकर
राखियों
को
बनाना
और
पैक
करना
शुरू
कर
देते
हैं।
इन
राखियों
के
निर्माण
के
लिए
राजकोट
और
दिल्ली
से
बड़ी
मात्रा
में
कच्चा
माल
मंगवाया
जाता
है।
इंदौर
के
कई
घरों
में
महिलाएं
इस
कार्य
में
संलग्न
हैं
और
अब
यह
काम
अपने
अंतिम
चरण
में
पहुंच
गया
है।
इससे
न
केवल
स्थानीय
रोजगार
को
बढ़ावा
मिलता
है,
बल्कि
इंदौर
की
राखियां
पूरे
प्रदेश
में
अपनी
अलग
पहचान
भी
बनाए
रखती
हैं।